: शंकराचार्यजी को वैदिक रीति से दी गई भू-समाधि
Wed, Sep 14, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
नरसिंहपुर - ज्योतिषपीठ बद्रीनाथ और शारदा पीठ द्वारका के श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी को आज उनके आश्रम परमहंसी गंगा आश्रम झौतेश्वर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूरे राजकीय सम्मान के साथ समाधि दी गई। काशी से पहुंचे साधु-संतों ने रीति-रिवाज और धार्मिक कर्मकांड से उनकी अंतिम यात्रा और समाधि संपन्न कराई। इससे पहले भजन कीर्तन के साथ उन्हें पालकी में बैठाकर समाधि स्थल तक लाया गया। इस दौरान हजारों की संख्या में उनके शिष्य, अनुयायी और श्रद्धालु मौजूद रहे। जिन्होंने नम आंखों से जय गुरुदेव के नारा लगाते हुये अपने गुरुदेव को अंतिम विदाई दी। उनके अंतिम दर्शन करने के लिये मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी वहां पहुंचे और श्रद्धांजलि अर्पित की। इसी के साथ उनके उत्तराधिकारियों की भी घोषणा की गई। अब स्वामी सदानंद सरस्वती को द्वारका शारदापीठ का और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष्पीठ बद्रीनाथ का प्रमुख घोषित किया गया है। दोनों के नाम की घोषणा शंकराचार्य स्वरूपानंद की पार्थिव देह के सामने की गई। ज्योतिष एवं द्वारका पीठ के पीठ पंडित आचार्य रविशंकर द्विवेदी शास्त्री ने बताया कि कर्नाटक से गौरी शंकर सचिव ने अभिषेक एवं पट्टा वस्त्र उढ़ाकर शंकराचार्य की घोषणा की। घोषणा के बाद 108 कलश जल से ब्रह्मलीन स्वामी जी को स्नान कराया गया , फिर उनका दुग्ध अभिषेक किया गया और उनके मस्तक पर शालिग्राम जी को स्थापित किया गया। फिर पालकी में शंकराचार्य की पार्थिव देह को परिक्रमा कराते हुये समाधि स्थल लाया गया और समाधि की प्रक्रिया शुरू की गई। बनारस के आचार्य पंडित अवध राम पांडे के आचार्यत्व में भू समाधि कार्यक्रम हुआ। इस दौरान विशेष रूप से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ, विधायक जयवर्धन सिंह, राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा, महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू, मैथिली तिवारी, केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल, शेखर चौधरी, सुरेश पचौरी, विधायक अजय विश्नोई, विधायक लखन घनघोरिया मौजूद रहे। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित विभिन्न राजनेताओं और साधु संतों ने शंकराचार्य जी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि स्वामीजी सनातन धर्म के ध्वजवाहक और हमारी संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के पोषक, योद्धा और संन्यासी थे। उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई भी लड़ी। उन्होंने लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी और गरीबों, जनजातियों, दलितों की सेवाओं के लिए प्रयास किये। वे विद्वान एवं अद्भुत सन्त थे। शिवराज सिंह चौहान ने ब्रम्हलीन स्वामी जी के चरणों में प्रणाम करते हुये कहा कि वे सनातन धर्म के सूर्य थे. उनके जाने से प्रदेश सूना हो गया। उन्होंने कहा कि स्वामीजी ने हमें जो राह दिखाई है , हम सभी उस पर चलने का विनम्र प्रयास करेंगे। बताते चलें कि हिन्दुओं के सबसे बड़े धर्मगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी रविवार को नरसिंहपुर में परमहंसी आश्रम में ब्रह्मलीन हो गये थे। विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार समाधि स्थल पर कुछ दिनों बाद एक मंदिर बनाया जायेगा और उसमें शिवलिंग की स्थापना की जायेगी।
: शंकराचार्य के ब्रह्मलीन होने से हुआ एक आध्यात्मिक युग का अन्त
Sun, Sep 11, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टनरसिंहपुर - हिन्दूओं के सबसे बड़े धर्मगुरु और देश की चार प्रमुख पीठों में शामिल द्वारका शारदापीठ एवं ज्योतिर्मठ बद्रीनाथ धाम के श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (99 वर्षीय) आज मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में स्थित गोटेगांव के समीप के झोतेश्वर धाम में ब्रह्मलीन हो गये। अभी हाल ही में उन्होंने 03 सितंबर को हरियाली तीज के दिन अपना 99वां जन्मदिन मनाया था। वे विगत कई दिनों से बीमार थे। उनका उपचार पहले बेंगलुरु में चल रहा था और हाल ही में वे आश्रम लौटे थे। काफी दिनों तक उपचाराधीन रहने के दौरान आज उनका देवलोकगमन हो गया। अंतिम समय में शंकराचार्य के अनुयायी और शिष्य उनके समीप थे। उनके नहीं रहने की खबर लगते ही आसपास से उनके श्रद्धालु और शिष्यों की भीड़ आश्रम पहुंचने लगी। कल सोमवार को देर शाम परमहंसी गंगा आश्रम में उन्हें समाधि दी जायेगी। बताते चलें लगभग 2500 साल पहले आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ने हिंदुओं और धर्म के अनुयायी को संगठित करने और धर्म के उत्थान के लिये पूरे देश में चार धार्मिक मठ बनाये थे। इन चार मठों में से एक श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती थे , जिनके पास द्वारका मठ और ज्योतिर मठ दोनों थे।
