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: परंपरा एवं उल्लास के साथ मां समलेश्वरी की धरा में विसर्जित हुआ जवारा

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट चांपा - कोसा , कांसा और कंचन की नगरी एवं मां समलेश्वरी की पावन धरा चांपा में नौ दिन तक चले इस शारदीय नवरात्रि का समापन आज ज्योत जवारा विसर्जन के साथ हुआ। मांदर की थाप और माता के जसगीतों की धुन पर शहर एवं आसपास के हजारों श्रद्धालुओं ने उन्हें श्रद्धा एवं भक्ति भाव से उन्हें विदा किया। मां समलेश्वरी मंदिर प्रांगण से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विधिपूर्वक पूजन पश्चात शोभायात्रा के साथ जवारा विसर्जन कार्यक्रम की शुरुआत हुई। लगभग तीन सौ महिलायें सोलह श्रृंगार के साथ पारंपरिक परिधान में गाजे बाजे के साथ सिर पर कलश धारण कर ज्वारा विसर्जन के लिये निकली , जो बड़े ही धार्मिक वातावरण में देर रात्रि शहर के बीच स्थित रामबांधा तालाब में विसर्जित की गई। माता के कई भक्त मुंह में बाना छिदवाकर जवारा विसर्जन के लिये निकले। इसके पहले लगभग मनोकामना पूर्ति हेतु लगभग 250 से अधिक श्रद्धालु भक्त लोट मारते निकले। मां समलेश्वरी मंदिर में इस नवरात्रि में मनोकामना पूर्ति हेतु तीन सौ घृत ज्वारा कलश के साथ दो हजार तेल ज्योति कलश प्रज्वलित किये गये थे। उल्लेखनीय है कि लगभग 1700 ईंसवी में चांपा जमींदारी की स्थापना नेमसिंह के हाथों हुई थी। कुंवर रामसिंह ने सन 1779-1843 में चांपा नगर को बसाया । इस तरह जमींदारी का इतिहास 250 वर्ष प्राचीन हैं। कालान्तर में रतनपुर राज्य से अलग करके इस क्षेत्र को संबलपुर राज्य से मिला दिया गया। वर्ष 1862 में चांपा के भूतपूर्व जमींदार नारायण सिंह ने समलेश्वरी की काले पत्थरों से निर्मित अत्यंत प्राचीन प्रतिमा संबलपुर से लाई और यहां एक छोटे से मंदिर में प्रतिस्थापित करवाई। धर्म और आस्था में विश्वास रखने वाले शशिभूषण सोनी ने बताया कि इस वर्ष बड़े ही हर्षोल्लास के साथ शारदेय‌ नवरात्रि पर्व मनाया गया।आस्था के दीप राजपरिवार के प्रमुख कुंवर भीवेद्र बहादुर सिंह , उनके सुपुत्र आर्यवीर सिंह तथा समिति के कोषाध्यक्ष विजय कुमार सोनी की अगुवाई में सर्वप्रथम दीप प्रज्जवलित कर पूजा-अर्चना किया गया।शशिभूषण ने आगे कहा किंवदंती यह भी हैं कि इस मूर्ति के स्थान पर पहले काष्ठ मूर्ति मंदिर में स्थापित की गई थी। जमींदार रामसिंह के पिताश्री दीवान नारायण सिंह ने अपने शासनकाल में उड़ीसा राज्य के संबलपुर जिले से काले पत्थर की मूर्ति स्थापित एवं प्राण-प्रतिष्ठा की , तब से आज तक अनवरत रुप से यहां पूजा-अर्चना निरंतर चल रहा हैं। संबलपुर से मूर्ति लाने के कारण देवी की मूर्ति को समलेश्वरी देवी के नाम से मान्यता दी गई हैं । सोने-चांदी के आभूषणों में कलाकृति करने वाले वयोवृद्ध शिल्पी , सराफा कारोबारी एवं निराला साहित्य मंडल, चांपा के अध्यक्ष रहें स्वर्गीय मोहित राम सराफ ने जनसहयोग से मंदिर को चांदी का शयनयान एवं मुकुट बनाकर अर्पण किया हैं। समलेश्वरी देवी का दर्शन करने से सारे दुःख दर्द और संकट दूर हो जाते हैं, यही कारण है कि शुभ मांगलिक कार्य करने के पूर्व और पश्चात् लोग समलेश्वरी देवी के मंदिर में दर्शन-पूजन और आशिर्वाद प्राप्त करने अवश्य आते हैं। वहीं मां समलेश्वरी व्यवस्थापन समिति चांपा के कोषाध्यक्ष विजय कुमार सोनी मंगलमय ज्वेलर्स ने विशेष जानकारी देते हुये बताया कि राजा साहब जमींदार परिवार द्वारा स्थापित मां समलेश्वरी की महिमा बड़ी निराली है। मां समलेश्वरी से आशीर्वाद लेने के बाद ही नवदंपत्ति अपनी गृहस्थ जीवन की शुरुआत करते हैं। यहां हर साल चैत्र व क्वांर नवरात्रि में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित होती है और यहां जवारा का अनूठे तरीके से विसर्जन किया जाता है।

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