: दसदिवसीय गणेशोत्सव का शुभारंभ आज से - अरविन्द तिवारी
Wed, Sep 11, 2024
रायपुर - गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है जो भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन यानि आज भारत के विभिन्न भागों में सनातन परंपरा के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी उत्सव की शुरुआत आज 07 सितंबर से होने जा रही है , दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव का समापन 17 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि पुराणों के अनुसार इसी चतुर्थी को मध्याह्न काल में गणेश का जन्म हुआ था इसलिये मध्याह्न काल में इनकी पूजा का विशेष महत्व माना गया है। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। बाल गंगाधर तिलक ने दस दिवसीय गणेशोत्सव सार्वजनिक रूप से मनाने की शुरुआत की थी। तब से आज भी कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। वैसे तो देश भर में लोग बड़ी धूमधाम से इस पर्व को मनाते हैं लेकिन यह पर्व महाराष्ट्र में खास तौर से मनाया जाता है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। वहीं घरों में भी लोग अपनी-अपनी श्रद्धानुसार एक दिन , तीन दिन , पांच दिन तो कहीं दस दिन तक विराजमान करते हैं। घर में गाय के गोबर से बनी गणेशजी की प्रतिमा रखना काफी शुभ माना जाता है। इसके अलावा घर में क्रिस्टल के गणेशजी रखने से वास्तु दोष खत्म हो जाता है। हल्दी से बने गणेश रखने से भाग्य चमकता है। कभी भी गणेशजी की प्रतिमा ऐसी जगह ना रखें जहां अंधकार रहता हो या उसके आस-पास गंदगी रहती हो। सीढ़ियों के नीचे भी गणेश जी की प्रतिमा नहीं रखनी चाहिये। ध्यान रखें कि जब भी गणेशजी मूर्ति लें तो उसमें उनका वाहन चूहा और मोदक लड्डू जरूर बना हो , क्योंकि इसके बिना गणेशजी की प्रतिमा अधूरी मानी जाती है। गणेशजी को सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना गया है। धर्म में जब कोई भी शुभ कार्य होता है तो सबसे पहले गणेश जी की पूजा आराधना की जाती है। गणेश चतुर्थी पर लोग गणेशजी को अपने घर लाते हैं , गणेश चतुर्थी के ग्यारहवें दिन अनंतचतुर्दशी को धूमधाम के साथ उन्हें विसर्जित कर दिया जाता है और अगले साल जल्दी आने की प्रार्थना भी की जाती है। गणेश चतुर्थी को कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है , इस दिन चंद्र दर्शन करना निषेध बताया जाता है। मान्यता है कि आज चंद्रमा के दर्शन करने से मिथ्या कलंक लग जाता है। विष्णु पुराण में एक कथा है कि श्रीकृष्ण ने एक बार चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लिया था तो उन पर स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप भी लगा था। दरअसल इसके पीछे गणेशजी का चंद्रमा को दिया हुआ शाप बताया जाता है , यह शाप गणेशजी ने भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को दिया था। कथा के अनुसार एक बार गणेशजी कहीं से भोजन करके आ रहे थे तभी उनको रास्ते में चंद्रदेव मिले और उनके बड़े उदर को देखकर हंँसने लगे। इससे गणेशजी क्रोधित हो गये और उन्होंने शाप दे दिया कि तुमको अपने रूप पर इतना अंहकार है इसलिये मैं तुमको क्षय होने का शाप देता हूंँ। गणेशजी के शाप से चंद्रमा और उसका तेज हर दिन क्षय होने लगा और मृत्यु की ओर बढ़ने लगे। देवताओं ने चंद्रदेव को शिवजी की तपस्या करने को कहा।