: अक्षय पुण्य प्रदायिनी है कार्तिक पूर्णिमा - अरविन्द तिवारी
Fri, Nov 15, 2024
रायपुर – सनातन धर्म में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। पुराणों में सभी कार्तिक माह को आध्यात्मिक और शारीरिक ऊर्जा संचय के लिये उचित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और भगवान शंकर की आराधना की जानी चाहिये। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि शास्त्रों में बारहों महीनों में कार्तिक महीने को आध्यात्मिक एवं उर्जा संचय के लिये सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वैसे तो साल भर में बारह पूर्णिमा होती है लेकिन अधिकमास या मलमास को भी जोंड़ दिया जाये तो कुल मिलाकर 13 पूर्णमायें हो जाती हैं लेकिन इनमें कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। कार्तिक महीने का यह सबसे अन्तिम दिन और कार्तिक पूर्णिमा आज है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान , दान के साथ साथ दीपदान का पुण्य अन्य दिनों के अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है। स्वयं नारायण ने भी कहा है कि महिनों में , मैं कार्तिक माह हूंँ। कार्तिक मास परम पावन होता है। इस महीने में किये गये पुण्य कर्मों का अनन्त गुणा फल मिलने की मान्यता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत रखना बेहद शुभ माना जाता है , धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ का फल मिलता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि स्वयं विष्णुजी ने ब्रह्माजी को , ब्रह्माजी ने नारद मुनि को और नारदजी ने महाराज पृथु को कार्तिक मास का महत्व बताया। इस माह की त्रयोदशी , चतुर्दशी और पूर्णिमा को पुराणों में अति पुष्करिणी कहा है। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग से देवतागण भी आकर गंगा में स्नान करते हैं , इसलिये इस दिन गंगा स्नान जरूर करें। अगर आपके लिये यह कर पाना संभव ना हो तो घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर नहा लें। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है वह यदि केवल इन तीन तिथियों में सूर्योदय से पूर्व स्नान करे तो भी माह के पूर्ण फल का भागी हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत और पूजन करके बछड़ा दान करने से शिवलोक की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि इस दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धूल जाते हैं वहीं दीपदान करने से सभी देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पूर्णिमा के दिन सुबह किसी पवित्र नदी , सरोवर या कुंड में स्नान और दीपदान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन गंगा स्नान और दान दस यज्ञों के समान माना गया है। यदि आपके घर के पास नदी नहीं है तो आप किसी मंदिर में जाकर दीपदान करें , इससे आपकी परेशानियां दूर होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। मान्यता है कि इस दिन गाय , हाथी , घोड़ा , रथ और घी का दान करने से संपत्ति बढ़ती है और भेड़ का दान करने से ग्रहयोग के कष्टों दूर होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा का व्रत रखने वालों को इस दिन हवन जरूर करना चाहिये और किसी जरुरतमंद को भोजन कराना चाहिये। