: यही तो मदर ऑफ डेमोक्रेसी है, प्यारे! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
Wed, Nov 22, 2023
देखा, मोदी जी के विरोधियों की कैसे फूंक सरक गई। पहले तो बड़ा शोर करते थे कि ये मदर ऑफ डेमोक्रेसी किस चिड़िया का नाम है! मोदी जी के राज में पब्लिक के लिए तो सिंपल डेमोक्रेसी के लाले पड़े हुए हैं और मोदी जी यह मनवाने पर और जो नहीं मानते हों, उनसे भी गला दबाकर कम-से-कम मुंह से यह कहलवाने पर तुले हुए हैं कि देश में डेमोक्रेसी की मम्मी जी आयी हुई हैं! आयी हुई हैं, यानी डेमोक्रेसी की मम्मी जी छाई हुई हैं। विरोधी दिन-रात ताने मारा करते थे कि डेमोक्रेसी की मदर में डेमोक्रेसी तो जरा भी नहीं है, बस मदर ही मदर नजर आती है। और मदर भी पुरानी फिल्मों की निरूपा राय वाली नहीं, बल्कि हूबहू ललिता पवार वाली मदर। कश्मीर वालों को तो चार साल से सौतेली मदर दिखाई दे ही रही थी, मणिपुर वालों को भी पिछले करीब छ: महीने से तो सौतेली मदर वाली फीलिंग आ ही रही है। हमदर्दी में कुछ-कुछ मिजोरम वालों को भी, जिसके चक्कर में नौ साल में पहली बार एक राज्य में चुनाव हो गया और मोदी जी को वीडियो संदेश पर ही गुजारा करना पड़ गया। दूसरे राज्यों में भी ऐसा हो जाए, तो मोदी जी तो बिल्कुल बेरोजगार ही हो जाएं। मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अब तो पिछड़ों को और हां, नौजवानों को भी, बाकायदा सौतेली मदर वाली ही फीलिंग आ रही है। मोदी जी डेमोक्रेसी की ये कैसी मदर जी लाए हैं कि बस अडानी जी-अंबानी जी वगैरह को ही, रीयल मदर वाली फील आ रही है; वगैरह, वगैरह। पर अब...।अब...विरोधी चुनाव आयोग से शिकायतें करते घूम रहे हैं कि मोदी जी ने तो डेमोक्रेसी की मदर जी को बहुत ही डेंजरस बना दिया है। वह तो लोगों से वोट भी ऐसे डलवाना चाहती है, जैसे मोदी के विरोधियों को फांसी दे रहे हों। जी हां, न एफआईआर, न मुकद्दमा, सीधे फांसी! मदर जी कह रही हैं कि इस बार मशीन का बटन ऐसे दबाना, जैसे मोदी जी के विरोधियों को फांसी दे रहे हो। कहते हैं, यह तो नफरत फैलाना हो गया, जी! वैसे यह पहली बार नहीं है, जब वोटिंग मशीन के बटन से सीधे मारकाट कराने की बात हो रही है। इससे पहले, दिल्ली के चुनाव के टैम पर मोदी जी के नंबर टू ने, इतने कसकर बटन दबाने की मांग की थी कि उसका झटका शाहीनबाग में जाकर लगे। यह दूसरी बात है कि एक और नौजवान मंत्री जी, जिनका नंबर पता नहीं जाने कौन सा है, इस मामले में मिस्टर नंबर-टू से भी आगे निकल गए। वो वोटिंग मशीन के भरोसे भी नहीं रहे और सीधे ‘‘गोली मारो’’ की पुकार कर आए। और ये तो सिर्फ चंद मिसालें हैं, जो फौरन ध्यान में आ रही हैं। याद आ रहा है कि 2014 के चुनाव से भी पहले, शाह साहब ने, जो तब तक नंबर टू भी नहीं हुए थे, शामली-मुजफ्फरनगर में ऐसे ही वोटिंग मशीन का बटन दबाकर, 2013 के दंगे के काम को आगे बढ़ाने की राह दिखाई थी। यानी जब से मोदी जी आए हैं और जब से सिंपल डेमोक्रेसी की जगह, उसकी मदर जी को लाए हैं, तब से वोटिंग मशीन यूं ही आग उगल रही है और कभी करेंट, तो कभी गोली और कभी फांसी के आदेश दे रही है।