तब चंद्रदेव ने गुजरात के समुद्रतट पर शिवलिंग बनाकर तपस्या की। चंद्रदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको अपने सिर पर बैठाकर मृत्यु से बचा लिया था। इसी जगह पर भगवान शिव चंद्रमा की प्रार्थना पर ज्योर्तिलिंग रूप में पहली बार प्रकट हुये थे और वे सोमनाथ कहलाये। चंद्रदेव ने अपने अंहकार की भगवान गणेश से क्षमा मांगी। तब गणेशजी ने उनको क्षमा कर दिया और कहा कि मैं इस शाप को खत्म तो नहीं कर सकता है लेकिन आप हर दिन क्षय होंगे और पंद्रह दिन बाद फिर बढ़ने लगेंगे और पूर्ण हो जायेंगे। अब से आपको हर दिन लोग देख सकेंगे लेकिन भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन जो भी आपके दर्शन करेगा , उसको झूठा कलंक लगेगा। गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने के लिये गणेशजी की आराधना करनी चाहिये वे सभी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। गृहस्थ जीवन के लिये गणेश जी एक आदर्श देवता माना जाता है। वैसे तो गणपति बप्पा को बहुत ही सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है। गणेश पूजा में चाँवल, फूल, दूर्वा सहित कई चीजें चढ़ाई जाती हैं लेकिन इनकी पूजा में दूर्वा का काफी महत्व है। कहा जाता है कि इसके बिना गणेश पूजा पूरी नहीं होती है। गणेश जी ही ऐसे देवता है जिनकी पूजा में दूर्वा का प्रयोग होता है। इसके पीछे एक प्रचलित कथा के अनुसार अगलासुर नाम का राक्षस ऋषि मुनियों को जीवित निगल जाता था , इस राक्षका अंत गणेशजी ने कर दिया और फिर इसे निगल लिया जिसके बाद उनके पेट में जलन होने लगी। उनके पेट की जलन के शांत करने के लिये कश्यप ऋषि ने दूर्वा दी थी , तभी से ही गणेशजी को दूर्वा चढ़ायी जाती है। गणेशजी के दर्शन सदैव सामने की ओर से करने चाहिये। कहा जाता है कि गणेशजी के पीछे की तरफ दरिद्रता निवास करती है इसलिये पीठ की तरफ से गणेशजी के दर्शन नहीं करने चाहिये। वैसे तो गणेशजी का हर रूप मंगलकारी और विघ्ननाशक है लेकिन गृहस्थियों के लिये बैठे हुये गणेशजी ही सबसे शुभ फलदायी माने गये हैं। आप घर पर आराम करते हुये गणेशजी की मूर्ति घर लाते हैं तो इससे घर में सुख और आनंद बढ़ता है। इनकी पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और आपको मानसिक शांति प्राप्त होती है। वहीं सिंदूरी रंग वाले गणेशजी समृद्घि दायक माने गये हैं , सिंदूरी वाले गणेशजी की पूजा गृहस्थ और व्यवसायियों को करनी चाहिये। संतान प्राप्ति के लिये घर में बाल गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करना शुभ माना गया है। इनकी हर रोज पूजा करने से सभी विघ्न दूर होते हैं और संतान की प्राप्ति होती है। वहीं नृत्य करते हुये गणेशजी की मूर्ति लाने से घर में लाने से आनंद और उत्साह के साथ उन्नति भी होती है। ऐसे गणेशीजी की छात्रों को हर रोज पूजा करना उत्तम माना गया है। गणेशजी की मिट्टी की बनी हुई प्रतिमा शुभ फलदायी मानी गई है लेकिन अगर बाजार यह उपलब्ध ना हो तो केमिकल वाली मूर्ति को ना लाकर धातु से बनी मूर्ति को घर लेकर आना चाहिये , धातु से बनी हुई मूर्ति भी फलदायी होती है। गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करने से पहले यह ध्यान रखें कि वहांँ आसपास उनकी दूसरी कोई मूर्ति ना हो। आमने-सामने मूर्ति होने पर नुकसान हो सकता है। वहीं गणेशजी की मूर्ति को घर के ब्रह्म स्थान अर्थात केंद्र में स्थापित करना उत्तम माना गया है। साथ ही ध्यान रखें कि गणेशजी की सूंड उत्तर दिशा की ओर हो।
: बालको ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित किया 2 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला
Wed, Sep 11, 2024
*बालकोनगर, 10 सितंबर, 2024।* वेदांता समूह की कंपनी भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) ने ईसीसीई कार्यक्रम को बढ़ावा देने हेतु आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की क्षमता निर्माण के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित किया। प्रशिक्षण नंद घर परियोजना के व्यापक उद्देश्य, बच्चों के बेहतर देखभाल को सुनिश्चित करते हुए नंद घर में पोषण और बेहतर वातावरण बनाने के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को आवश्यक कौशल तथा ज्ञान प्राप्त करने पर केंद्रित था। महिला एवं बाल विकास विभाग के सहयोग से आयोजित कार्यशाला आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी प्रथाओं को शामिल करने और व्यवहार परिवर्तन की शुरुआत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की क्षमता निर्माण से ईसीएस कार्यक्रमों को लागू करने में सहायक हैं। 