: महादेव घाट के कार्तिक पुन्नी मेला में शामिल हुये मुख्यमंत्री साय
Fri, Nov 15, 2024
रायपुर - मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर राजधानी रायपुर के पवित्र खारून नदी के तट महादेव घाट पहुंचकर श्री हाटकेश्वर महादेव और मां काली के दर्शन किये। उन्होंने श्री हाटकेश्वर महादेव और मां काली की पूजा अर्चना कर प्रदेशवासियों के खुशहाली की कामना की। मुख्यमंत्री साय ने पवित्र महादेव घाट में कार्तिक स्नान के लिये जुटे श्रद्धालुओं का अभिवादन कर सभी को कार्तिक पूर्णिमा की शुभकामनायें दी। इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री अरूण साव और विधायक मोतीलाल साहू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर महादेव घाट में आयोजित होने वाला पुन्नी मेला बहुत लोकप्रिय है। दूर-दूर से लोग इसमें बड़ी श्रद्धा के साथ हिस्सा लेने आते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी सांस्कृतिक , धार्मिक परंपरायें ना केवल हमारी आस्था को मजबूत करती हैं अपितु हमारे जीवन में उल्लास भी भरती हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि श्रीरामलला दर्शन योजना के माध्यम से हमने प्रदेशवासियों को अपने आराध्य भगवान श्रीराम के दर्शन के लिये अयोध्या भेजने की निःशुल्क की व्यवस्था की है। उन्होंने तीर्थदर्शन योजना के शीघ्र शुरू किये जाने की जानकारी देते हुये बताया कि इससे 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिक तीर्थ यात्रा पर जा सकेंगे। सीएम ने कहा कि आज से हमने प्रदेश के पच्चीस लाख से अधिक किसानों से धान खरीदी की शुरूआत कर दी है। जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर देश भर से आये जनजाति कलाकारों ने राजधानी में मनमोहक नृत्यों की प्रस्तुति दी। उन्होंने आज नई औद्योगिक विकास नीति 2024-30 लागू होने की जानकारी भी लोगों के साथ साझा की।
: रत्नों के समान मूल्यवान है आंवला का फल - अरविन्द तिवारी
Sun, Nov 10, 2024
(आज आंवला नवमीं विशेष)रायपुर - कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमीं यानि आज आंँवला नवमीं मनायी जा रही है , इसे अक्षय नवमीं भी कहा जाता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये श्री सुदर्शन संस्थानम , पुरी शंकराचार्य आश्रम / मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने बताया कि श्रुतिस्मृति पुराणों के अनुसार आंवला नवमी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन की गलियां छोड़कर मथुरा प्रस्थान किया था। इसी दिन उन्होंने अपनी बाल लीलाओं का त्याग करके कर्तव्य के पथ पर पहला कदम रखा था। इसी दिन से वृंदावन की परिक्रमा भी प्रारंभ होती है। आंवला नवमी का व्रत संतान और पारिवारिक सुखों की प्राप्ति के लिये किया जाता है। यह व्रत पति-पत्नी साथ में रखें तो उन्हें इसका दोगुना शुभ फल प्राप्त होता है। आज के दिन आंवले के पेड़ की विधिवत तरीके से पूजा कर इसी वृक्ष के नीचे सपरिवार भोजन किया जाता है। अगर आसपास आँवले का पेंड़ नही है और उसके नीचे भोजन करना संभव नही है तो आज के दिन आँवले के फल खाने का भी प्रावधान है। वहीं अक्षय नवमीं के दिन स्नान , तर्पण ,अन्न दान तथा पूजा आदि करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने आगे बताया कि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आंँवले के पेड़ में देवों के देव महादेव और भगवान विष्णु वास करते हैं इसलिये इसकी पूजा करने का खास महत्व है। कहा जाता है कि आंँवले की पूजा करने से आरोग्य और सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आंँवला नवमी के दिन पूजा करने और जप-तप , दान करने से अनंत गुना फल मिलता है। आँवला विष्णुप्रिय और साक्षात भगवान विष्णु का ही स्वरूप है। इसके स्मरण मात्र से गोदान के बराबर फल मिलता है , इसे स्पर्श करने पर दोगुना तथा फल सेवन करने पर तीन गुना फल मिलता है , यह फल सदा सेवन योग्य है। जो प्राणी इस वृक्ष का रोपण करता है , उसे उत्तम लोक की प्राप्ति होती है। आंँवले का फल पौराणिक दृष्टिकोण से रत्नों के समान मूल्यवान माना जाता है। इस फल का प्रयोग कार्तिक मास से आरम्भ करना अनुकूल माना जाता है। इस फल के सटीक प्रयोग से आयु , सौन्दर्य और अच्छे स्वस्थ्य की प्राप्ति होती है। मात्र यही ऐसा फल है जो सामान्यतः नुकसान नहीं करता है। आंवला नवमी के दिन स्नान आदि करके किसी आंवला वृक्ष के समीप जायें और उसके आसपास साफ-सफाई करके आंवला वृक्ष की जड़ में शुद्ध जल अर्पित करें। फिर उसकी जड़ में कच्चा दूध डालकर षोडशोपचार पूजन सामग्रियों से वृक्ष की पूजा करें और उसके तने पर कच्चा सूत या मौली आठ परिक्रमा करते हुये लपेटें। कुछ जगह 108 परिक्रमा भी की जाती है। इसके बाद परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करके वृक्ष के नीचे ही बैठकर परिवार , मित्रों सहित भोजन किया जाता है।महत्वशास्त्रों में आंँवला , पीपल , वटवृक्ष , शमी , आम और कदम्ब के वृक्षों को हिन्दू धर्म में वर्णित चारों पुरुषार्थ दिलाने वाला बताया गया है। इन वृक्षों की पूजा करने से भगवान प्रसन्न होते हैं और अपनी कृपा भक्तों पर बरसाते हैं। आंवला नवमी के दिन आंवला वृक्ष का पूजन कई यज्ञों के बराबर शुभ फल देने वाला बताया गया है। आंँवला नवमी पर आंँवले के पेड़ के नीचे पूजा और भोजन करने की प्रथा की शुरुआत माता लक्ष्मी ने की थी। कथा के अनुसार एक बार मांँ लक्ष्मी पृथ्वी पर घूमने के लिये आयी। धरती पर आकर मांँ लक्ष्मी सोचने लगीं कि भगवान विष्णु और शिवजी की पूजा एक साथ कैसे की जा सकती है ? तभी उन्हें याद आया कि तुलसी और बेल के गुण आंँवले में पाये जाते हैं। तुलसी भगवान विष्णु को और बेल शिवजी को प्रिय है। उसके बाद मांँ लक्ष्मी ने आंँवले के पेड़ की पूजा करने का निश्चय किया। मांँ लक्ष्मी की भक्ति और पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और शिवजी साक्षात प्रकट हुये। माता लक्ष्मी ने आंँवले के पेड़ के नीचे भोजन तैयार करके भगवान विष्णु व शिवजी को भोजन कराया और उसके बाद उन्होंने खुद भी वहीं भोजन ग्रहण किया।मान्यताओं के अनुसार आंवला नवमी के दिन अगर कोई महिला आंँवले के पेड़ की पूजा कर उसके नीचे बैठकर भोजन ग्रहण करती है , तो भगवान विष्णु और शिवजी उसकी सभी इच्छायें पूर्ण करते हैं। इस दिन महिलायें अपनी संतान की दीर्घायु तथा अच्छे स्वास्थ्य लेकर कामना करती हैं। इस दिन आँवला नवमीं की कथा भी सुनी जाती है। मान्यता है कि इस कथा को सुनने से व्रत रखने वाली महिलाओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है और माता लक्ष्मी भी उनके परिवार पर प्रसन्न होती है।