: विशेष सत्र : मोदी जी की वाहवाही के लिए!(आलेख : राजेंद्र शर्मा)
Thu, Sep 21, 2023
संसद के रहस्यमय विशेष सत्र का रहस्य, इस सत्र की पहली बैठक से ही काफी हद तक खुल गया लगता है। ऐसा नहीं है कि तमाम संसदीय नियम-कायदों तथा जनतंत्र के तकाजों के विपरीत, मोदी मंडली ने अब भी सांसदों से भी इसकी जानकारी छुपाने की कोशिश खत्म कर दी हो कि पांच दिन के इस विशेष सत्र में, आखिर विशेष क्या होगा? हैरानी की बात नहीं है कि विशेष सत्र से ठीक पहले, संसद में प्रतिनिधित्व-प्राप्त सभी पार्टियों की बैठक के बाद भी, राज्य सभा में आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह, बहुत मुखर होकर इसकी शिकायत कर रहे थे कि इस बैठक तक में, विभिन्न पार्टियों के नेताओं को यह नहीं बताया गया कि सत्र में ठीक-ठीक, क्या-क्या होने जा रहा है। दोनों सदनों के संदर्भ में जिन कतिपय विधेयकों के लिए जाने की जानकारी आयी है, उनके अलावा भी कुछ है, जो अभी नहीं बताया जा रहा है, इस धारणा को मोदी मंडली अब भी सायास बल दे रही है। और तो और, सत्र शुरू होने के ऐन पहले, संसद के बाहर मीडिया के लिए अपने एकालापी संबोधन में, प्रधानमंत्री ने जिस तरह, विशेष सत्र के 'समय में छोटा' किंतु 'ऐतिहासिक निर्णयों' से भरा होने की बात कही है, उसने भी सत्र के 'छुपे एजेंडा' की अटकलों को कुछ बल ही दिया है।
इसके बावजूद, इस विशेष सत्र की लोकसभा की पहली बैठक की शुरूआत से इस संभावना को बहुत बल मिला है कि शायद इस विशेष सत्र की मुख्य विशेषता, इसका प्रधानमंत्री की मोदी की वाहवाही का विशेष अवसर बनाया जाना ही हो। जैसाकि आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था, लोकसभा की बैठक की शुरूआत स्पीकर द्वारा जी-20 के सफल आयोजन के लिए बधाई देने के नाम पर, प्रधानमंत्री मोदी के ''नेतृत्व'' की भूरि-भूरि प्रशंसा किए जाने के साथ हुई। और इसके फौरन बाद, 'संसद की 75 वर्ष की यात्रा' पर प्रधानमंत्री मोदी के विस्तृत संबोधन में, जी-20 की सफलता के लिए आत्मश्लाघा के इस सिलसिले को और आगे बढ़ाया गया, जिसका संकेत प्रधानमंत्री ने बैठक शुरू होने से पहले के, संसद के दरवाजे पर दिए गए अपने वक्तव्य में ही दे दिया था। और जैसा कि आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था, प्रधानमंत्री ने इसके साथ चंद्रयान-3 की सफलता को भी जोड़ दिया। इसके लिए वह अपने खास अंदाज में चांद पर तिरंगा फहराने के साथ ही, शिव-शक्ति पाइंट की याद दिलाना नहीं भूूले।फिर भी प्रधानमंत्री मोदी के इस लगभग एक घंटे के भाषण से लोकसभा को कुछ हैरानी जरूर हुई होगी। संसद की 75 वर्ष की यात्रा की चर्चा का प्रधानमंत्री का यह भाषण, कुछ ज्यादा ही मौके के अनुरूप था। पिछले नौ साल से ज्यादा में नरेंद्र मोदी का संसद में और वास्तव में संसद के बाहर भी, दूसरा शायद ही कोई ऐसा भाषण हुआ होगा, जिसमें उन्होंने अपने से पहले के दौर को, इतनी उदारता से याद किया होगा। नरेंद्र मोदी के मुंह से पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के लिए प्रशंसा के शब्द सुनकर, बहुतों को अवश्य हैरानी हुई होगी। जवाहरलाल नेहरू के 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि के ''ट्राइस्ट विद डेस्टिनी'' वाले भाषण का ही संसद की 75 साल की यात्रा में नरेंद्र मोदी ने उल्लेख नहीं किया, बांग्लादेश के आंदोलन के लिए इंदिरा गांधी के समर्थन और बांग्लादेश की स्थापना में योगदान का भी उल्लेख करना उन्हें जरूरी लगा। प्रधानमंत्री मोदी के मुंह से ऐसे निर्विवाद और अनाक्रामक बोल सुनना, कम से कम अब बेशक हैरान करता है।फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस संबोधन में सचमुच पूरी तटस्थता से, संसद की 75 साल की यात्रा का आख्यान प्रस्तुत करने की कोशिश की। जाहिर है कि मोदी के लिए न तो यह संभव था और न ही उनसे कोई इसकी अपेक्षा भी करता है। उल्टे मोदी से वस्तुगतता की अपेक्षा इतनी कम हो चुकी है कि उनके भाषण में खासतौर पर विपक्षियों के प्रति आक्रामकता में कमी और लंबे अर्से तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व करने वाले कांग्रेस से जुड़े अपने पूर्ववर्तियों, विशेष रूप से नेहरू तथा इंदिरा गांधी के लिए सम्मान के दो शब्द कहने भर से, उनका भाषण हैरान करने वाला लगने लगा। वर्ना नरेंद्र मोदी की इस ओढ़ी हुई उदारता की ''सीमाएं'' भी साफ दिखाई दे रही थीं। जिस तरह उन्होंने पूर्व-प्रधानमंत्रियों में राजीव गांधी का जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझा और मनमोहन सिंह के कार्यकाल को किसी भी सकारात्मक चीज के लिए याद करना तो दूर रहा, सिर्फ उनके दौर में हुए ''कैश फॉर वोट'' प्रकरण के लिए ही याद करना जरूरी समझा, उससे साफ था कि प्रधानमंत्री मोदी का रुख नहीं बदला था, वह
सिर्फ मौके के हिसाब से अपना स्वर थोड़ा एडजस्ट कर रहे थे। वर्ना प्रधानमंत्री को इसका बखूबी पता होगा कि कैसे ''कैश फॉर वोट'' प्रकरण की जांच में आखिरकार, कुछ भी नहीं निकला था। उल्टे उस प्रकरण में मास्टर माइंड के रूप में कुख्यात हुए, दिवंगत अमर सिंह, अपने आखिरी समय में नरेंद्र मोदी की पार्टी के ही साथ जुड़ चुके थे।मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व या यूपीए-1 के दौर में वामपंथ के दबाव में बने सूचना का अधिकार, वनाधिकार, शिक्षा का अधिकार तथा ग्रामीण रोजगार अधिकार कानूनों और यहां तक कि लोकपाल कानून के रूप में, आम जनता को अधिकारसंपन्न करने के पहलू से हुई प्रगति के तो, नरेंद्र मोदी जैसे सैद्घांतिक रूप से ही खिलाफ हैं। उनका मानना तो यह है कि अधिकारों के शोर से देश यानी जनता को ''कर्तव्यों'' की ओर ले जाने की जरूरत है। यह भी हैरानी की बात नहीं है कि लोकसभा के स्पीकरों का जिक्र करते हुए भी, नरेंद्र मोदी को पहले स्पीकर के बाद, सिर्फ भाजपा के दो स्पीकरों के नाम याद रहे और सोमनाथ चैटर्जी तक का नाम याद नहीं रहा। दूसरी ओर, खुद ही अपनी प्रशंसा का बाजा बजाते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में संविधान की धारा-370 का खत्म किया जाना, जीएसटी आदि, अपने हिसाब से अपनी पहले की तमाम उपलब्धियों का भी ठीक-ठाक तरीके से बखान किया, जबकि किन्हीं सीमाओं के जिक्र को अपने आस-पास फटकने तक नहीं दिया। आखिरकार, उन्हें अपने पूर्ववर्तियों के कार्यकाल की उतार-चढ़ाव भरी कहानी के सामने, अपनी सिर्फ कामयाबियों भरी कहानी जो पेश करनी थी।फिर भी कुल मिलाकर यह प्रधानमंत्री मोदी का एक प्रकार से विदाई भाषण था। और विदाई भाषण के अनुरूप इसमें पूर्ववर्तियों के प्रति कुछ उदारता थी और सब के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन था। हालांकि, मोदी जी को यह बखूबी याद था कि यह विदाई पुराने संसद भवन की ही थी, जिसका पता संसद की दीवारों तक के प्रति उनके कृतज्ञता ज्ञापन से लगता था, फिर भी यह भाषण सुनते हुए बहुतों को यह मोदी जी का विदाई भाषण ही लगा हो, तो हैरानी की बात नहीं होगी। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह संबोधन, इस विशेष सत्र के बुलाए जाने के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों में से एक था। याद रहे कि यह सिर्फ प्रधानमंत्री के संबोधन की बात नहीं है। यह पुराने संसद भवन से संसद के नये भवन में जाने को, अपने आप में एक बड़े और ऐतिहासिक ईवेंट का रूप दिए जाने का मामला है। और इस संबोधन के जरिए प्रधानमंत्री मोदी को उसी प्रकार, इस समूचे ईवेंट के केंद्र में स्थापित किया जाना है, जैसे सेंगोल संस्कार के माध्यम से, प्रधानमंत्री मोदी को जून के आखिर में हुए नये संसद भवन के उद्घाटन के ईवेंट के केंद्र में स्थापित किया गया था। इस ईवेंट पर अतिरिक्त ऐतिहासिकता लादने की सचेत कोशिश में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विदाई संबोधन के आखिर में यह याद दिलाने का विशेष रूप से ध्यान रखा कि वह, वर्तमान और भविष्य के संधिकाल पर खड़े थे; वर्तमान को भविष्य से जोड़ने वाली कड़ी पर खड़े होकर देश का नेतृत्व कर रहे हैं। यह खुद ही अपने लिए जबर्दस्ती महानता का आविष्कार करने की सचेत कोशिश के सिवा और कुछ नहीं है।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)
: चुनावबाज राजा ने बनाया जी-20 को आत्म-प्रचार का तमाशा,(आलेख : बादल सरोज)
Sun, Sep 17, 2023
मुहावरे जिस तरह बनते हैं, उस तर्ज पर यदि आने वाले दिनों में "मर्ज का हद से गुजरना है मोदी का जी-20 हो जाना" जैसा कोई मुहावरा आम हो जाए तो ताज्जुब नहीं होगा। अंतर्राष्ट्रीय नजरिये से एक महत्वपूर्ण आयोजन - जी-20 - के 18वें सम्मेलन को जिस फूहड़ तरीके से "मोदी नाम पै शुरू, मोदी नाम पै ख़तम" के मनोरंजन मेले - कार्निवाल - में बदला गया, वह हर लिहाज से असामान्य और असाधारण है। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में 'जित देखो तित मोदी' के पोस्टर्स थे, हर होर्डिंग पर वे ही वे थे, हर अखबार में पूरे-पूरे पन्नों के विज्ञापनों में भी वे ही थे, चैनलों की खबरों में मोदी, छोटे-बड़े-मंझोले भाजपाईयों की बाईट्स में मोदी, सारी हाईलाइट्स में मोदी ही मोदी थे। मौजूदा राज, जो इसके प्रधानमंत्री मोदी के प्रचार और खुद उनके द्वारा किये जाने वाले आत्मप्रचार के लिए इतिहास में रिकॉर्ड तोड़क के रूप में जाना जाएगा, उसके हिसाब से भी इस बार कुछ ज्यादा ही अधिक था। जुगुप्सा जगाने वाली आत्मकेंद्रितता थी, भारतीयों को लज्जित कर देने वाली आत्ममुग्धता थी।
गौरतलब है कि अध्यक्षी का मिलना कोई असाधारण घटना नहीं थी। जी-20 में बारी-बारी से सदस्य देशों में से किसी एक को, सम्मेलन जिस देश में होना है उसके राष्ट्रप्रमुख को, अध्यक्ष बनाए जाने की प्रथा है। इसका पिछ्ला सम्मेलन इंडोनेशिया के बाली में हुआ था। वहां के राष्ट्रपति जोको विडोडो ने इसकी अध्यक्षता की। इसमें अगले सम्मेलन की जगह दिल्ली तय हुयी और 1 दिसंबर 2022 से 30 नवंबर 2023 तक के लिए भारत के प्रधानमंत्री को इसका अध्यक्ष बनाया गया। अब 2024 का सम्मेलन ब्राजील में होना है, लिहाजा 1 दिसंबर 2023 से इसके अध्यक्ष ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा होंगे। इस तरह यह एक सामान्य परिपाटी है, आम बात है, होती रहती है, हर साल होती है। मगर जी-20 की साल भर की अध्यक्षी को भारत में पिछली साल से धुआंधार तरीके से कुछ इस तरह प्रचारित करना शुरू किया गया कि जैसे यह कोई सामान्य प्रथा नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया द्वारा मोदी को अपना नेता मान लिया जाना है। सम्मेलन के आयोजन के समय तो जैसे सारी सीमाएं ही लांघ दी गयीं। यह हल्दी की गाँठ मिलने पर पंसारी की दूकान खोल लेने जैसा आभासीय महानता की आड़ में छुपाया जा रहा बौनापन ही है। भारत के सिवा दुनिया के ज्यादातर मीडिया और राजनीतिक समीक्षकों ने इसे इसी तरह लिया भी और मखौल भी उड़ाया।