2 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं (एडब्ल्यूडब्ल्यू) के बीच सर्वोत्तम प्रथाओं को लागू करने का एक मंच के रूप में काम किया तथा नंद घर के बेहतर उपयोग को बढ़ाने के लिए विचारों के आदान-प्रदान को सुनिश्चित किया गया। 3 नंद घर के सदस्यों तथा 29 आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
क्षमता निर्माण कार्यक्रम का उद्देश्य प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा में इसकी भूमिका को समझना। नंद घर, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई) के मॉडल को अपनाते हुए सर्वांगीण बाल विकास को बढ़ावा दे रहा है। प्रारंभिक बाल्यावस्था में बच्चों का उद्दीपन (ईसीएस), 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के संज्ञानात्मक, शारीरिक और सामाजिक विकास को उद्दीपन करने की तकनीक और अभ्यास में इसके महत्व के बारे में जानना। ऐसी तरीकों की खोज जो बच्चों के सर्वांगीण विकास का समर्थन करती हैं जिसमें नैतिक और भावनात्मक विकास भी शामिल है। नंद घर में अनुकूल सीखने का माहौल बनाने के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को दिशा-निर्देश। निरंतर उद्दीपन और सीखने को सुनिश्चित करने के लिए एक मासिक कार्यक्रम कैलेंडर तैयार करना। आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को आकार देने में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका और बचपन के विकास को बढ़ावा देने में उनकी जिम्मेदारी सुनिश्चित करना।बालको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं निदेशक श्री राजेश कुमार ने कहा कि सामुदायिक विकास कार्यक्रम कंपनी के दृष्टिकोण में शामिल है। हम छत्तीसगढ़ में विभिन्न नंद घर की मदद से बाल विकास का समर्थन कर समुदाय की भलाई को बढ़ावा दे रहे हैं। बच्चे इस देश की भविष्य है, कंपनी उनके विकास के लिए विभिन्न पहल संचालित करता है। वेदांता समूह दिल्ली हाफ मैराथन आयोजित कर रहा है जिसमें 'रन फॉर जीरो हंगर' के तहत वन किलोमीटर वन मील (भोजन) का प्रावधान है। कंपनी ने संकल्प लिया है कि प्रत्येक किलोमीटर पर नंद घर के बच्चों को वन मील (भोजन) मुहैया कराया जाएगा।सुश्री रेणु प्रकाश, जिला कार्यक्रम अधिकारी, महिला और बाल विकास ने वेदांता बालको द्वारा संचालित नंद घर परियोजना की सराहना की। उन्होंने प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा के लिए टीम के समर्पण की सराहना की जो एकीकृत बाल विकास सेवाओं को बेहतर तरीके से लागू करता है। 2 दिवसीय ईसीसीई प्रशिक्षण नंदघरों में बच्चों के अनुकूल माहौल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बच्चों को वह समग्र सहायता मिले जिसकी उन्हें बढ़ने के लिए आवश्यकता है। कार्यशाला बाल विकास को बढ़ाने के लिए कार्यकर्ताओं की उपस्थिति और सहभागिता को बढ़ावा दे रही है।
खटखटियापारा की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मीना देवांगन ने कहा कि मैं नंद घर प्रोजेक्ट द्वारा आयोजित दो दिवसीय ईसीसीई प्रशिक्षण के लिए बहुत आभारी हूं। कार्यशाला से हमने विभिन्न उपयोगी तरीके सीखे, जैसे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए दर्पण का उपयोग करना। प्रशिक्षण से नंद घर में बच्चों के साथ काम करने के नए आयाम का पता चला। मैं इसे उपयोग करने के लिए उत्साहित हूं। मुझे यकीन है कि इससे बच्चों की उपस्थिति बढ़ेगी और उनके विकास में भी सुधार होगा।
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: बालको कर्मचारियों ने किसानों के साथ मिलकर किया एसआरआई विधि से धान की रोपाई
