: हाँ, ट्रेन हत्यारा मनोरोगी है, मगर उस रोग का वायरस कौन है?,(आलेख : बादल सरोज)
Sun, Aug 6, 2023
जयपुर-मुम्बई ट्रेन में जो हुआ वह भयानक है -- अत्यंत खतरनाक स्तर का भयानक है ; लेकिन अचानक नहीं है।यह एक संक्रमण का परिणाम तो है ही, इसी के साथ उसके भीषण रूप से संक्रामक होने का एलान भी है। आरपीएफ जवान चेतन कुमार सिंह ने हत्याओं की शुरुआत एएसआई टीकाराम मीणा से की, क्योंकि उसके साथ राजनीतिक बहस के बीच जब वह मुसलमानों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर रहा था, तब मीणा ने उससे असहमति जताई थी और उसकी टुकड़ी के इंचार्ज होने के नाते इस एएसआई ने उसे टोका था और ऐसी बातें न करने के लिए कहा था। मीणा की असहमति का जवाब इसने गोली से उनकी जान लेकर दिया। वह यहीं तक नहीं रुका। उसके बाद बी-4, बी-5 और पैंट्री कार - तीन अलग-अलग डिब्बों - में जाकर बिना किसी उकसावे, बिना किसी व्यक्तिगत जान-पहचान के सिर्फ उनकी मुस्लिम पहचान के बिना पर तीन सवारियों को भून दिया। यह सुबह-सुबह की, साढ़े पांच बजे भोर की बात है, जब यह माना जाता है कि मानसिक शान्ति सबसे उत्तम होती है। बात इतने तक ही नहीं रुकी, इस दिल दहला देने वाले हत्याकाण्ड को अंजाम देने के बाद उसने बिना किसी भावावेश में आये, लाश के सिरहाने खड़े होकर बाकायदा "भाषण" दिया, इसमें उसने कहा कि : "ये लोग (मुसलमान) पाकिस्तान से ऑपरेट होते हैं, (ऐसा) हमारी मीडिया कवरेज दिखा रही है। पता चल रहा है उनको, सब पता चल रहा है। इनके आका हैं वहां। अगर वोट देना है, हिंदुस्तान में रहना है, तो मैं कहता हूँ मोदी-योगी को दीजिये। यही दो हैं!!"अत्यंत संयत शब्दों में दिए इस भाषण में कही गयी उसकी बातें इस बीमारी के अब महामारी बनने की ओर अग्रसर होने के लक्षण दिखाने वाली हैं, इसकी व्याप्ति और उसके उदगम दोनों को साफ़-साफ़ सामने लाने वाली हैं। बीमारी का यह नया प्रकार है। इसे धर्मोन्माद नहीं कहा जा सकता, यहाँ कोई कथित आहत भाव का मसला नहीं था। यह भीड़ हत्या का मसला भी नहीं था -- दूर-दूर तक न कोई गाय थी, न कोई पशुओं का व्यापारी ही था। एएसआई मीणा तो मुस्लिम भी नहीं था। भारत के साम्प्रदायिक खूंरेजी के इतिहास की यह पहली घटना है, जहां किसी भगवान् या खुदा या गॉड या पैगम्बर के बहाने नहीं, घोषित रूप से दो नेताओं - मोदी और योगी - का नाम लेकर चार लोग मार दिए गए ; वह भी उसके द्वारा जिसकी ड्यूटी ही उनकी सुरक्षा के लिए लगाई गयी थी। जाहिर है कि ये हत्याएं किसी झक्की, सनकी, चिड़चिड़े व्यक्ति द्वारा किया गया काण्ड नहीं है। ये एक ख़ास राजनीति के पक्ष में की गयी राजनीतिक हत्याएं हैं ; उसके बाद दिया गया भाषण किसी मनोरोगी का प्रलाप नहीं है -- एक राजनीतिक वक्तव्य है। जिन मोदी और योगी का नाम लिया गया है, उनकी राजनीति का निर्दोषों के खून की स्याही और एके-47 की राईफल से लिखा गया आख्यान है।इस हत्याकाण्ड के बाद ज्यादातर मीडिया, हमारी नजर में आये हिंदी अखबारों, ने इस भाषण के बारे में, खासतौर से उसके आख़िरी हिस्से के बारे में, चुप्पी साधने का रास्ता चुना। मोदी-योगी वाली बात छुपाने की कोशिश की। पुलिस द्वारा दर्ज प्रकरण में भी इसका संज्ञान नहीं लिया गया, खबर तो यह भी है कि ट्विटर को हुकुम दिया गया है कि वह इस वीडियो को हटा ले। इसी के साथ, इसी लाइन की निरंतरता में आरपीएफ और पुलिस सहित पूरे का पूरा सरकारी महकमा उसे मानसिक रोगी साबित करने के काम में लग गया है। अनेक लोगों ने सरकारी अधिकारियों के इस बयान को लीपापोती की कोशिश बताया है। यकीनन यह एक तरह से हत्याओं की असली वजह से ध्यान बंटाने की चतुराई है भी, मगर इसी के साथ यह सच को दूसरी तरह स्वीकार लेने की स्थिति भी है। एक तरह की फ्रायडियन चूक है, जिसमे सच छुपाने की लाख कोशिश करने के बाद भी वह निकल ही जाता है।