आंँवले के फल का विशेष प्रयोगअगर धन का अभाव हो तो हर बुधवार को भगवान को आंँवला अर्पित करें। अगर उत्तम स्वास्थ्य चाहिये तो कार्तिक माह में आंँवले के रस का नियमित प्रयोग करें। आंँवले के वृक्ष के नीचे शयन , विश्राम और भोजन करने गोपनीय से गोपनीय बीमारियांँ और चिंतायें दूर हो जाती हैं। आंँवले के फल को दान देने से मानसिक चिंतायें दूर होती हैं। आंवले का चूर्ण खाने से वृद्धावास्था का प्रकोप नहीं होता है। कार्तिक मास में आंँवले को भोजन में शामिल करें अथवा आंँवले के रस में तुलसी मिलाकर सेवन करें। कार्तिक में आंँवले का पौधा लगाने से संतान और धन की कामनायें पूर्ण होती हैं , आंँवले के फल को सामने रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से दरिद्रता दूर होती है। अगर कर्ज से परेशान हों तो घर में आंँवले का पौधा लगाकर इसमें रोज सुबह पानी डालें।आंवला दान के प्रभाव से हुई स्वर्ण की वर्षाआंवला को वेद-पुराणों में अत्यंत उपयोगी और पूजनीय कहा गया है। आंवला का संबंध कनकधारा स्तोत्र से भी है। एक कथा के अनुसार गुरूकुल में रहते हुये एक बार आदि शंकराचार्य भिक्षा मांगने एक कुटिया के सामने रुके। वहां एक बूढ़ी औरत रहती थी , जो अत्यंत गरीबी और दयनीय स्थिति में थी। शंकराचार्य की आवाज सुनकर वह बूढ़ी औरत बाहर आई , उसके हाथ में एक आमलकी फल (आंवला) था। वह बोली महात्मन मेरे पास इस आंवले के सिवाय कुछ नहीं है जो आपको भिक्षा में दे सकूं। शंकराचार्य को उसकी स्थिति पर दया आ गई और उन्होंने उसी समय उसकी मदद करने का प्रण लिया। उन्होंने अपनी आंखें बंद की और मंत्र रूपी कनकधारा स्तोत्र के बाईस श्लोक बोले। इससे प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उन्हें दिव्य दर्शन दिये और कहा कि इस औरत ने अपने पूर्व जन्म में कोई भी वस्तु दान नहीं की। यह अत्यंत कंजूस थी और कभी किसी को कुछ देना ही पड़ जाये तो यह बुरे मन से दान करती थी। इसलिये इस जन्म में इसकी यह हालत हुई है , यह अपने क्मों का फल भोग रही है इसलिये मैं इसकी कोई सहायता नहीं कर सकती। शंकराचार्य ने देवी लक्ष्मी की बात सुनकर कहा - हे महालक्ष्मी इसने पूर्व जन्म में अवश्य दान-धर्म नहीं किया है , लेकिन इस जन्म में इसने पूर्ण श्रद्धा से मुझे यह आंवला भेंट किया है। इसके घर में कुछ नहीं होते हुये भी इसने यह मुझे सौंप दिया। इस समय इसके पास यही सबसे बड़ी पूंजी है , क्या इतना भैंट करना पर्याप्त नहीं है ? शंकराचार्य की इस बात से देवी लक्ष्मी प्रसन्न हुई और उसी समय उन्होंने गरीब महिला की कुटिया में स्वर्ण के आंवलों की वर्षा कर दी और महिला की कुटिया में सोने के आंवले बरसने लगे। अत: आंवला नवमी के दिन यह कथा पढ़ने और सुनने का बहुत महत्व माना गया है।
: स्त्री शक्ति का प्रतीक पर्व है करवा चौथ – अरविन्द तिवारी
Sun, Oct 20, 2024
(आज करवा चौथ विशेष)
