: साधना शिविर में शंकराचार्यजी ने धर्म, अध्यात्म और राष्ट्र संबंधी जिज्ञासाओं का किया समाधान
Mukesh Kumar Bharti
Wed, May 1, 2024
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
सीकर - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर एवं हिन्दू राष्ट्र प्रणेता अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगदुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज के सानिध्य में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले त्रिदिवसीय साधना एवं राष्ट्र रक्षा शिविर इस वर्ष खाटू श्यामजी सीकर राजस्थान में आयोजित हो रहा है। इस साधना शिविर में आध्यात्मिक संदेश के साथ साथ शंकराचार्य जी के श्रीमुख से धर्म, अध्यात्म, राष्ट्र से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान का सुअवसर मिलता है। एक जिज्ञासु के प्रश्न कि जिस प्रकार हमारे ब्रह्माण्ड में शिव, ब्रह्मा, विष्णु, नवग्रह आदि के समान अन्य ब्रह्माण्ड में भी इसी प्रकार देवता होते हैं। शंकराचार्य जी ने जिज्ञासा शांत करते हुये कहा कि स्कंद पुराण के अनुसार श्री ब्रह्माजी द्वारा अपने चिन्मय कर कमलों के द्वारा दारु ब्रह्म श्रीजगन्नाथ आदि को पुरी में प्रतिष्ठित किया और जगन्नाथ जी की स्तुति करते हुये अनंत कोटि ब्रह्माण्ड का उल्लेख किया है। हमारे ब्रह्माण्ड के समान कुल साढ़े तीन करोड़ ब्रह्माण्ड हैं तथा प्रत्येक में ब्रह्मा समेत सभी देवता विराजमान रहते हैं। जब हम अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक कहते हैं तो इसका तात्पर्य महा विष्णु आदि देवता होते हैं। तीन कृत्य उत्पत्ति, स्थिति और संहार क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, शिव को व्यक्त करते हैं। पांच कृत्य कहने पर इसमें निग्रह और अनुग्रह जुड़ने पर पंच देवों जिसमें गणेश और शक्ति शामिल हो जाते हैं, यही पंच देवों की उपासना है जिसमें अन्य सभी देव समाहित हैं। निग्रह का अंतर्भाव संहार तथा अनुग्रह का अंतर्भाव स्थिति है इस प्रकार तीन कृत्यों के द्वारा त्रिदेव के कार्य निष्पादित होते हैं। अन्य जिज्ञासा जिसमें यह कहा गया कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करने पर कितने दिनों में सिद्धि की प्राप्ति हो सकती है। महाराज श्री कहते हैं कि सिद्धि होने तक शुद्ध पाठ करना आवश्यक है या किसी योग्य ब्राह्मण से शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कर फिर स्वयं शुद्ध उच्चारण के साथ नियम, संयम से पाठ करने से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। ऊर्जा के स्थानांतरण हेतु यंत्र, तंत्र, मंत्र की क्या विधि हो सकती है। शंकराचार्य जी कहते हैं कि संयम के साथ ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। योग दर्शन में संयम शब्द प्रयुक्त हुआ है। धारणा के बल पर ऊर्जा का संचार हो सकता है, रोग का निवारण हो सकता है। संयम से साधना करते करते शक्ति का शक्तिपात होता है। साधना के समय मंत्र जप या नाम जप करने में समय किस बात पर निर्भर करता है। भगवान् श्री कहते हैं कि लक्ष्य तक पहुंचने में गमन क्रिया की आवश्यकता होती है। श्री रामानुजाचार्य जी के अनुसार भगवान् की शरणागति कर्तव्य नहीं है। जिस प्रकार अंधकार को निरस्त करने के लिए प्रकाश अपेक्षित है, अज्ञान को निरस्त करने हेतु ज्ञान आवश्यक है। उसी प्रकार अनात्म वस्तुओं के आत्म मान्यता के निरसन संयम है। संयम से साधना करने पर सिद्धि प्राप्त हो सकती है। सिद्धि मिलने तक साधन का अनुष्ठान आवश्यक है। श्रवण के द्वारा अज्ञान का नाश होता है, मनन के द्वारा संशय का नाश होता है। गुरु, ग्रंथ और गोविन्द का आशय स्पष्ट करते हुये शंकराचार्य जी कहते हैं कि गुरु वह होता है जो ग्रंथ ( वेदादि) को मानता है। तथा गुरु ही ग्रंथ का आलम्बन लेकर गोविन्द तक पहुँचाता है।
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