कहने को तो जी-20 दो दिनों की शिखर वार्ता के अलावा हाल के कुछ वर्षों से अनेक विषयों पर अलग-अलग सत्र भी आयोजित करने लगा है, मगर मूल रूप से यह रईस देशों की खुद उनकी करतूतों से पैदा हुयी मुश्किलों का, बाकी दुनिया की कीमत पर हल ढूँढने और अपनी नीतियों में ही अन्तर्निहित दुर्बलता की शिलाजीत तलाशने के मंच के रूप में अस्तित्व में आया था। आज इसमें शामिल 19 देश और 20 वां सदस्य यूरोपीय यूनियन भले दुनिया की 85 प्रतिशत जीडीपी और 75 प्रतिशत बाजार का प्रतिनिधित्व करते हैं, मगर 2007 में इसकी स्थापना सात देशों के समूह - जी 7 - के रूप में तब हुयी थी, जब तेल उत्पादक देशों ने इस्राईल का समर्थन करने वाले देशों को तेल न बेचने का निर्णय लिया था और इन बड़े देशों के लिए तेल संकट पैदा हो गया था। अनेक वर्षों तक यह इन 7 देशों का समूह रहा। कुछ साल बाद 2007 में पूरी दुनिया पर आर्थिक मंदी का साया मंडरा रहा था, 2008 में तो अमरीका का भट्टा ही बैठ गया ; ऐसे में जी-20 के स्तर को और ऊपर उठाया गया। इसे वित्त मंत्रियों से ऊपर उठाकर राष्ट्र प्रमुखों का शिखर सम्मेलन बना दिया गया। तब से इसकी बैठक में सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा लेने लगे। इस समूह में 19 देश, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ़्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की (अब तुर्किए) , ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं। इसके साथ ही इस ग्रुप का 20वां सदस्य है यूरोपियन यूनियन, यानी यूरोप के देशों का समूह। इस बार अफ्रीकी देशों के संगठन अफ्रीकन यूनियन को भी शामिल कर लिया गया है।जी-20 की अब तक की बैठकें अमरीका के अलावा ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, मैक्सिको, रूस, ऑस्ट्रेलिया, तुर्की, चीन, जर्मनी, अर्जेंटीना, जापान, सऊदी अरब, इटली, इंडोनेशिया में हुईं - इन बैठकों के अध्यक्ष इन देशों के राष्ट्र प्रमुख रहने की वजह से वे विश्व के नेता तो नहीं ही बन गए ; मगर मोदी है, तो मुमकिन हैं। यहाँ बैठक का होना भर ही मोदी का - भारत का नहीं, मोदी का - विश्व का नेता बन जाना है। हालांकि उनकी सरकार की अमरीका-पिछलग्गू विदेश नीति के चलते दुनिया में भारत की हालत कहाँ आ पहुंची है, इसे पिछले महीने दक्षिण अफ्रीका में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने जाहिर-उजागर करके सबको बता दिया है।इस तरह के अन्तर्राष्ट्रीय समावेश, खासतौर से जब इतने सारे राष्ट्रों के प्रमुख उसमें शामिल होने वाले हों, आयोजक देश ही नहीं, दुनिया भर के लिए दिलचस्पी का विषय होते हैं। यह अवसर होता है, जब दुनिया की मानवता के समक्ष मौजूद चुनौतियों, परेशानियों के बारे में चर्चा हो, इन सम्मेलनों के एजेंडे पर बहस हो, अलग-अलग नजरियों के बारे में जनता की जानकारी समृद्ध की जाए, धनी साम्राज्यवादी देशों द्वारा इन सम्मेलनों को अपनी स्वार्थ पूर्ति का माध्यम बनाए जाने के विरुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा और कमजोर देशों के विकास में सहायक बनने वाली नीतियों के पक्ष में माहौल बनाया जाए। मगर इधर न ऐसा कुछ हुआ, न ऐसा करने की कोशिश ही की गयी। जब पूरी सरकार और देश के मीडिया को इस बारे में गहन चर्चा करनी और करानी चाहिए थी, तब खुद