रायपुर - करवा चौथ का व्रत हर वर्ग, आयु , जाति के हिन्दू सुहागिन महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला प्रमुख त्यौहार है जो कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है , जिसे कर्क चतुर्थी भी कहते है। इस दिन सुहागिन महिलायें अपने पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन सुखमय होने की कामना पूर्ति के लिये निर्जला व्रत रखती हैं। इस बार करवा चौथ आज 20 अक्टूबर रविवार को पड़ रही है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि व्रत रखने का अर्थ ही है संकल्प लेना। वह संकल्प चाहे पति की रक्षा का हो , परिवार के कष्टों को दूर करने का या कोई और। यह संकल्प वही ले सकता है जिसकी इच्छा शक्ति मजबूत हो। यह पर्व संकेत देता है कि स्त्री अबला नहीं , बल्कि सबला है और वह भी अपने परिवार को बुरे वक्त से उबार सकती है। करवा चौथ की प्रचलित कथाओं में स्त्रियां सशक्त भूमिका में नजर आती है , इस देश में सावित्री जैसे उदाहरण हैं , जिसने अपने पति सत्यवान को अपने सशक्त मनोबल से यमराज से छीन लिया था। मान्यता है कि इस नक्षत्र में चंद्रमा दर्शन मनवांछित फल प्रदान करता है। वहीं रविवार का दिन होने की वजह से सूर्यदेव का भी व्रती महिलाओं को आशीर्वाद प्राप्त होगा। यह व्रत पति पत्नी में भावनात्मक लगाव और विश्वास को बढ़ाता है। इस व्रत को पहली बार करवा चौथ यानि नवविवाहिता महिलाओं के लिये बहुत अच्छा फलदायी बताया जा रहा है। करवा चौथ का पर्व महिलाओं के लिये सुखद अहसास है जिनका उन्हें साल भर इंतजार रहता है। ये व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पूरा होता है , इसलिये चांद निकलने का व्रत रखने वाली सभी महिलाओं की नजर आसमान की ओर रहती है , सबको चांद का बेसब्री से इंतजार रहता है। चांद दिखने का समय हर जगह के लिये अलग-अलग होता है। कहीं कुछ समय पहले चांद दिखाई देने लगता है , तो कहीं पर थोड़ा इंतजार भी कराता है। इस व्रत में कहीं सरगी खाने का रिवाज है तो कहीं नही भी है। किवदंती के अनुसार महाभारत काल से यह व्रत किया जा रहा है , भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने अर्जुन के लिये इस व्रत को किया था। आज के दिन सभी सुहागिन स्त्रियाँ सोलह श्रृंगार करके अपने पति की लम्बी उम्र, स्वास्थ्य , सौभाग्य एवं सुखद दांपत्य की कामना के लिये यह व्रत रखती हैं जो बहुत ही कठिन होता है। इस व्रत में कुछ नियम है जिनका कड़ाई से पालन किया जाता है। इस व्रत अवधि में जल भी ग्रहण नही किया जाता अर्थात निर्जला रखा जाता है। यह व्रत सूर्योदय से पहले और चाँद निकलने तक रखा जाता है। रात्रि में चाँद और पति का दीदार के लिये सुहागिन स्त्रियाँ चाँद के उदय होने का इंतजार करती हैं। मान्यता है कि चांद दर्शन के बाद ही व्रत पूरा होता है , उसके बाद ही महिलायें व्रत का समापन करती हैं। यह भी कहा जाता है कि बिना चांद दर्शन के व्रत का पूरा-पूरा फल नहीं मिलता है। चाँद निकलने पर शिव परिवार की पूजन करती हैं। फिर छलनी में घी का दीपक रखकर चंद्रमा को अर्घ्यं देकर , छलनी में से चंद्रमा के साथ अपने चाँद यानि पति का चेहरा देखती हैं। फिर पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोलती हैं और पति के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं। करवा चौथ के व्रत में माता पार्वती समेत शिव परिवार की पूजा की जाती है। इस दिन खास तौर पर गणेशजी का पूजन होता है और उन्हें ही साक्षी मानकर व्रत शुरु किया जाता है। गणेशजी को चतुर्थी का अधिपति देव माना गया है। पूजा