निस्संदेह चेतन कुमार सिंह एक मनोरोगी है ; एक ऐसे खतरनाक मनोरोग का शिकार, जिसने उसके मनुष्यत्व को समाप्त करके उसे एक हिंसक, आदमखोर प्राणी में बदल कर रख दिया है। वह एक ख़ास किस्म के नफरती प्रोपेगंडा का शिकार होकर एक अति विषाक्त मानव गन में तब्दील होकर रह गया है। यह नफरती प्रचार और उसके जरिये उन्माद पैदा करने का काम कौन कर रहे हैं, इसे खुद उसने अपने हत्या उपरान्त दिए गए भाषण में स्वीकार कर लिया है। यही नफरती प्रचार था, जिसने गांधी के हत्यारे को प्रेरित किया था। गांधी हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध को लेकर आयी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिट्ठी के जवाब में तब के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 18 जुलाई, 1948 को लिखा था कि ":... इन दो संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के कारण देश में ऐसा वातावरण बना, जिसकी वजह से ऐसी (गांधी हत्या जैसी) भयानक घटना घटी।" उन्होंने लिखा कि ".... आर एस एस नेताओं के सारे भाषण सांप्रदायिकता के जहर से भरे होते हैं .... इस जहर का ही नतीजा देश को गांधी जी के बलिदान से चुकाना पड़ा।" और यह भी कि "आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए जोखिम भरी थीं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि (प्रतिबंध के बाद भी) ऐसी गतिविधियां बंद होने के बावजूद खत्म नहीं हुईं।समय के साथ-साथ आरएसएस का संगठन और अवज्ञा करता जा रहा है। उनकी विद्रोही गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं।''यह चिट्ठी सरदार पटेल ने यह चिट्ठी 74 वर्ष पहले लिखी थी। आजादी की 75वी वर्षगांठ के ठीक पहले फिर एक बार वही जहर उबल कर उफन रहा है। चेतन कुमार सिंह उसी जहर से भरा मानव-बम था!! ऐसे अनेक मानव बम घूम रहे हैं।जो मनोदशा इस हत्यारे की बनाई गयी है, वह इसी तक महदूद नहीं रहने वाली। जिस मीडिया का वह सबूत के रूप में जिक्र कर रहा था, जिस व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी ने उसमें यह विस्फोटक विष भरा था, वह 24 घंटा, सातों दिन इसी तरह के जहर का उत्पादन कर रही है। इसलिए नफरत का कारोबार यहीं तक रुकने वाला नहीं है। जो नाजी जर्मनी और मुसोलिनी अपने भारतीय संस्करणों का प्रेरणास्रोत है, उनके जमाने की मनोदशा और सबको उस मनोदशा में पहुंचा देने की प्रक्रिया और तकनीक को लेकर अनेक अध्ययन हुए हैं। ऐसी सैकड़ों किताबें हैं। इनमे से एक विलियम एल. शीरर की किताब ‘राइज एंड फॉल ऑफ द थर्ड राइख’ उस पूरी कवायद का दस्तावेजीकरण करती है, जिसके द्वारा इस उन्मादी मानसिकता को उत्तरोत्तर उच्च से उच्चतर स्तर तक पहुंचाया गया। किस तरह "हम" और "वे" की धारणा को पक्का कर जो "वे" करार दिए गए, उनके साथ हर तरह की बर्बरता को जायज बनाया गया। इन्हें पढ़ते में ऐसा लगता है, जैसे इन दिनों यही सब ठीक उसी तरह दोहराया जा रहा है। 'नाज़ी जर्मनी (शार्ट ऑक्सफ़ोर्ड हिस्ट्री ऑफ़ जर्मनी)' इन सबके अलावा इस प्रक्रिया के तीव्र से तीव्रतर होते जाने के उस दौर की कई राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों की समर्पणकारी और बचकाना उम्मीदों वाली दिवालिया भूमिका को सामने लाती है। नाजियों पर चले न्यूरेमबर्ग मुकदमे के मुजरिमों के साथ मनोवैज्ञानिकों के लम्बे साक्षात्कारों पर आधारित एक पूरा अध्ययन भी है, नाजियों के साथ पूछताछ पर आधारित 'इंटेरोगेशन' सहित अनेक प्रामाणिक अध्ययन और भी हैं। इन्हीं में एक छोटी सी किताब ‘नाजीवादी जर्मनी की मनोदशा’ है, जिसे स्विस मनोविज्ञानी और मशहूर लेखक कार्ल गुस्ताव यंग ने लिखा है। कार्ल ने 1928 से 1941 के दौरान