मोदी अपने लोगों को ऐसा न होने देने के काम पर लगा रहे थे। जी-20 के ठीक एक दिन पहले स्वयं प्रधानमंत्री मोदी अपने मंत्रियों को सनातन धर्म की रक्षा में बोलने, अभियान छेड़ने का टास्क दे रहे थे। इंडिया की जगह भारत करने, जो पहले से ही इंडिया दैट इज भारत और हिंदी में भारत दैट इज इंडिया है, की निरर्थक बहस उकसाकर इस मौके को भी छद्म राष्ट्रवाद भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। एक तरफ अशोक मोदी जैसे अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ मोदी सरकार द्वारा की जा रही आंकड़ों की बाजीगरी का भांडा फोड़ रहे थे, गरीबी और बदहाली, खासतौर से भारत में बढ़ती बेरोजगारी और रोजगारहीनता की असलियत उजागर कर रहे थे, दूसरी तरफ सिर्फ मोदी के प्रचार के लिए 4100 करोड़ रूपये से ज्यादा अकेले दिल्ली में फूंके जा रहे थे। राजधानी के आम नागरिकों पर कोरोना जैसा लॉकडाउन थोपा जा रहा था। दिल्ली के हजारों दिहाड़ी मजदूरों से उनके सप्ताह-दस दिन की रोजी-रोटी छीनी जा रही थी और दुनिया के नेताओं को बेवक़ूफ़ समझते हुए गरीब बस्तियों को परदे में ढांपकर खुद को ज्यादा चतुर समझने की नासमझी दिखाई जा रही थी। इतने पर भी सब्र नही हुआ, तो फूहड़ता की सारी हदें तोड़ते हुए जी-20 के अतिथियों को सोने और चांदी की थाली में खाना खिलाया भी और उसे भारत की महान संस्कृति बताते हुए प्रचार भी किया।इस सबके बाद भी खुद की सीमित क्षमताओं और असीमित नाकाबिलियत के उजागर होने का भय इतना था कि दुनिया भर के मीडिया को बातचीत करने से रोका गया। यह पहला सम्मेलन था, जिसके समापन पर साझी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई। सम्मेलन के बीच हुयी द्विपक्षीय वार्ताओं के वक्तव्य जारी करने के लिए भी मीडिया के सामने नहीं आया गया। इतना ही नहीं, अमरीकी राष्ट्रपति बाइडेन के संग आये मीडिया और खुद बाइडेन को भी प्रेस से बात नहीं करने दी गयी ; क्योंकि यदि वे प्रेस से मुखातिब होते, तो अध्यक्ष होने के नाते मोदी को भी उनके साथ रहना पड़ता। और मोदी देसी प्रेस-मीडिया से डरते हैं, सो दुनिया भर के मीडिया के सामने आने से बड़ा कोई और दु:स्वप्न उनके लिए हो ही नहीं सकता था। अभी कुछ महीने पहले ही वे व्हाईट हाउस में इसका अनुभव लेकर लौटे हैं और उस सदमे से अभी तक उबरे नहीं हैं। मीडिया को रोके जाने के इस रवैये की दुनिया भर में थू-थू हुयी है। पहले से ही प्रेस स्वतंत्रता के मामले में दुनिया के 180 देशों में 2022 में भारत 150 वे, 2023 में 161 वे स्थान पर था। उसके अगले वर्ष और रसातल में जाने के लिए खुद मोदी सरकार ने ठोस प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। बेचारी अमरीकी कॉरपोरेट प्रेस के लिए भी यह विडंबना की बात हो गयी कि उनके नए सहयोगी और प्रिय दोस्त के यहाँ जो पत्रकार वार्ता नहीं होने दी जा रही थी, वह उस वियतनाम में जाकर करना पड़ी, जिसके कम्युनिस्ट शासकों की कथित तानाशाही को कोसते-कोसते झूठ के पहाड़ खड़े किये जाते रहे हैं। वियतनाम में की गई प्रेस कांफ्रेंस में बाइडेन ने तो जैसे मोदी की अगुआई वाली सरकार की सार्वजनिक निंदा ही कर दी, जब उन्होंने कहा कि "जैसा कि मैं मोदी के साथ हमेशा करता रहता हूँ, (वैसा ही इस बार भी किया) मैंने पी एम मोदी के साथ मानवाधिकारों के सम्मान और एक मजबूत और समृद्ध देश के निर्माण में नागरिक समाज और स्वतंत्र प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका के महत्त्व को इस बार भी उठाया है। एक तीसरे देश में किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति द्वारा की गयी इस आलोचनात्मक टिपण्णी पर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मोदी सरकार की तरफ से कोई शब्द नहीं बोला गया है। बाइडेन जो बोले, सो बाहर जाकर बोले ; तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान तो भारत में ही सुना गए और बोल गए कि "जब मुसलमान अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, तब वादे, बड़े लोकतंत्र वाले देश और मानवाधिकार संगठन तीन बन्दर बन जाते हैं। एर्दोगान यहीं तक नहीं रुके, वे धमका भी गए ।वैसे यह भारत में हुआ कोई पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन नहीं था, इससे पहले अनेकों हुए हैं। बुश - ओबामा - ट्रम्प - बाइडेन के संयुक्त राज्य अमरीका को अपना तीर्थ और पुण्यभूमि मानने की हद तक जा पहुंचे मोदी जिस नाम - गुटनिरपेक्ष आन्दोलन - का नाम तक भूल गए हैं, 1983 में उस नाम का एक ऐतिहासिक अधिवेशन इसी दिल्ली में हुआ था। इसमें 99 सदस्य और 27 अतिथि देशों यानि 126 देशों के राष्ट्रप्रमुख शामिल हुए थे। इनके अलावा 15 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के शीर्षस्थ प्रमुख भी थे। तीन-चौथाई से ज्यादा दुनिया दिल्ली में थी। अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की स्वीकार्यता का यह महत्वपूर्ण समय था। मगर उसमें भी इंडिया और भारत केंद्र में था - नेता-नेतानी नहीं थे। जबकि इस बार थे, बल्कि वे ही वे थे। इसकी वजह भारत के लोगों को तो पहले से ही पता थी, इस जी-20 के समय दिल्ली में जमा हुए विश्व मीडिया ने भी ढूढ़ ही ली ; दुनिया भर के मीडिया ने छापा - दिखाया कि किस तरह मोदी ने हर साल होने वाले इस सम्मेलन को अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता तथा पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया है। दिल्ली के अलावा देश के 58 शहरों में बिखरा - फैला कर किये गए इस सम्मेलन के आयोजनों और इस बहाने मोदी के महिमामंडन का एकमात्र मकसद इसी साल कुछ राज्यों और अगली साल के पूर्वार्ध में होने वाले लोकसभा चुनावों के प्रचार का शंखनाद करना था। यही वजह थी कि सारी परम्पराएं तोड़कर राज्यसभा में विपक्ष के नेता सहित बाकी विपक्षी दलों के नेताओं को राष्ट्रपति भवन के औपचारिक रात्रिभोज में न्यौता तक नहीं भेजा गया।इसी की निरंतरता में है 18 सितम्बर से होने वाला संसद का विशेष सत्र, जिसे बुलाने या उसका एजेंडा तय करने के लिए बाकी सभी दलों से पूर्व मंत्रणा करने की संसदीय लोकतंत्र की पूर्व शर्त पर अमल करना तो दूर रहा, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक देश को भी नहीं बताया गया कि इसमें आखिर होना क्या है। ज्यादा आशंका इसी बात की है कि इसमें मोदी के यश गान की अहो रूपं अहो ध्वनि का वृन्दगान होगा और नफरती उन्माद को भड़काने के लिए किसी नयी साजिश को मूर्त रूप दिया जाएगा। इतिहास की विडम्बना का चरम तब होता है, जब चुटकुले सच बन जाते हैं, विदूषकी एक सामान्य बर्ताव के रूप में स्थापित हो जाती है और सहज और सामान्य होना, असामान्य और असहज होना करार दिया जाने लगता है। यह ऐसा ही समय है।मगर राह उतनी आसान नहीं है, जितना राज और उसके चाकर मान बैठे हैं। यह पब्लिक है, जो सब जानती है और अपने विरोध को दर्ज कर लेने का कोई-न-कोई रास्ता चुन ही लेती है। आत्म-प्रचार और आत्मालाप की पराकाष्ठा के बीच महज सवा दो मिनट के एकालाप के चलते शाहरुख खान की अन्यथा कमर्शियल फिल्म जवान का कामयाबी का रिकॉर्ड कायम कर लेना इसकी मिसाल है। जनता के वास्तविक मुद्दे अब देश के राजनीतिक मुद्दे बनने लगे हैं, बात निकली है, तो नवम्बर के कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों तक ही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनावों तक भी जायेगी। यही डर है, जो उन्हें सबसे ज्यादा सता रहा है।