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा में या तुलसी के पास दीप जलाने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार देवता अपनी दिवाली कार्तिक पूर्णिमा की रात को ही मनाते हैं , इसलिये यह सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिवा , सम्भूति , प्रीति , संतति , अनुसुइया समेत क्षमा नामक छह तपस्विनी कृतिकाओं का पूजन करने का विशेष महत्व है , शाम को चंद्रमा निकलने पर इनका पूजन करना चाहिये। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हें कार्तिक की माता माना गया है , इनकी पूजा करने वालों के घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।आज देव दीपावलीइस दिन महादेव ने त्रिपुरासूर नामक राक्षस का संहार किया था जिससे देवगण बहुत प्रसन्न हुये। इस दिन भगवान विष्णु ने शिवजी को त्रिपुरारी नाम दिया जो शिव के अनेकों नामों में से एक है। इसलिये इस पूर्णिमा का एक नाम त्रिपुरी पूर्णिमा भी है। त्रिपुरासुर के वध होने की खुशी में सभी देवता स्वर्गलोक से उतरकर काँशी में दीपावली मनाते हैं। तभी से इस दिन श्रद्धालुओं द्वारा कांँशी में गंगा नदी के घाटों पर दीपदान कर दीपावली मनायी जाती है। यही नहीं यह भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने धर्म , वेदों की रक्षा के लिये मत्स्यावतार धारण किया था। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु इस मास में मत्स्य रूप में जल में विराजमान रहते हैं और आज ही के दिन मत्स्य स्वरूप को छोंड़कर वापस बैकुंठ चले जाते हैं। इसी दिन देवी तुलसी भी बैकुंठधाम गयी थी। ऐसा माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन सोनपुर में गंगा गंडकी के संगम पर गज और ग्राह का युद्ध हुआ था। गज की करुणामयी पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने ग्राह का संहार कर भक्त की रक्षा की थी। इस वजह से देवताओं ने स्वर्ग में दीपक जलाये थे। तभी से देवताओं की दीपावली होने के कारण इस दिन देवताओं को दीपदान किया जाता है। दीपदान करने से सभी प्रकार की मनोकामनायें पूर्ण होती है और जीवन में आने वाली परेशानियाँ भी दूर होती हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत रखने से हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस दिन गौ , अश्व और घी आदि के दान से संपत्ति में बढ़ोतरी होती है। इस दिन सत्यनारायणजी की कथा , विष्णुपुराण , विष्णु सहस्रनाम , कनकधारा का पठन , श्रवण करने वाले जातकों को मोक्ष प्राप्त होता है। इस दिन सरसों का तेल , तिल , काले वस्त्र किसी जरूरतमंद को दान करना चाहिये , ऐसा करने से आपको पुण्य फल प्राप्त होगा। ऐसा करने से आप कई क्षेत्रों में सफलता अर्जित करेंगे , साथ ही सारे कष्टों से मुक्ति मिलती है। कार्तिक पूर्णिमा की शाम को तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाकर तुलसी माता का स्मरण करते हुये पौधे के चारो तरफ परिक्रमा करने से भगवान विष्णु जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और आर्थिक समस्यायें दूर होती हैं।