कोई 15 हजार से ज्यादा जर्मनों के मनोविज्ञान का अध्ययन किया था। इनमें हर तबकों के लोग थे। इस शोध के आधार पर उन्होंने पता लगाया कि हिटलर और उसके प्रचारतंत्र ने कैसे उनका विवेक छीनकर उन्हें एक उन्मादी भीड़ में बदल दिया और किस तरह सिर्फ 32-33 प्रतिशत जर्मन वासियों का समर्थन पाने वाला हिटलर और उसका नाज़ी गिरोह पूरी जर्मनी को आत्मविनाश के लिए तैयार करने में कामयाब हो गया। किस तरह उसने पढ़े-लिखे लोगों की एक जमात, पत्रकारों, कलाकारों को भी राजनीतिक हत्याओं का समर्थन करने वालों में बदल दिया। अंध भक्तों की एक बड़ी फ़ौज खडी कर दी, जो हर तरह के दमन, यहाँ तक कि नरसंहार को भी देश के लिए जरूरी मानने लगी। ऐसी भीड़ तैयार कर दी, जो सत्ता के खिलाफ उठने वाले सवालों का खुद ही जवाब देने और उसे सही साबित करने के काम में लग गयी, हिटलर को उन्माद भड़काने वाले भाषण देने (और आखिर में आत्महत्या करने) के सिवाय कुछ नहीं करना पड़ा।ऐसे लोगों के प्रोफाइल तैयार करते में कार्ल गुस्ताव इनमे जो समानता पाते हैं, वे इनके पढ़े-लिखे होने के बाद भी सूचनाओं और ज्ञान से वंचित होने इस तरह कुपढ़ होने, खुद और परिवार से दुखी और असंतुष्ट होने और ज्यादातर मामलों में कमतर क्षमता के बावजूद योग्यतम होने का भरम पालने वाला होने तथा अपनी अक्षमता की हीनग्रंथि से उबरने के लिए शुद्ध आर्य रक्त और आर्य राष्ट्रवाद का सहारा लेने वाला होने की थीं।लाश पर खड़े होकर दिया गया चेतन कुमार सिंह का भाषण इस बात का प्रमाण है कि वह इसी तरह की उन्मादी मशीन से ढला हुआ मनोरोगी है। नफरती प्रचार ने उससे मनुष्य होने का विवेक छीन लिया है। उसे इस दशा में किसने पहुंचाया है यह बात भी, "हमारी मीडिया कवरेज दिखा रही है, जिससे पता चल रहा है, सब पता चल रहा है।" कहकर वह स्वयं ही क़ुबूल कर रहा है। "अगर वोट देना है, हिंदुस्तान में रहना है तो मैं कहता हूँ मोदी-योगी को दीजिये" की धमकी देकर अपना मकसद भी स्पष्ट रूप से व्यक्त कर रहा है।इतने भयानक काण्ड के बावजूद किसी केन्द्रीय अथवा महाराष्ट्र सरकार के मंत्री, भाजपा के किसी प्रवक्ता, संघ के किसी भी मुखौटे द्वारा इसकी निंदा या भर्त्सना तक नहीं की गयी है। पिल्ले के मर जाने पर भी दुःख होने का दावा करने वाले जब मणिपुर पर नहीं बोले, तो इस पर क्या बोलेंगे? मौतों पर अफ़सोस तक व्यक्त नहीं किया गया है। अपने नाम का इस्तेमाल करने पर क्षोभ या रोष भी नहीं जताया गया। यह साधारण बात नहीं है - यह एक प्रकार से इस जघन्यता का अनुमोदन है ; यह मौनम स्वीकृति लक्षणम् है। इसे ठीक इसके अगले दिन से योजनाबद्ध तरीके से हरियाणा में शुरू किये गए साम्प्रदायिक हमलों और फटाफट उनके पूरे प्रदेश में फैल जाने के साथ जोड़कर देखने से साफ़ हो जाता है कि यह 2024 के चुनाव अभियान का शंख फूँका जाना है ; उसके लिए एजेंडा तैयार किया जाना है।यह साम्प्रदायिकता से आगे की चीज है -- यह वहशी फासिस्टी उन्माद है और उसे जिस तरह तेज से तेजतर किया जा रहा है, उसे देखकर नहीं लगता कि यह यहीं तक रुकने वाला है या सिर्फ एक समुदाय विशेष तक ठहरने वाला है। असहमति जताने वाले, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र और क़ानून की राज की हिमायत करने वाले, अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ या अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन करने वाले आदि-इत्यादि जिन-जिन के खिलाफ यह उन्माद भड़काया जा रहा है, वे सब भी इन मानव गन के निशाने पर हैं, जॉन एलिया का शेर थोड़ा बदल कर कहें तो : "अब हुयी हरेक बात खतरे की / अब सभी को सभी से खतरा है।"ऐसे खतरों के समय, इन खतरों के खिलाफ जितना अधिक संभव हो, उतनों को जोड़ना और जितनी शिद्दत से संभव है उससे कहीं ज्यादा जिद के साथ मैदान में उतरना ही एकमात्र विकल्प है।(लेखक पाक्षिक 'लोकजतन' के संपादक और अ. भा. किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।