करते और कथा सुनते समय सींक रखने की परंपरा है जो करवा माता की उस शक्ति का प्रतीक है जिसके बल पर उन्होंने यमराज के सहयोगी भगवान चित्रगुप्त के खाते के पन्नों को उड़ा दिया था। पूजन के पश्चात अर्घ्य दिये जाने का विधान है। करवा यानि मिट्टी का एक प्रकार का बर्तन जिसके द्वारा चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है , यहां अर्घ्य का मतलब चंद्रमा को जल देने से है। महिलाओं को श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार सोने, चांदी, पीतल अथवा मिट्टी का करवा भरना चाहिये। इस व्रत में चंद्रमा को अर्ध्य देकर चलनी से चंद्रमा को देखने के बाद पति को देखते है। इसके बाद पति अपने पत्नी को अपने हाथों से पानी पिलाकर व्रत खुलवाते हैं। इस दिन करवे में जल भरकर कथा सुनने का विधान है , इसके बिना अर्घ्य अधूरा माना जाता है। चंद्रमा के माता का कारक होने की वजह से करवाचौथ के दिन किसी भी महिला को अपनी सास , मांँ या फिर दूसरी महिला का अपमान नहीं करना चाहिये। करवा चौथ वाले दिन महिलायें सफेद रंग की चीजें जैसे दही , चावल , दूध या फिर सफेद रंग का कपड़ा किसी को ना दें क्योंकि सफेद रंग चंद्रमा का कारक माना जाता है। इस दिन इन चीजों का दान करने से आपको आपकी पूजा का फल नहीं मिलेगा। इस दिन महिलायें काले, नीले और भूरे रंग के कपड़े पहन कर पूजा ना करें इससे उसको पूजा का फल नहीं मिलता है।चलनी से चांद देखने का कारणकरवा चौथ के दिन महिलायें चलनी से अपनी पति को देखती हैं। चलनी से चांद देखने की इस परंपरा की कल्पना चंद्रमा और भगवान ब्रह्मा से की गई है। चंद्रमा को भगवान ब्रह्मा का स्वरूप माना गया है , साथ ही चांद में शीतलता , शालीनता , प्यार , जगत प्रसिद्धि जैसे गुण समाहित हैं। इसलिये करवा चौथ पर सभी महिलायें चलनी से चांद को देखकर ये कामना करती हैं कि उनका पति भी चांद जैसे गुणों से परिपूर्ण हो।कौन रख सकती हैं यह व्रत ?कुंवारी कन्यायें — अक्सर कहा जाता है है कि करवा चौथ का व्रत विवाहित महिलायें ही रख सकती हैं , लेकिन ऐसा नहीं है। मन चाहा वर पाने की इच्छा रखने वाली कुंवारी कन्यायें भी इस दिन करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं। कुंवारी कन्याओं को निर्जला की जगह निराहार व्रत रखनी चाहिये क्योंकि निर्जला व्रत शादी के बाद ही रखा जाता है। इस दिन ये व्रती सरगी की जगह फल खाती हैं , इस दिन कुंवारी कन्याओं को चांद देखकर नही बल्कि बिना छलनी के तारों को अर्घ्य देकर व्रत पारण नहीं करना चाहिये।सगाईशुदा लड़कियां – जिन लड़कियों की सगाई हो चुकी है और कुछ दिनों में शादी होने वाली है वे लड़कियां भी अपने होने वाले पति के लिये करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं। सुहागिन महिलाओं की ही तरह ये लड़कियां भी पूरा दिन निर्जला रहकर पति की लंबी आयु के लिये व्रत रखती हैं। सास के यहां से मिली सरगी खाती हैं और रात के समय पति की फोटो या वीडियो कॉल के जरिये पति को देखर व्रत का पारण करती हैं।पत्नी सहयोगी पति – आजकल नई-नवेली सुहागिनों के पति भी अपनी पत्नी के प्रति प्यार जताने के लिये करवा चौथ का व्रत रखते हैं। वे भी पत्नी की तरह दिन भर भूखे रहकर अपना प्यार जताते हैं , लेकिन पतियों के लिये करवा चौथ का ऐसा कोई नियम नहीं होता। पत्नी के साथ वे भी दिन भर भूखे-प्यासे रहकर साथ में ही व्रत का पारण करते हैं।