: इसमें चिंता, चेतावनी और सबक तीनों है! (आलेख : बादल सरोज)
Thu, Aug 17, 2023
🔵 सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों के साथ दिए गए स्पष्ट आदेश को उलटने के लिए केंद्र सरकार द्वारा हठ और जिद के साथ लाया और 3 अगस्त को लोकसभा और 7 अगस्त को राज्य सभा में पारित कराया गया कथित दिल्ली सेवा क़ानून एक साथ चिंता, चेतावनी और सबक की बात है। चिंता इस बात की है कि अब धीरे-धीरे हमला भारत के संविधान की मूल अवधारणाओं को अपने निशाने पर ले रहा है ।🔵 संविधान की शुरुआत की पहली धारा ही भारत की ख़ास पहचान को दर्ज करती है। यह धारा कहती है कि "भारत दैट इज इंडिया राज्यों का एक संघ होगा।" खुद डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित और बहस के दौरान स्वयं उन्ही के द्वारा दिए गए संशोधन के साथ सर्वसम्मति से पारित भारत की यह पहचान सिर्फ शब्दों भर का मामला नहीं है। इसमें केंद्र और राज्यों के अधिकारों और कार्यक्षेत्रों को भी बाद में साफ़ साफ़ परिभाषित किया गया है। यह समझदारी सिर्फ संविधान निर्माताओं की सद्बुद्धि से नहीं आयी थी, इसके पीछे भारत के राष्ट्र राज्य बनने की प्रक्रिया में हासिल अनुभव थे, भारत की विविधता का स्वीकार था और उन्हें यथासंभव सम्मान देने की भावना थी ।🔵 यह अलग बात है कि बाद में इस संघीय ढाँचे की समझ के पालन में उस ईमानदारी का परिचय नहीं दिया गया, जिसका उल्लेख संविधान करता है। जैसे भाषाई राज्यों के आधार के साथ इस या उस बहाने छेड़छाड़ की गयी, धारा 356 का दुरुपयोग किया गया, राजभवनों से अतिक्रमण कराये गए, वगैरा-वगैरा -- मगर इस सबके बावजूद समय-समय पर केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाए रखने की आवाजें भी पुरअसर तरीके से उठती रहीं0 ; इसकी आख़िरी बड़ी मिसाल सरकारिया आयोग की शक्ल में दिखी, जिसकी कई सिफारिशों को मंजूर भी किया गया।🔵 कुल मिलाकर यह कि राजनीतिक तात्कालिकताओं और हिचकिचाहटों के बावजूद भारत के राज्यों के संघ बने रहने की राय पर देश की - एक को छोड़ बाकी सब - राजनीतिक धाराओं की कम या ज्यादा सहमति बनी रही। भाजपा के केंद्र सरकार पर काबिज होने का मतलब बाकी सब अन्य विशेषताओं के अलावा एक ऐसे राजनीतिक विचार का सत्ता में पहुंचना था, जिसका संविधान की इस पहली धारा और उसमे वर्णित भारत की समझदारी में विश्वास ही नहीं था ।🔵 जब ये विपक्ष में रहे, तब कथित प्रशासनिक आधार पर छोटे राज्यों की मागों को तूल देकर भाषाई आधार पर बने राज्यों की तार्किक और वैज्ञानिक समझदारी पर प्रहार किये गए - सत्ता में आने के बाद से तो जैसे इस पर बुलडोजर ही चढ़ाया जा रहा है। पहले जम्मू कश्मीर और अब दिल्ली से जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह यहीं तक रुकेगा नहीं ; इससे आगे जाएगा। यह न तो भविष्यवाणी है ना ही आशंका है - यह सत्ता पार्टी के विचार-गुरुओं द्वारा घोषित सिद्धांत में लिखे पर अमल है ।