Mon, Sep 2, 2024
बालकोनगर, 02 सितंबर, 2024। वेदांता समूह की कंपनी भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) ने अपने ‘मोर जल मोर माटी’ परियोजना के तहत लेट्स डू रोपई कार्यक्रम आयोजित किया। रोपाई में भाग लेकर कर्मचारियों ने समुदाय के साथ हरेली उत्सव मनाया। किसानों को सिस्टम फॉर राइस इंटेंसिफिकेशन (एसआरआई) पर प्रशिक्षण देकर रोपाई विधि को आसान बनाया। 50 से अधिक कर्मचारी स्वयंसेवकों ने 4.5 एकड़ खेत में धान लगाने में योगदान दिया। इस अभियान से लाभान्वित किसान के श्रम लागत में लगभग 15 प्रतिशत की कमी आई।
छत्तीसगढ़ में हरेली त्यौहार कृषि चक्र की शुरुआत का प्रतीक है। हरेली उत्सव किसानों के लिए महत्वपूर्ण त्यौहार है। छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है। इस वर्ष बालको ने अपने कर्मचारियों को किसानों के साथ मिलकर धान की रोपाई में सक्रिय रूप से शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। किसानों के साथ मिलकर कार्य करने से एकजुटता की भावना को बढ़ावा मिला।
बालको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं निदेशक श्री राजेश कुमार ने कहा कि बालको किसानों का हरसंभव सहयोग करने के लिए कटिबद्ध है। ‘लेट्स डू रोपाई’ अभियान में हमारे कर्मचारियों का स्वैच्छिक सेवा, समुदाय के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मोर जोल मोर माटी परियोजना के माध्यम से कंपनी समुदाय के किसानों को सिस्टमेटिक राइस इंटेंसीफिकेशन (एसआरआई) विधि के साथ विभिन्न तकनीक और आधुनिक कृषि पद्धतियों में प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है। आवश्यक ज्ञान और संसाधनों के साथ हमारा लक्ष्य किसानों के जीवन में बदलाव लाना है जिसमें कृषि और स्थायी आजीविका के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और बुनियादी ढांचे के विकास भी शामिल है।कंपनी ने पूरे साल लगभग 2,300 छोटे और सीमांत किसानों को एसआरआई में प्रशिक्षित किया जिससे उनको आर्थिक लाभ मिला है। पारंपरिक तरीकों से खरपतवार, पोषक तत्वों, पानी और सूरज की रोशनी के लिए उपज में बाधा उत्पन्न तथा कीट और बीमारी की समस्याएं पैदा होती हैं जिससे किसानों को नुकसान हुआ है। एसआरआई पद्धति को अपनाने से धान की जड़ों का मजबूत विकास होता है जिससे स्वस्थ फसलें प्राप्त होती हैं। इस तकनीक से किट-पतंगों की समस्या में भी कम हुई है जिससे धान के उत्पादन में 20-30 प्रतिशत की वृद्धि होती है।बुंदेली गांव की किसान धनसाय पटेल ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि धान के उत्पादन के लिए एसआरआई तकनीक का प्रशिक्षण बहुत उपयोगी साबित हुआ। इस कृषि पद्धति को अपनाने से हमारे धान उत्पादन में वृद्धि हुई है। पारंपरिक तरीकों की तुलना में इस तकनीक ने मुझे बेहतर फसल उपज प्राप्त करने में मदद की है।रोपई में हिस्सा लेने वाले बालको कर्मचारी सार्थक पटेल ने बताया कि किसानों के साथ काम करना काफी अच्छा लगा। इस अभियान से फसल के बारे में सीखना और अपनी नौकरी के बाहर सकारात्मक प्रभाव डालना सुखद अनुभव था।बालको की में मोर जल मोर माटी परियोजना 32 गांवों में 1400 एकड़ से अधिक भूमि के साथ 4749 किसानों तक अपनी पहुंच बना चुका है। इस परियोजना के तहत 80% से अधिक किसानों ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाया है जिसमें एसआरआई, ट्रेलिस, जैविक खेती, जलवायु अनुकूल फसल, सब्जी और गेहूं की खेती आदि जैसी आजीविका बढ़ाने वाली गतिविधियों में लगे हुए हैं। लगभग 15% किसान आजीविका के लिए कृषि से साथ पशुपालन, बागवानी और वनोपज जैसी गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। किसानों के औसत वार्षिक आय में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि और लागत में 40 प्रतिशत की कमी।
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