देव दीपावली की पहली कथादेव दीपावली की कथा महर्षि विश्वामित्र से जुड़ी है। मान्यता है कि एक बार विश्वामित्रजी ने देवताओं की सत्ता को चुनौती देते हुये अपने तप के बल से त्रिशंकू को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। यह देखकर देवता अचंभित रह गये , क्योंकि विश्वामित्र जी ने ऐसा करके उनको एक प्रकार से चुनौती दे दी थी। इस पर देवता त्रिशंकु को वापस पृथ्वी पर भेजने लगे , जिसे विश्वामित्र ने अपना अपमान समझा। उनको यह हार स्वीकार नहीं थी तब उन्होंने अपने तपोबल से उसे हवा में ही रोक दिया और नई स्वर्ग तथा सृष्टि की रचना प्रारंभ कर दी , इससे देवता और भी भयभीत हो गये। उन्होंने अपनी गलती की क्षमायाचना तथा विश्वामित्र को मनाने के लिये उनकी स्तुति प्रारंभ कर दी। अंतत: देवता सफल हुये और विश्वामित्र उनकी प्रार्थना से प्रसन्न हो गये , और उन्होंने दूसरे स्वर्ग और सृष्टि की रचना बंद कर दी। इससे सभी देवता प्रसन्न हुये और उस दिन उन्होंने दिवाली मनायी जिसे देव दीपावली कहा गया।गुरूनानक जयंती आजऐसी मान्यता है कि कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन ही सिख धर्म के पहले गुरु यानि गुरु नानकदेव का जन्म हुआ था। इस वजह से भी सिख धर्म के अनुयायी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पर्व प्रकाश पर्व या प्रकाश उत्सव के रूप मनाते हैं। इस अवसर पर गुरुद्वारों में अरदास की जाती है और बहुत बड़े स्तर पर जगह-जगह पर लंगर किया जाता है।
: महादेव घाट के कार्तिक पुन्नी मेला में शामिल हुये मुख्यमंत्री साय
Fri, Nov 15, 2024
रायपुर - मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर राजधानी रायपुर के पवित्र खारून नदी के तट महादेव घाट पहुंचकर श्री हाटकेश्वर महादेव और मां काली के दर्शन किये। उन्होंने श्री हाटकेश्वर महादेव और मां काली की पूजा अर्चना कर प्रदेशवासियों के खुशहाली की कामना की। मुख्यमंत्री साय ने पवित्र महादेव घाट में कार्तिक स्नान के लिये जुटे श्रद्धालुओं का अभिवादन कर सभी को कार्तिक पूर्णिमा की शुभकामनायें दी। इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री अरूण साव और विधायक मोतीलाल साहू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर महादेव घाट में आयोजित होने वाला पुन्नी मेला बहुत लोकप्रिय है। दूर-दूर से लोग इसमें बड़ी श्रद्धा के साथ हिस्सा लेने आते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी सांस्कृतिक , धार्मिक परंपरायें ना केवल हमारी आस्था को मजबूत करती हैं अपितु हमारे जीवन में उल्लास भी भरती हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि श्रीरामलला दर्शन योजना के माध्यम से हमने प्रदेशवासियों को अपने आराध्य भगवान श्रीराम के दर्शन के लिये अयोध्या भेजने की निःशुल्क की व्यवस्था की है। उन्होंने तीर्थदर्शन योजना के शीघ्र शुरू किये जाने की जानकारी देते हुये बताया कि इससे 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिक तीर्थ यात्रा पर जा सकेंगे। सीएम ने कहा कि आज से हमने प्रदेश के पच्चीस लाख से अधिक किसानों से धान खरीदी की शुरूआत कर दी है। जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर देश भर से आये जनजाति कलाकारों ने राजधानी में मनमोहक नृत्यों की प्रस्तुति दी। उन्होंने आज नई औद्योगिक विकास नीति 2024-30 लागू होने की जानकारी भी लोगों के साथ साझा की।
: रत्नों के समान मूल्यवान है आंवला का फल - अरविन्द तिवारी
Sun, Nov 10, 2024
