: श्रीमद्भागवत कथा का बार बार पान करें - पं० दिनेश दुबे
Mukesh Kumar Bharti
Sat, Sep 21, 2024
जांजगीर चाम्पा - श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि और सर्व वेदान्तों का सार है। अठारह पुराणों के उपवन में श्रीमद्भागवत कल्पतरु की भांति शोभायमान है। बारह स्कंध तथा अठारह हजार श्लोकों वाले यह पुराण ज्ञान का अक्षय भंडार तथा विद्धता की कसौटी है। यह जीव तभी तक अज्ञानवश इस संसारचक्र में भटकता है, जब तक क्षण भर के लिये भी कानों में इस शुकशास्त्र की कथा नहीं पड़ती। जिस प्रकार रस पेड़ ठी जड़ से लेकर शाखा तक व्याप्त रहता है , किंतु इस स्थिति में उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता। वही रस जब अलग होकर फल के रूप में आता है तब सभी को प्रिय लगता है। भागवत वेदरूपी कल्पकृक्ष का परिपक्व फल है। शुकदेव रूपी शुक के मुख का संयोग होने से अमृत रस से परिपूर्ण है। यह रस ही रस है। इसमें ना छिलका है , ना गुठली। यह इसी लोक में सुलभ है। इसलिये जब तक शरीर में चेतना रहे तब तक बार-बार इसका पान करें। इसके पठन एवं श्रवण से भोग और मोक्ष सुलभ होने के साथ ही साथ भगवान के चरणकमलों की अविचल भक्ति भी सहज प्राप्त हो जाती है। मन की शुद्धि के लिये इससे बड़ा कोई अन्य साधन नहीं हैं , इसके श्रवण मात्र से हरि हृदय में आ विराजते हैं।
उक्त बातें ब्राह्मणपारा चाम्पा में गोलोकवासी श्रीमति आशा द्विवेदी की स्मृति में आयोजित संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस आज भागवताचार्य पं० दिनेश कुमार दुबे ( पुरगांव वाले) ने मुख्य यजमान श्रीमति श्वेता जयप्रकाश द्विवेदी सहित उपस्थित श्रोताओं को कथा श्रवण कराते हुये कही। आगे राजा परीक्षित की कथा का श्रवण कराते हुये भागवताचार्य ने कहा महाभारत युद्ध में कौरवों ने पांडवों के सारे पुत्रों का वध कर दिया था , तब उनका एकमात्र वंशधर अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहा था। पांडवों के पूरे वंश को खत्म करने के लिये कौरवों के साथी अश्वत्थामा ने उस गर्भस्थ बालक पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया , तब भगवान श्रीकृष्ण ने उतरा के गर्भ में प्रवेश कर उस बालक की ब्रहस्त्र से रक्षा की। गर्भ में कठिन परीक्षा होने के कारण यही बालक परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुये और आगे चलकर राजा हुये। पांडवों ने संसार त्याग करते समय इनका राज्याभिषेक किया था , इन्होंने नीति के अनुसार पुत्र के समान प्रजा का पालन किया। एक समय ये दिग्विजय करने को निकले तो वहां कुरुक्षेत्र में इन्होंने देखा एक आदमी बैल को मार रहा है। वह आदमी जो वास्तव में कलियुग था , उसको इन्होंने तलवार खींचकर आज्ञा दी की यदि तुझे अपना जीवन प्यारा है तो मेरे राज्य से बाहर हो जा। तब कलियुग ने डरकर हाथ जोड़कर पूछा कि महाराज समस्त संसार में आपका ही राज्य है फिर मै कहां जाकर रहूं। राजा ने पांच स्थान बताते हुये कहा जहां मदिरा , जुआ , जीव हिंसा , वैश्यागमन और सुवर्ण हो वहां जाकर रहो। एक बार राजा सुवर्ण का मुकुट पहनकर आखेट खेलने के लिये गये और शिकार करते हुये वे वन में भटकते हुये भूख-प्यास से व्याकुल होकर ऋषि शमीक के आश्रम में पहुंचे। ऋषि उस समय ध्यान में लीन थे , राजा ने उन्हें पुकारा तो भी ऋषि का उन पर ध्यान नहीं गया। राजा को लगा कि ऋषि शमीक ने जानबूझकर उनका अपमान किया है , गुस्से में एक मरे हुये सांप को तीर से उठाकर ऋषि के गले में डाल वे वहां से चले गये। बाद में पहुंचे ऋषि शमीक के तेजस्वी पुत्र श्रृंगी ऋषि को इसका पता लगा तो उन्होंने क्रोधित होकर राजा परीक्षित को सात दिन में तक्षक नाग से काटे जाने का श्राप दे दिया। कथा की अगली कड़ी में व्यासाचार्य ने वराह अवतार की कथा श्रवण कराते हुये कहा पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुये। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया और अंतत: पृथ्वी का पता लगाकर समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आये। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिये ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ और अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। भागवताचार्य ने बताया कि का अर्थ है हिरण्य मतलब स्वर्ण और अक्ष मतलब आंखें। जिसकी आंखें दूसरे के धन पर लगी रहती हों , वो वही हिरण्याक्ष है। हिरण्याक्ष का वध करने के बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। इसके पश्चात भगवान वराह अंतर्धान हो गये।
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