🔵 भाजपा जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक भुजा है - उसके हिसाब से संविधान निर्माताओं द्वारा यह ढांचा "हिन्दूपन" को भुलाकर बनाया गया है। संविधान सभा जब संविधान लिखने में व्यस्त थी, तब आरएसएस प्रमुख गोलवलकर कह रहे थे कि :🔺 “संविधान बनाते समय अपने ‘स्वत्व’ को, अपने हिंदूपन को विस्मृत कर दिया गया। उस कारण एक सूत्रता की वृत्तीर्ण रहने से देश में विच्छेद उत्पन्न करने वाला संविधान बनाया गया। हम में एकता का निर्माण करने वाली भावना कौन-सी है, इसकी जानकारी नहीं होने से ही यह संविधान एक तत्व का पोषक नहीं बन सका। एक देश, एक राष्ट्र तथा एक ही राज्य की एकात्मक शासन रचना स्वीकार करनी होगी। एक ही संसद हो, एक ही मंत्रिमण्डल हो, जो देश की शासन सुविधा के अनुकूल विभागों में व्यवस्था कर सके।” (गोलवलकर, ‘श्री गुरूजी समग्र दर्शन’, खंड-2, पृष्ठ 144)🔵 वे यहीं तक नहीं रुके, बाद में उन्होंने एक जगह यह भी कहा कि :६🔺 “इस लक्ष्य की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी कदम यह होगा कि हम अपने देश के संविधान से संघीय ढाँचे की सम्पूर्ण चर्चा को सदैव के लिए समाप्त कर दें, एक राज्य के अर्थात भारत के अंतर्गत अनेक स्वायत्त अथवा अर्ध स्वायत्त राज्यों के अस्तित्व को मिटा दें तथा एक देश, एक राज्य, एक विधानमंडल, एक कार्य पालिका घोषित करें। उसमें खंडात्मक, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, %भाषाई अथवा अन्य प्रकार के गर्व के चिन्ह को भी नहीं होना चाहिए। इन भावनाओं को हमारे एकत्व के सामंजस्य को विध्वंस करने का अवकाश नहीं मिलना चाहिए।” (एम. एस. गोलवलकर, विचार नवनीत, पृष्ठ -227)🔵 क्योंकि संघ - और भाजपा के भी - एकमात्र गुरु जी के मुताबिक़ :🔺 "संघात्मक राज्य पद्धति पृथकता की भावनाओं का निर्माण तथा पोषण करने वाली, एक राष्ट्र भाव के सत्य को एक प्रकार से अमान्य करने वाली एवं विच्छेद करने वाली है। इसको जड़ से ही हटाकर तदनुसार संविधान शुद्ध कर एकात्मक शासन प्रस्थापित हो।” (गोलवलकर, ‘श्री गुरूजी समग्र दर्शन’, खंड-3, पृष्ठ 128)🔵 चिंता और चेतावनी की बात यह है कि भाजपा अब पूरी तरह इस रास्ते पर निकल पड़ी है, यही बात है कि समस्या कश्मीर या दिल्ली भर की नहीं है ।🔵 सबक यह है कि गुड़ खाते हुए गुलगुलों से परहेज करने का डेढ़ सयानापन राजनीति में नहीं चलता। यह बात खुद को कुछ ज्यादा ही चतुर और समझदार मानने वाले आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल को जरूर समझनी चाहिये। केजरीवाल और उनकी पार्टी वह पहली गैर भाजपा पार्टी थी, जिसने जम्मू-कश्मीर जैसे विशिष्ट दर्जे वाले राज्य को खंड-खंड किये जाने और धारा 370 को हटाये जाने का सबसे पहले और कुछ ज्यादा ही उचक कर समर्थन किया था।🔵 खुद केजरीवाल ने 5 अगस्त 2019 को अपने ट्वीट में कहा था कि :🔺 " मैं सरकार के इस फैसले का समर्थन करता हूं। अब हम उम्मीद करते हैं कि सरकार के इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल करने के साथ-साथ विकास कार्यों पर जोर दिया जाएगा।"
४
अपनी इस प्रत्युत्पन्नमति पर आत्ममुग्ध केजरीवाल यह भूल गए थे कि जो भेड़िया धसान संविधान सम्मत समझदारी और भारतीय जनता के करार को तोड़ सकता है, वह सिर्फ श्रीनगर तक महदूद नहीं रहेगा -- वह दिल्ली भी लौटकर आयेगा ।🔵 सैद्दांतिक मुद्दों पर पूरी समग्रता में साफ़-साफ़ नजरिया कायम करने की बजाय सिर्फ दो-चार दिखावटी कामों के बखान से काम नहीं चलता!! यह सबक केजरीवाल भर के लिए नहीं, उन सबके लिए भी है, जो इस गलतफहमी में हैं कि बिना अँधेरे को अँधेरा कहे भी अंधेरा चीरा जा सकता है।*(लेखक पाक्षिक 'लोकजतन' के संपादक तथा अ. भा. किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*