(आज आंवला नवमीं विशेष)रायपुर - कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमीं यानि आज आंँवला नवमीं मनायी जा रही है , इसे अक्षय नवमीं भी कहा जाता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये श्री सुदर्शन संस्थानम , पुरी शंकराचार्य आश्रम / मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने बताया कि श्रुतिस्मृति पुराणों के अनुसार आंवला नवमी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन की गलियां छोड़कर मथुरा प्रस्थान किया था। इसी दिन उन्होंने अपनी बाल लीलाओं का त्याग करके कर्तव्य के पथ पर पहला कदम रखा था। इसी दिन से वृंदावन की परिक्रमा भी प्रारंभ होती है। आंवला नवमी का व्रत संतान और पारिवारिक सुखों की प्राप्ति के लिये किया जाता है। यह व्रत पति-पत्नी साथ में रखें तो उन्हें इसका दोगुना शुभ फल प्राप्त होता है। आज के दिन आंवले के पेड़ की विधिवत तरीके से पूजा कर इसी वृक्ष के नीचे सपरिवार भोजन किया जाता है। अगर आसपास आँवले का पेंड़ नही है और उसके नीचे भोजन करना संभव नही है तो आज के दिन आँवले के फल खाने का भी प्रावधान है। वहीं अक्षय नवमीं के दिन स्नान , तर्पण ,अन्न दान तथा पूजा आदि करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने आगे बताया कि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आंँवले के पेड़ में देवों के देव महादेव और भगवान विष्णु वास करते हैं इसलिये इसकी पूजा करने का खास महत्व है। कहा जाता है कि आंँवले की पूजा करने से आरोग्य और सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आंँवला नवमी के दिन पूजा करने और जप-तप , दान करने से अनंत गुना फल मिलता है। आँवला विष्णुप्रिय और साक्षात भगवान विष्णु का ही स्वरूप है। इसके स्मरण मात्र से गोदान के बराबर फल मिलता है , इसे स्पर्श करने पर दोगुना तथा फल सेवन करने पर तीन गुना फल मिलता है , यह फल सदा सेवन योग्य है। जो प्राणी इस वृक्ष का रोपण करता है , उसे उत्तम लोक की प्राप्ति होती है। आंँवले का फल पौराणिक दृष्टिकोण से रत्नों के समान मूल्यवान माना जाता है। इस फल का प्रयोग कार्तिक मास से आरम्भ करना अनुकूल माना जाता है। इस फल के सटीक प्रयोग से आयु , सौन्दर्य और अच्छे स्वस्थ्य की प्राप्ति होती है। मात्र यही ऐसा फल है जो सामान्यतः नुकसान नहीं करता है। आंवला नवमी के दिन स्नान आदि करके किसी आंवला वृक्ष के समीप जायें और उसके आसपास साफ-सफाई करके आंवला वृक्ष की जड़ में शुद्ध जल अर्पित करें। फिर उसकी जड़ में कच्चा दूध डालकर षोडशोपचार पूजन सामग्रियों से वृक्ष की पूजा करें और उसके तने पर कच्चा सूत या मौली आठ परिक्रमा करते हुये लपेटें। कुछ जगह 108 परिक्रमा भी की जाती है। इसके बाद परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करके वृक्ष के नीचे ही बैठकर परिवार , मित्रों सहित भोजन किया जाता है।महत्वशास्त्रों में आंँवला , पीपल , वटवृक्ष , शमी , आम और कदम्ब के वृक्षों को हिन्दू धर्म में वर्णित चारों पुरुषार्थ दिलाने वाला बताया गया है। इन वृक्षों की पूजा करने से भगवान प्रसन्न होते हैं और अपनी कृपा भक्तों पर बरसाते हैं। आंवला नवमी के दिन आंवला वृक्ष का पूजन कई यज्ञों के बराबर शुभ फल देने वाला बताया गया है। आंँवला नवमी पर आंँवले के पेड़ के नीचे पूजा और भोजन करने की प्रथा की शुरुआत माता लक्ष्मी ने की थी। कथा के अनुसार एक बार मांँ लक्ष्मी पृथ्वी पर घूमने के लिये आयी। धरती पर आकर मांँ लक्ष्मी सोचने लगीं कि भगवान विष्णु और शिवजी की पूजा एक साथ कैसे की जा सकती है ? तभी उन्हें याद आया कि तुलसी और बेल के गुण आंँवले में पाये जाते हैं। तुलसी भगवान विष्णु को और बेल शिवजी को प्रिय है। उसके बाद मांँ लक्ष्मी ने आंँवले के पेड़ की पूजा करने का निश्चय किया। मांँ लक्ष्मी की भक्ति और पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और शिवजी साक्षात प्रकट हुये। माता लक्ष्मी ने आंँवले के पेड़ के नीचे भोजन तैयार करके भगवान विष्णु व शिवजी को भोजन कराया और उसके बाद उन्होंने खुद भी वहीं भोजन ग्रहण किया।