पर इसमें प्राब्लम क्या है? वोटिंग मशीन सिंपल वोट तो सिंपल डेमोक्रेसी में भी डलवा ही लेती है। बटन दबाने से सिंपल वोट ही पड़ता रहे, तो इसमें मदर ऑफ डेमोक्रेसी वाली क्या बात हुई? सिंपल वोट तो डेमोक्रेसी के सन-डॉटर वगैरह भी डलवा ही लेते हैं। मदर ऑफ डेमोक्रेसी में वोटिंग मशीन का बटन दबाने से एस्क्ट्रा एबी की तरह, कुछ तो एक्स्ट्रा होना बनता ही है -- फांसी या गोली या वह भी नहीं, तो कम से कम करेंट। बेचारा चुनाव आयोग चकराया घूम रहा है कि विरोधियों की शिकायत का करे तो, करे क्या? सिंपल वोटिंग मशीन का बटन दबाने से इतना कुछ एक्स्ट्रा कराने के लिए, मोदी जी और उनके संगी-साथी सजा के हकदार हैं या पुरस्कार के? खैर! सिर्फ विपक्ष वालों के कहने से, चुनाव आयोग डेमोक्रेसी में एक्स्ट्रा जोड़क़र दिखाने वालों का तिरस्कार तो नहीं ही करने जा रहा है। मोदी जी अगर डेमोक्रेसी को सिंपल से मदर बना रहे हैं, चुनाव आयोग का भी तो दर्जा उठा रहे हैं और उसे भी तो सिंपल चुनाव आयोग से, मदर ऑफ डेमोक्रेसी का चुनाव आयोग बना रहे हैं। उनके तिरस्कार की कृतघ्नता चुनाव आयोग हरगिज नहीं करेगा।और सबसे बड़ी बात यह कि विपक्ष वालों का यह इल्जाम खुद दिखाता है कि मोदी जी और उनके संगियों की डेमोक्रेसी में निष्ठा कितनी गहरी है। इस जमाने में कौन है वोट की ताकत में ही इतना यकीन करने वाला, जो वोट की मशीन के बटन से ही फांसी, गोली, करेंट, सब का काम लेने की कल्पना करता हो। मोदी जी सचमुच बहुत बड़े भविष्यचेता हैं। और कितने अहिंसक भी -- सारे के सारे हिंसक काम, वोटिंग मशीन के पूरी तरह से अहिंसक बटन को दबाने से होने के आदर्श की कल्पना करने वाले। कम से कम कोई साधारण मनुष्य तो ऐसी कल्पना नहीं ही कर सकता है। खैर! मोदी जी के देवत्व की बात अगर छोड़ भी दें तो भी, उनका डेमोक्रेसी को मदरत्व देना एक अटल सचाई है। यहां डेमोक्रेसी में फांसी दो है, यहां गोली मारो है, यहां करेंट लगाओ -- यही तो मदर ऑफ डेमोक्रेसी है, प्यारे!*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
: जादूगर ओ जादूगर! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
Wed, Nov 22, 2023
गहलौत को मोदी जी ने अच्छी तरह औकात बता दी। जनाब बड़े जादूगर बने फिरते हैं। कोई दूसरा कहे न कहे, खुद अपने को जादूगर कहते हैं। जरा सा राजस्थान में सरकार में पांच साल पूरे क्या कर लिए, जनाब खुद को बड़ा भारी जादूगर ही कहने लगे। माना कि पिछले चुनाव में बहुमत नहीं मिलने के बाद भी गहलोत साहब ने सरकार बना भी ली और फिर राजस्थान में मोदी भक्तों के मध्य प्रदेश दांव से, सरकार बचा भी ली। और राम-राम कर के गहलोत साहब ने सीएम की कुर्सी पर पांच साल पूरे भी कर लिए। माना कि मोदी जी की सरकार के रहते हुए, पब्लिक के बाहर बैठाने के फैसले के बाद भी, मोदी जी की पार्टी को पांच साल सरकार से बाहर बैठाए रखना और डबल इंजन के जमाने में अपनी सिंगल इंजन सरकार को पांच साल चलाते रहना, किसी चमत्कार से कम नहीं है। पर जादूगरी...इसमें जादूगरी वाली बात कहां है? पब्लिक की मेहरबानी से सरकार बन गयी और भाई लोगों ने जैसे-तैसे कर के पांच साल खींच लिए, इसे भी अगर जादूगरी कहेंगे, तो उसे क्या कहेंगे जो मोदीजी करते हैं?जादूगरी तो वो थी, जो मोदी जी ने मध्य प्रदेश में दिखाई। वहां भी तो राजस्थान की ही तरह, पब्लिक ने मोदी जी की पार्टी को सरकार से बाहर बैठाया था। मगर मोदी जी ने पब्लिक का फैसला ही पलट दिया और सरकार से बाहर बैठायी गयी अपनी पार्टी को, सरकार के अंदर और सरकार में बैठे कमलनाथ को सरकार से बाहर करा दिया। और यह चमत्कार कोई बाई चांस या लप्पे में नहीं हो गया। यह चमत्कार मोदी जी ने बार-बार कर के दिखाया है। मध्य प्रदेश से पहले, कर्नाटक में और मध्य प्रदेश के बाद, महाराष्ट्र में फिर वही चमत्कार। मोदी जी का चमत्कार, बार-बार। लगातार। हर बार। यह होता है चमत्कार और ऐसा चमत्कार करने वाले को कहते हैं जादूगर। ये क्या कि एक टुच्चा सा चमत्कार दिखाया नहीं और मांग करने लगे कि जनाब को जादूगर माना जाए।