: मानगढ़ धाम जनजातियों के तप , त्याग और देशभक्ति का प्रतिबिंब - पीएम मोदी
Tue, Nov 1, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
बांसवाड़ा ( मानगढ़) - मानगढ़ धाम की सेवा मेरा सौभाग्य है , ये वीरों की तपस्या और त्याग का प्रतीक है। मुझे एक बार फिर से मानगढ़ धाम में आकर शहीद आदिवासियों के सामने सिर झुकाने का मौका मिला है। आजादी के अमृत महोत्सव में हम सभी का मानगढ़ धाम आना हम सभी के लिये प्रेरक और सुखद है। मानगढ़ धाम जनजातीय वीर-वीरांगनाओं के तप , त्याग , तपस्या और देशभक्ति का प्रतिबिंब है। ये राजस्थान , गुजरात , मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की साझी विरासत है। भारत का इतिहास वर्तमान और भविष्य आदिवासी समाज के बिना पूरा नहीं होता। गोविंद गुरु जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी भारत की परंपराओं और आदर्शों के प्रतिनिधि थे। वे किसी रियासत के राजा नहीं थे , लेकिन वे लाखों आदिवासियों के नायक थे। अपने जीवन में उन्होंने अपना परिवार खो दिया , लेकिन हौसला कभी नहीं खोया। उन्होंने एकता और भाईचारे का संदेश दिया और आदिवासी समाज के लिये लड़ाई लड़ी। भारत का भविष्य आदिवासी समाज के बिना अधूरा है।
उक्त बातें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज "मानगढ़ की गौरव गाथा" कार्यक्रम में भील आदिवासियों और अन्य जनजातियों के सदस्यों की सभा को संबोधित करते हुये कही। पीएम ने कहा कि पहले यह पूरा क्षेत्र वीरान था लेकिन आज चारों तरफ हरियाली है। आप लोगों ने इसे हरा भरा कर दिया , इसके लिये आप सभी का अभिनन्दन है। यहां हुये विकास से गोविन्द गुरु के विचारों का भी प्रचार हुआ। यहां 109 साल पहले 17 नवंबर को मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन जो नरसंहार हुआ था , वह अंग्रेजों की क्रूरता की पराकाष्ठा थी। हजारों महिलाओं और युवाओं को मौत के घाट उतार दिया गया। आजादी के बाद लिखे गये इतिहास में उनके बलिदान को जगह नहीं मिली। आज अमृत महोत्सव में उस भूल को सुधारा जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमारी आजादी की लड़ाई का पग-पग , इतिहास का पन्ना-पन्ना आदिवासी वीरता से भरा पड़ा है। गोविंद गुरु का वह चिंतन , वह बोध , आज भी उनकी धुणी के रूप में मानगढ़ धाम में अखंड रूप से प्रदीप्त हो रहा है। उनकी सम्प सभा यानि समाज के हर तबके में सम्प भाव पैदा हो , सम्प सभा के आदर्श आज भी एकजुटता , प्रेम और भाईचारा की प्रेरणा दे रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 1780 में संथाल में तिलका मांझी के नेतृत्व में दामिन संग्राम लड़ा गया। वर्ष 1830-32 में बुधू भगत के नेतृत्व में देश लरका आंदोलन का गवाह बना। वर्ष 1855 में आजादी की यही ज्वाला सिधु-कान्हू क्रांति के रूप में जल उठी। भगवान बिरसा मुंडा ने लाखों आदिवासियों में आजादी की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। आज से कुछ दिन बाद ही 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर देश जनजातीय गौरव दिवस मनायेगा। आदिवासी समाज के अतीत और इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने के लिये आज देश भर में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित विशेष म्यूजियम बनाये जा रहे हैं। देश में आदिवासी समाज का विस्तार और भूमिका इतनी बड़ी है कि हमें उसके लिये समर्पित भाव से काम करने की जरूरत है। राजस्थान और गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर और ओडिशा तक विविधता से भरे आदिवासी समाज की सेवा के लिये आज देश स्पष्ट नीति के साथ काम कर रहा है। देश में वन क्षेत्र भी बढ़ रहे हैं , वन संपदा भी सुरक्षित की जा रही है। साथ ही आदिवासी क्षेत्र डिजिटल इंडिया से भी जुड़ रहे हैं। पारंपरिक कौशल के साथ-साथ आदिवासी युवाओं को आधुनिक शिक्षा के भी अवसर मिले , इसके लिये एकलव्य आदिवासी विद्यालय भी खोले जा रहे हैं।