मान्यताओं के अनुसार आंवला नवमी के दिन अगर कोई महिला आंँवले के पेड़ की पूजा कर उसके नीचे बैठकर भोजन ग्रहण करती है , तो भगवान विष्णु और शिवजी उसकी सभी इच्छायें पूर्ण करते हैं। इस दिन महिलायें अपनी संतान की दीर्घायु तथा अच्छे स्वास्थ्य लेकर कामना करती हैं। इस दिन आँवला नवमीं की कथा भी सुनी जाती है। मान्यता है कि इस कथा को सुनने से व्रत रखने वाली महिलाओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है और माता लक्ष्मी भी उनके परिवार पर प्रसन्न होती है।आंँवले के फल का विशेष प्रयोगअगर धन का अभाव हो तो हर बुधवार को भगवान को आंँवला अर्पित करें। अगर उत्तम स्वास्थ्य चाहिये तो कार्तिक माह में आंँवले के रस का नियमित प्रयोग करें। आंँवले के वृक्ष के नीचे शयन , विश्राम और भोजन करने गोपनीय से गोपनीय बीमारियांँ और चिंतायें दूर हो जाती हैं। आंँवले के फल को दान देने से मानसिक चिंतायें दूर होती हैं। आंवले का चूर्ण खाने से वृद्धावास्था का प्रकोप नहीं होता है। कार्तिक मास में आंँवले को भोजन में शामिल करें अथवा आंँवले के रस में तुलसी मिलाकर सेवन करें। कार्तिक में आंँवले का पौधा लगाने से संतान और धन की कामनायें पूर्ण होती हैं , आंँवले के फल को सामने रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से दरिद्रता दूर होती है। अगर कर्ज से परेशान हों तो घर में आंँवले का पौधा लगाकर इसमें रोज सुबह पानी डालें।आंवला दान के प्रभाव से हुई स्वर्ण की वर्षाआंवला को वेद-पुराणों में अत्यंत उपयोगी और पूजनीय कहा गया है। आंवला का संबंध कनकधारा स्तोत्र से भी है। एक कथा के अनुसार गुरूकुल में रहते हुये एक बार आदि शंकराचार्य भिक्षा मांगने एक कुटिया के सामने रुके। वहां एक बूढ़ी औरत रहती थी , जो अत्यंत गरीबी और दयनीय स्थिति में थी। शंकराचार्य की आवाज सुनकर वह बूढ़ी औरत बाहर आई , उसके हाथ में एक आमलकी फल (आंवला) था। वह बोली महात्मन मेरे पास इस आंवले के सिवाय कुछ नहीं है जो आपको भिक्षा में दे सकूं। शंकराचार्य को उसकी स्थिति पर दया आ गई और उन्होंने उसी समय उसकी मदद करने का प्रण लिया। उन्होंने अपनी आंखें बंद की और मंत्र रूपी कनकधारा स्तोत्र के बाईस श्लोक बोले। इससे प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उन्हें दिव्य दर्शन दिये और कहा कि इस औरत ने अपने पूर्व जन्म में कोई भी वस्तु दान नहीं की। यह अत्यंत कंजूस थी और कभी किसी को कुछ देना ही पड़ जाये तो यह बुरे मन से दान करती थी। इसलिये इस जन्म में इसकी यह हालत हुई है , यह अपने क्मों का फल भोग रही है इसलिये मैं इसकी कोई सहायता नहीं कर सकती। शंकराचार्य ने देवी लक्ष्मी की बात सुनकर कहा - हे महालक्ष्मी इसने पूर्व जन्म में अवश्य दान-धर्म नहीं किया है , लेकिन इस जन्म में इसने पूर्ण श्रद्धा से मुझे यह आंवला भेंट किया है। इसके घर में कुछ नहीं होते हुये भी इसने यह मुझे सौंप दिया। इस समय इसके पास यही सबसे बड़ी पूंजी है , क्या इतना भैंट करना पर्याप्त नहीं है ? शंकराचार्य की इस बात से देवी लक्ष्मी प्रसन्न हुई और उसी समय उन्होंने गरीब महिला की कुटिया में स्वर्ण के आंवलों की वर्षा कर दी और महिला की कुटिया में सोने के आंवले बरसने लगे। अत: आंवला नवमी के दिन यह कथा पढ़ने और सुनने का बहुत महत्व माना गया है।