वैसे भी एक ट्रिक से, वह चाहे कितनी ही कामयाब क्यों न हो, कोई जादूगर नहीं हो जाता है। जादूगर के पिटारे में कम से कम पांच-दस अच्छी-अच्छी ट्रिकें तो होनी ही चाहिए। इससे कम ट्रिक वाला जादूगर, किस बात का जादूगर होगा। इसलिए, अगर आज देश में कोई असली जादूगर है, तो नरेंद्र मोदी हैं। पब्लिक के वोट डालने के बाद भी, उसके चुनाव को बदलने का जादू तो करते ही हैं, कभी अति-प्रचार से तो कभी पुलवामा या बालाकोट से, वोट डालने से पहले पब्लिक का दिमाग घुमाने का जादू, उससे भी अच्छा करते हैं। और अपने विरोधियों को देश का विरोधी बनाने का जादू भी। जो भी करते हैं, उससे ठीक उल्टा भाषण में दिखाने का चमत्कार भी। सच को झूठ और झूठ को सच, भ्रष्ट को अपनी पार्टी में लाकर राजा हरिश्चंद्र और ईमानदार को भ्रष्ट बनाने का जादू भी। अडानी की सेवा को राष्ट्र सेवा और अडानी की हेराफेरी के विरोध को राष्ट्र का विरोध बताने का जादू भी। ऐसे असली जादूगर के रहते हुए, किसी गहलोत-वहलोत को जादूगर कौन मानता है जी!*(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
: युद्ध और शांति दोनों की चाह एक साथ — विश्व गुरु हो तो ऐसा!(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
Thu, Nov 2, 2023
भई इसे कहते हैं विश्व गुरु वाला दांव। एक साथ दो नावों पर सवारी। बेशक, मुश्किल काम है। बल्कि लोग तो जोखिम का काम भी कहते हैं। दो नावों की सवारी करना आसान नहीं। पर आसान काम तो कोई भी कर लेगा। विश्व गुरु वाले काम में कम से कम मुश्किल तो होनी ही चाहिए। अब एक मुंह से एक बात तो कोई भी बोल लेगा। पर एक साथ एक मुंह से दो अलग-अलग बातें कर के दिखाना यानी दो-मुंही बात क्या हर किसी के बस की बात है? और रही जोखिम की बात, तो छप्पन इंच की छाती, कम से कम किसी काम तो आनी चाहिए। यूं ही दिखाने के लिए कोई कब तक फालतू छाती फुलाए घूमता रह सकता है!
तो भाई विश्व गुरु वाली बात ये हुई कि अपने मोदी जी ने फोन कर के मिस्र के राष्ट्रपति अल सीसी से साफ-साफ कह दिया कि वह उनकी बात से सौ टका सहमत हैं; गाज़ा-इज़रायल के मामले में शांति और स्थिरता की शीघ्र बहाली जरूरी है। और तो और गाज़ा में बाईस लाख फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता मुहैया कराने की जरूरत पर भी, भारत पूरी तरह से सहमत है।पर इसमें मुश्किल वाली और जोखिम वाली यानी विश्व गुरु वाली कौन सी बात हो गयी। सरकारें भले न मानें, पर सारी दुनिया की पब्लिक देख रही है और यही तो कह रही है कि गाज़ा में आम नागरिकों का कत्लेआम बंद होना चाहिए। चारों तरफ से घेरे में बंद, बाईस लाख फिलिस्तीनियों पर इज़रायल जो अंधाधुंध बम बरसा रहा है, उसमें आठ हजार से ज्यादा जानें तो अब तक जा भी चुकी हैं। यह जनसंहार कम से कम अब तो बंद होना चाहिए। इज़रायल को निर्दोष नागरिकों और उसमें भी बड़ी तादाद में निर्दोष औरतों और बच्चों का कत्लेआम करने से रोका जाना चाहिए, वगैरह। पर यही तो विश्व गुरु दांव है कि इस सीधी सी बात में भी, विश्व गुरु वाली बात पैदा हो गयी। और यह कोई बिरला ही साध सकता है।