राजस्थान और गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर और उड़ीसा तक विविधता से भरे आदिवासी समाज की सेवा के लिए आज देश स्पष्ट नीति के साथ काम कर रहा है।मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक घोषितप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित मानगढ़ धाम पहुंचे। यहां उन्होंने ‘मानगढ़ की गौरव गाथा’ कार्यक्रम में शिरकत की। पीएम ने भील स्वतंत्रता सेनानी गोविंद गुरु को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने धूणी पर पहुंचकर पूजन किया और आरती भी उतारी। यहां मानगढ़ धाम को पीएम मोदी ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित करते हुये वर्ष 1913 में ब्रिटिश सेना की गोलीबारी में जान गंवाने वाले आदिवासियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। राजस्थान सरकार ने 27 मई 1999 को नरसंहार में मारे गये आदिवासियों की याद में शहीद स्मारक बनवाया था और अब इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया है।इस दौरान प्रधानमंत्री के साथ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र भाई पटेल भी मौजूद रहे।मानगढ़ धाम का इतिहासबांसवाड़ा से करीब 80 किमी दूर चारों तरफ से पहाड़ी और जंगलों से घिरा मानगढ़ धाम बसा है। मानगढ़ धाम को जलियांवाला बाग से छह साल पहले हुये आदिवासियों के नरसंहार के लिये जाना जाता है और इसे कभी-कभी "आदिवासी जलियांवाला" भी कहा जाता है।बांसवाड़ा जिले में मध्यप्रदेश और गुजरात सीमा से सटा मानगढ़ धाम अमर बलिदान का साक्षी है , जहां 17 नवंबर 1913 को वार्षिक मेले का आयोजन होने जा रहा था। वनवासियों के नेता गोविन्द गुरु के आह्वान पर उस कालखंड में पड़े अकाल से प्रभावित हजारों वनवासी खेती पर लिये जा रहे कर को घटाने , धार्मिक परम्पराओं का पालना की छूट के साथ बेगार के नाम पर परेशान किये जाने के खिलाफ एकजुट हुये थे। तत्कालीन अंग्रेजी शासन ने उनकी सुनवाई करने के बजाए मानगढ़ धाम को चारों ओर से घेर लिया और मशीनगन और तोपें तैनात कर दी। अंग्रेजी सरकार ने गोविन्द गुरु तथा वनवासियों को पहाड़ी छोड़ने के आदेश दिये लेकिन वे अपनी मांग पर अड़े रहे। जिस पर अंग्रेजी शासन की ओर से मेजर हैमिल्टन और उनके तीन अफसरों ने वनवासियों पर गोलीबारी के आदेश दिये और एकाएक हुई फायरिंग में हजारों वनवासी मारे गये। अलग-अलग पुस्तकों में शहीद वनवासियों की संख्या पंद्रह सौ से दो हजार तक बताई जाती है। अंग्रेजी शासन ने वनवासियों के नेता गोविन्द गुरु को हिरासत में ले लिया और अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। हालांकि बाद में अदालत ने उनकी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था। सजा काटने के बाद गोविन्द गुरु वर्ष 1923 में जेल से रिहा हुये और भील सेवा सदन के माध्यम से आजीवन लोक सेवा में लगे रहे। 30 अक्टूबर 1931 में उनके निधन के बाद मानगढ़ धाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया और वहां समाधि बनाई गई। उनकी समाधि पर हर साल मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर लाखों वनवासी आदिवासी भील समाज उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करने उमड़ता है।
: आचार्य धर्मेन्द्र का निधन , पीएम सहित राजनेताओं ने जताया शोक