इनसे करें परहेजकरवा चौथ के खास मौके पर महिलायें ध्यान रखें कि इस दिन किसी दूसरी महिला की चूड़ी बिल्कुल ना पहनें , ये अशुभ माना जाता है और व्रत कभी भी सफल नहीं होता। इस दिन सुहागिन महिलायें भूल कर भी हाथों को खाली ना रखें , हाथों में चूड़ियां अवश्य पहनी हों। इस दिन सफेद रंग की चूड़ियां बिल्कुल ना पहनें , इसे भी बहुत अशुभ माना जाता है। इस शुभ दिन हाथों में चूड़ियां पहनते समय इस बात का ध्यान भी रखें कि हाथों में सिंगल चूड़ी ना पहनें , बल्कि चूड़ियां जोड़े से पहनें। एक या तीन चूड़ी कभी नहीं पहनें , साथ ही इस बात को ध्यान में रखें कि चूड़ी चटकी हुई ना हो। करवाचौथ की शॉपिंग के दौरान कुछ चीजों को भूलकर भी ना खरीदें। करवाचौथ के दिन ना तो सफेद कपड़े खरीदने और ना ही पहनने चाहिये। इस दिन लाल , पीले , हरे और संतरी रंग के कपड़ों की खरीददारी शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन सुहागिन महिलाओं को तेज धार वाली वस्तुओं की खरीददारी नहीं करनी चाहये इनमें चाकू , कैंची और सुई जैसी चीजें शामिल हैं।सोलह श्रृंगार क्या है ?करवा चौथ के दिन विवाहित महिलाओं को पूर्ण श्रृँगार के साथ तैयार होना चाहिये। मान्यता है कि पूर्ण श्रृंगार में सोलह तरह के श्रृंगार महत्वपूर्ण होते हैं जिनमें सिंदूर , मंगलसूत्र , बिंदी , मेंहदी , लाल रंग के कपड़े , चूड़ियांँ , बिछिया , काजल , नथनी , कर्णफूल (ईयररिंग्स) , पायल , मांग टीका , तगड़ी या कमरबंद , बाजूबंद , अंगूठी , गजरा।करवा चौथ पर वीरवती की कथापौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल एक द्विज नामक ब्राह्मण के सात पुत्र और एक वीरवती नाम की कन्या थी , वीरवती सुंदर , धर्मनिष्ठ राजकुमारी और अपने सात भाईयों की इकलौती बहन थी। विवाह के बाद वीरवती ने पहली बार अपने पति की लंबी उम्र के लिये करवा चौथ का व्रत रखा , उसने दिनभर अन्न-जल ग्रहण नहीं किया और पूरी श्रद्धा के साथ व्रत का पालन किया। लेकिन दिन ढलते-ढलते भूख और प्यास के कारण वह अत्यधिक कमजोर हो गई , वीरवती की यह दशा देखकर उसके भाई चिंतित हो गये। वे अपनी बहन की हालत देखकर दुखी हो गये और उसे व्रत तोड़ने के लिये मनाने लगे लेकिन वीरवती ने कहा कि जब तक चंद्रमा उदित नहीं होता , वह व्रत नहीं तोड़ेगी। वीरवती के भाईयों ने अपनी बहन की हालत देखकर एक उपाय सोचा , उन्होंने पेड़ की आड़ में छल से एक दर्पण का उपयोग करके नकली चंद्रमा बना दिया। भाईयों ने वीरवती से कहा कि चंद्रमा निकल आया है और उसे देखकर व्रत तोड़ लो। वीरवती ने वह नकली चंद्रमा देखकर व्रत तोड़ दिया और जल ग्रहण कर लिया। जैसे ही उसने व्रत तोड़ा , उसे यह सूचना मिली कि उसका पति गंभीर रूप से बीमार हो गया है। वीरवती को तुरंत आभास हुआ कि उसने चंद्रमा की पूजा किये बिना और सही समय से पहले व्रत तोड़ दिया, जिसके कारण यह अनहोनी हुई है। वह अत्यधिक दुखी हुई और पश्चाताप करने लगी , अपने पति की लंबी आयु के लिये वीरवती ने दृढ़ संकल्प किया और पूरी श्रद्धा के साथ करवा चौथ का व्रत फिर से रखा। उसकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उसे आशीर्वाद दिया और उसका पति स्वस्थ हो गया।