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: आईपीएस रतन लाल डांगी ने दी महावीर जयंती की शुभकामनायें

Mukesh Kumar Bharti

Thu, Apr 6, 2023
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट रायपुर - वरिष्ठ आईपीएस एवं राज्य पुलिस अकादमी चंदखुरी के निदेशक रतन लाल डांगी ने जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की जयंती के अवसर पर आज प्रदेशवासियों को बधाई एवं शुभकामनायें दी हैं। उन्होंने कहा कि महावीर स्वामी के अनुसार अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। किसी के अस्तित्व को मिटाने की अपेक्षा उसे शांति से जीने दो और स्वयं भी शांति से जियो , इसी में सभी का कल्याण है। इस संसार में जितने भी जीव हैं उनके प्रति दया भावना रखों। जिसके मन में सदैव धर्म रहता है और जो धर्म के मार्ग पर चलता है देवता भी उसे नमस्कार करते हैं। अहिंसा , तप और संयम ही धर्म है। क्षमा के बारे में महावीर स्वामी ने कहा कि सभी जीवों से मेरा मैत्री भाव है मुझे किसी से कोई बैर भाव नहीं है मेरे द्वारा किये गये अपराध की मैं क्षमा मांगता हूं और उनके द्वारा किये गये अपराधों को क्षमा करता हूं। इस तरह से उन्होंने क्षमा मांगना और क्षमा करना दोनों ही गुणों के बारे में बताया है। महावीर स्वामी के अनुसार सत्य ही सच्चा तत्व है जो सत्य को जान लेता है वह मृत्यु को भी तैरकर पार कर जाता है। अपरिग्रह अर्थात कोई भी वस्तु संचित ना करना , किसी के प्रति लोभ मोह ना रखना। जो व्यक्ति सजीव या निर्जीव वस्तुओं का संग्रह करता है या उसे करने की सम्मति देता है , उसे दुखों से छुटकारा प्राप्त नहीं होता है। महावीर की शिक्षायें आत्मा की आंतरिक सुंदरता, शक्ति और सामंजस्य को दर्शाती हैं। उन्होंने मानव जीवन की सर्वोच्चता का ज्ञान सिखाया और जीवन के सकारात्मक दृष्टिकोण के महत्व पर बल दिया। महावीर ने कहा - एक जीवित शरीर केवल अंगों और मांस का एकीकरण नहीं है बल्कि यह आत्मा का निवास है , जिसमें अनंत-ज्ञान , अनंत-दर्शन , अनंत-वीर्य और अनंत सुख निहित है। दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा आप अपने साथ चाहते हैं। जिस प्रकार आप दुःख पसंद नहीं करते उसी तरह और लोग भी इसे पसंद नहीं करते। यह जानकर आपको उनके साथ वो नहीं करना चाहिये जो आप उन्हें अपने साथ नहीं करने देना चाहते। जियो और दूसरों को जीने दो , सभी प्राणियों को जीवन प्रिय है। तू जिसे मारना चाहता है , (जिसको कष्ट व पीड़ा पहुँचना चाहता है) वह अन्य कोई तेरे समान ही चेतना वाला प्राणी है , ऐसा समझ। वास्तव में वह तू ही है। ऐसा सत्य वचन बोलना चाहिये जो हित , मित और ग्राह्य हो अर्थात जो सुखद हो और दूसरों के लिये हानिकारक ना हो। यदि सत्य बोलने से किसी को चोट पहुँचने अथवा किसी की मृत्यु होने की संभावना हो तो चुप रहना बेहतर है। सभी प्रकार के व्यवहार में ईमानदार रहें। किसी को धोखा ना दें। दूसरों की संपत्ति को हड़पने अथवा हासिल करने के लिये अनैतिक साधनों का प्रयोग ना करें। अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य के साथ शारीरिक संबंध ना बनायें। जीवनसाथी के साथ संबंधों में संयम बरतें। अपनी आवश्यकता से अधिक धन संचय ना करें। आपका आवश्यकता से अधिक संग्रहित धन समाज के लिये है , इसे समाज के कल्याण के लिये अर्पित करें। यदि सोने और चाँदी के कैलाश पर्वत के समान असंख्य पर्वत भी मिल जाये तो भी लोभी मनुष्य को उससे संतोष नहीं होगा , क्योंकि इच्छायें आकाश के समान अनंत हैं। अतः अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करें। सांसारिक सम्पदा के मोह से बचें। तुम बाहर में मित्रों को क्यों ढूँढते हो ? तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और तुम स्वयं ही अपने शत्रु हो। सदाचार में प्रवृत आत्मा मित्र है और दुराचार में प्रवृत होने पर वही शत्रु है। आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है। असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं वो शत्रु हैं क्रोध , घमंड , लालच , आसक्ति और नफरत। बाहरी दुश्मनों से लड़ने की अपेक्षा इन दुश्मनों से लड़ें। स्वयं पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है। सभी स्थितियों में समभाव रखें। सुख और दुख में , आनंद और कष्ट में एक समान रहें। प्रिय हो या अप्रिय , सब को समभाव से सहना चाहिये। याद रखें कि कर्मों से कोई पलायन नहीं है। कर्म अनंत जन्मों तक कर्त्ता का पीछा करते हैं। हमारी मन , वचन और काया की सभी क्रियायें ऐसी हों कि नये कर्मों को आकर्षित। जैन धर्म में भगवान अरिहन्त (केवली) और सिद्ध (मुक्त आत्मायें) को कहा जाता है। जैन धर्म इस ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति , निर्माण या रखरखाव के लिये जिम्मेदार किसी निर्माता ईश्वर या शक्ति की धारणा को खारिज करता है । यह जगत अनादि-अनंत है । कोई ईश्वर या परमात्मा नहीं है जो इस जगत को चलाता हो । यह जगत स्वयं संचालित है। उसी प्रकार जैन दर्शन कर्म को प्रकृति के मौलिक कण के रूप में मानता हैं । जिन्होंने कर्म क्षय कर केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया है , उन्हें अरिहंत कहते है। तीर्थंकर विशेष अरिहन्त होते है जो 'तीर्थ' की रचना करते है , यानि की जो अन्य जीवों को मोक्ष-मार्ग दिखाते है। जैन दर्शन में व्यक्ति पूजा का कोई स्थान नहीं है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्य साधारण रूप में जन्म लेता है , परंतु अपनी इंद्रिय संयम और आत्म विजय की साधना के बल पर हर व्यक्ति महान बन सकता है। वरिष्ठ आईपीएस डांगी ने कहा कि महावीर स्वामी के सिद्धांत और उपदेश आज भी प्रासंगिक हैं। उनके दिखाये रास्ते पर चलकर और दीन- दुखियों की सेवा कर सभी एक खुशहाल समाज के निर्माण कर सकते हैं।

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