Mon, Sep 19, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टजयपुर - विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल रहे श्रीपंचखण्ड पीठाधीश्वर आचार्य स्वामी धर्मेंद्र महाराज (80वर्षीय) का लम्बी बिमारी के बाद जयपुर के सवाई मान सिंह सरकारी अस्पताल में सोमवार को निधन हो गया। बताया जा रहा है कि लंबे समय से वे आंत की बीमारी से पीड़ित थे और 28 अगस्त से सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती थे। उनका अंतिम संस्कार जयपुर के पास विराटनगर में स्थित उनके मठ में किया जायेगा। गौरतलब है कि आचार्य धर्मेंद्र के स्वास्थ्य के बारे में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने भी जानकारी ली थी। इसके अलावा राजस्थान भाजपा अध्यक्ष सहित कई आला नेता भी लगातार उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सहित अनेक नेताओं ने आचार्य के निधन पर शोक जताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे आध्यात्मिक जगत के एक अपूरणीय क्षति बताया है। प्रधानमंत्री ने एक ट्वीट में कहा है कि समाज और राष्ट्र सेवा में समर्पित श्रीमद् पंचखंड पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेंद्र के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उनका जाना धार्मिक और आध्यात्मिक जगत के लिये एक अपूरणीय क्षति है। ईश्वर उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दे। केन्द्रीय गृहमंत्री शाह ने शोक जताते हुये ट्वीट किया है कि पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र जी के निधन से दुखी हूं। सनातन परंपरा को आगे बढ़ाने व श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को जन-जन तक ले जाने में उनका अतुलनीय योगदान रहा। उनके विचार आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। मैं उनके अनुयायियों के प्रति संवेदना व्यक्त करता हूं। वहीं राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया सहित अनेक नेताओं सहित देश भर में हिन्दू संगठन से जुड़े लोगों ने भी आचार्य धर्मेंद्र के निधन पर शोक जताया है।
गौरतलब है कि रामचन्द्र वीर महाराज के पुत्र आचार्य धर्मेंद्र का जन्म 09 जनवरी 1942 को गुजरात के मालवाडा में हुआ। उन पर पिता महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज के आदर्शों और व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ा। आचार्य ने मात्र तेरह साल की उम्र में वज्रांग नाम से एक समाचार पत्र निकाला। राजस्थान के जयपुर में रहने वाले आचार्य धमेन्द्र का जयपुर के दिल्ली रोड पर कोठपूतली के नजदीक विराटनगर में मठ है। वे इसी मठ में रहकर साधना करते थे। श्रीपंचखंड पीठ में साधना करने वाले आचार्य धमेन्द्र महाराज विश्व हिंदु परिषद के मार्गदर्शक रहे और गायों की हत्या से जुड़े बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया। वे श्रीराम मंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे थे। आचार्य धर्मेंद्र ने लंबे समय तक राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़कर अपना योगदान दिया था। उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं। वे राम मंदिर मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखते थे। बाबरी विध्वंस मामले में जब फैसला आने वाला था तब उन्होंने बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि मैं आरोपी नंबर वन हूं। सजा से डरना क्या ? जो किया सबके सामने किया। आचार्य स्वामी धर्मेंद्र के दो बेटे सोमेन्द्र शर्मा और प्रणवेन्द्र शर्मा हैं। सोमेन्द्र की पत्नी और आचार्य की पुत्रवधू अर्चना शर्मा वर्तमान में गहलोत सरकार में समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष हैं।