मिस्र के राष्ट्रपति से फोन पर चर्चा हुई, वो दिन शनिवार का था। उससे पहले वाले ही दिन यानी शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने उस प्रस्ताव पर नोटा कर दिया, जिसमें ठीक यही कहा गया था कि गाज़ा-इज़रायल के बीच फौरन, मानवतावादी कारणों से युद्ध विराम होना चाहिए! शुक्रवार को यह मांग मंजूर नहीं थी कि मानवतावादी युद्ध विराम होना चाहिए। और शनिवार को युद्ध का जारी रहना मंजूर नहीं था, फौरन शांति और स्थिरता की बहाली चाहिए थी। एक साथ शांति और युद्ध दोनों चाहिए। एक साथ दोनों मांगना, विश्व गुरु से कम किसी के बस की बात है क्या!पर सच पूछिए तो विश्व गुरु होने के लिए एक मुंह से दो अलग-अलग बातें करना भी काफी नहीं है। माना कि यह भी आसान नहीं है, फिर भी काफी नहीं है। विश्व गुरु का सम्मान मुश्किल से मिलता है, पर हर मुश्किल चीज विश्व गुरु का आसन नहीं दिला सकती है। विश्व गुरु का आसन और आगे की चीज है। वह दो-मुंही बात बोलने से भी आगे की कलाकारी की मांग करता है। मसलन यही कि मोदी जी शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवतावादी युद्ध विराम की मांग पर नोटा करने के जरिए जो बोले और शनिवार को मिस्र से राष्ट्रपति को फोन कर के जो बोले, एक-दूसरे को काटते जरूर हैं। फिर भी पूरी तरह से नहीं। यानी दोनों के एक-दूसरे को काटने के बाद भी, कुछ बचा रहता है, मोदी जी के एक्स्ट्रा एबी वाले फार्मूले की तरह। यही है असली विश्व गुरुत्व। और यह होता कैसे है? दो मुंह से बोलते हैं। एक-दूसरे को काटने वाली बातें बोलते हैं। एक मुंह से युद्ध विराम नहीं और दूसरे मुंह से फौरन युद्ध विराम बोलते हैं। पर दोनों से सुर को ऐसे साध के बोलते हैं कि दोनों के वजन, अलग-अलग हों! दोनों मुंह एक-दूसरे की बात काटें, तब भी आखिर में कुछ एक्स्ट्रा बचा रह जाए।मसलन शनिवार को फोन पर युद्ध विराम के पक्ष में बोले, जबकि शुक्रवार को एक सौ बीस देशों की भीड़ के साथ, युद्ध विराम की मांग के पक्ष में तो खैर नहीं ही बोले, पर सीधे युद्ध विराम की मांग के खिलाफ भी नहीं बोले, अमेरिका-इज़रायल की तरह। न हां, न ना, बस चुप रहे। यानी युद्ध विराम की मांग के खिलाफ तो बोले, पर बोलकर नहीं, चुप रहकर! पर शनिवार को जो बोले, हालांकि शुक्रवार की तरह भीड़ के बीच नहीं, अकेले में बोले, पर बोलकर बोले, चुप रहकर नहीं। ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत पर तोल कर बताया जा सकता है कि भले ही युद्ध और युद्ध विराम, दोनों के पक्ष में बोले, पर युद्ध विराम के पक्ष में ज्यादा जोर से बोले! यह दूसरी बात है कि जरूरत होने पर पलड़ा दूसरी तरफ भी झुकाया जा सकता है -- शुक्रवार को जो भी बोले, सारी दुनिया के सामने बोले, जबकि शनिवार को जो बोले, मिस्र के राष्ट्रपति के कान में बोले। जो बोले सो तो किसी ने सुना नहीं, जो कहा कि बोले, सब सुनी-सुनाई है। अब आप-सुनी का ज्यादा वजन होगा या सुनी-सुनाई का।अब प्लीज कोई इसमें कन्फूजन की नकारात्मकता मत खोजने लग जाना। बेशक, एक्स्ट्रा भी दो निकल आते हैं, डिमांड के हिसाब से। युद्ध के पक्ष में होने की डिमांड हो, तो कनबतियों को कौन सीरियसली लेता है; सार्वजनिक रूप से चुप रहकर युद्ध जारी रहने का ही तो पक्ष लिया था। युद्ध विराम के पक्ष में एक्स्ट्रा की मांग हो तो; मुंह से बोलकर तो युद्ध विराम का ही पक्ष लिया है। बल्कि मानवतावादी सहायता मुहैया कराने तक का पक्ष लिया है यानी एक्स्ट्रा से भी एक्स्ट्रा। कुल मिलाकर, वक्त जरूरत के हिसाब से खुद को दोनों पालों में खड़ा दिखा सकने की पूरी व्यवस्था। चोर से कहे चोरी करते रहो, साहूकार से कहे जागते रहो! विश्व गुरु होने के लिए और कहां तक जाएंगे, गुरू!*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*