स्वतन्त्रता सेनानी , रामसेतु रक्षक , गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करवाने वाले तथा रामजन्मभूमि के लिये लम्बा संघर्ष करने वाले , गौरक्षा आन्दोलन के प्रथम सत्याग्रही , रामराज्य परिषद् के प्रथम अध्यक्ष , पाखण्डवाद के प्रबल विरोधी रहे थे।आजादी की लड़ाई से लेकर श्रीराम मंदिर आंदोलन में हुई कानूनी लड़ाई तक में स्वरुपानंद ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया था।
गौरतलब है कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म मध्यप्रदेश राज्य के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार 02 दिसंबर 1924 में हुआ था। उनके माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा था। महज नौ साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ धर्म की यात्रा शुरू कर दी थी। इस दौरान वे उत्तरप्रदेश के काशी भी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। आपको जानकर हैरानी होगी कि वर्ष 1942 के इस दौर में वे महज 19 साल की उम्र में क्रांतिकारी साधु के रुप में प्रसिद्ध हुये थे। क्योंकि उस समय देश में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई चल रही थी। वे नौ महीने वाराणसी की जेल में और छह महीने मध्यप्रदेश की जेलों में रहे। उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन को नई उड़ान देने के लिये वर्ष 1950 में दांडी सन्यास लिया था। जिसके बाद उन्हें वर्ष 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली थी। वर्ष 1950 में ज्योतिषपीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।बीजेपी-विहिप को लगाई थी फटकारश्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्परूपानंद सरस्वती ने श्रीराम जन्मभूमि न्यास के नाम पर विहिप और भाजपा को घेरा था। उन्होंने कहा था- अयोध्या में मंदिर के नाम पर भाजपा-विहिप अपना ऑफिस बनाना चाहते हैं , जो हमें मंजूर नहीं है। हिंदुओं में शंकराचार्य ही सर्वोच्च होता है और हिंदुओं के सुप्रीम कोर्ट हम ही हैं। मंदिर का एक धार्मिक रूप होना चाहिये , लेकिन ये लोग इसे राजनीतिक रूप देना चाहते हैं जो कि हम लोगों को मान्य नहीं है।पुरी शंकराचार्य ने की श्रद्धासुमन समर्पितद्वारका शारदापीठ और ज्योतिर्मठ बद्रीनाथ धाम के शंकराचार्य के ब्रह्मलीन होने पर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य गोवर्धन मठ पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने कहा - आस्था और अपनत्व के केन्द्र स्वनामधन्य श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द -सरस्वती जी महाभागके देहावसानसे हम दुःखी हैं। ब्रह्मलीन आचार्यके चिन्मय करकमलोंमें श्रद्धासुमन समर्पित है।
: एमपी के गो अभ्यारण की व्यवस्था पथमेड़ा गोधाम को स्थांतरित
Wed, Aug 17, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टभोपाल - श्रीगोधाम महातीर्थ पथमेड़ा लोक पुण्यार्थ न्यास और मध्यप्रदेश गोसंवर्धन बोर्ड के बीच एक अनुबंध पर हस्ताक्षर हुये जिसके तहत मध्यप्रदेश शासन द्वारा संचालित भारत का प्रथम गोआभ्यारण गौसेवा और संवर्धन हेतु 30 वर्षों के लिये पथमेड़ा गोधाम को हस्तांतरित कर दिया गया है। यह गो अभ्यारण्य आगर जिले के सालरिया गांव के अंदर स्थित हैं जो तीन हजार बीघों में फैला हुआ हैं , जिसमें गोवंश मुक्त रूप से चर विचर सकता हैं।
मालवा नस्ल के गोवंश की सेवा और नस्ल सुधार के उद्देश्य से एमपी सरकार द्वारा वर्ष 2017 में इसकी स्थापना की थी। इसमें 24 पक्के गोआवास तथा अधिकारियों , कर्मचारियों और ग्वालों के रहने हेतु पक्के आवास बने हुये हैं। इसकी क्षमता छह हजार गोवंश की हैं।वर्तमान में इस गो अभ्यारण्य में तीन हजार गोवंश संरक्षित हैं। इस अभ्यारण्य में हरे भरे घास के मैदान / चारा उत्पादन हेतु खेत, / तालाब आदि सब सुविधाये हैं। पथमेड़ा की गौसेवा से प्रभावित होकर एमपी सरकार द्वारा इस गोअभ्यारण्य को और अधिक विकसित करने के लिये हस्तांतरित किया गया हैं। भूमि और संपत्ति का स्वामित्व सरकार का ही रहेगा। दस वर्ष तक गौसेवा का संपूर्ण व्यय सरकार द्वारा इस संस्था को दिया जायेगा , अगले दस वर्ष तक आधा व्यय तथा अगले दस वर्ष तक एक चौथाई व्यय सरकार द्वारा दिया जायेगा। तब तक कृषि और घास के मैदानों को पूर्ण विकसित कर दिया जायेगा ताकि गौसेवा पर कम से कम व्यय हो। कृषि और अन्य विकास कार्यों के लिये भी मध्यप्रदेश सरकार पूरा सहयोग करेगी। अनुबंध पर हस्ताक्षर के समय पथमेड़ा की ओर से पूज्य ग्वाल संत श्रीगोपालाचार्य स्वामी गोपालानंद सरस्वती जी महाराज / पूज्य संत प्रहलाद महाराज / केंद्रीय कार्यालय प्रमुख धनराज चौधरी / अंबा लाल सुथार मैनेजिंग ट्रस्टी / गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा / ब्रह्मदत्त पुरोहित मैनेजिंग ट्रस्टी श्रीनंदगांव / गोभक्त राजेश जी माहेश्वरी / गोभक्त गोपाल राजपुरोहित / ग्वाल शक्ति सेना राष्ट्रीय अध्यक्ष गौवत्स ओमप्रकाश तथा मध्यप्रदेश शासन की ओर से गो संवर्धन बोर्ड के प्रबंध संचालक / रजिस्टार व संयुक्त निदेशक उपस्थित रहे।