: अनंत फलदाई है कार्तिक पूर्णिमा - अरविन्द तिवारी
Mon, Nov 27, 2023
जांजगीर चांपा – सनातन धर्म में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। पुराणों में सभी कार्तिक माह को आध्यात्मिक और शारीरिक ऊर्जा संचय के लिये उचित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और भगवान शंकर की आराधना की जानी चाहिये। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि शास्त्रों में बारहों महीनों में कार्तिक महीने को आध्यात्मिक एवं उर्जा संचय के लिये सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वैसे तो साल भर में बारह पूर्णिमा होती है लेकिन अधिकमास या मलमास को भी जोंड़ दिया जाये तो कुल मिलाकर तेरह पूर्णमायें हो जाती हैं लेकिन इनमें कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। कार्तिक महीने का यह सबसे अन्तिम दिन और कार्तिक पूर्णिमा आज है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान , दान के साथ साथ दीपदान का पुण्य अन्य दिनों के अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है। स्वयं नारायण ने भी कहा है कि महिनों में , मैं कार्तिक माह हूंँ। कार्तिक मास परम पावन होता है , इस महीने में किये गये पुण्य कर्मों का अनन्त गुणा फल मिलने की मान्यता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत रखना बेहद शुभ माना जाता है , धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ का फल मिलता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि स्वयं विष्णुजी ने ब्रह्माजी को , ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को और नारदजी ने महाराज पृथु को कार्तिक मास का महत्व बताया। इस माह की त्रयोदशी , चतुर्दशी और पूर्णिमा को पुराणों में अति पुष्करिणी कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग से देवतागण भी आकर गंगा में स्नान करते हैं , इसलिये इस दिन गंगा स्नान जरूर करें। अगर आपके लिये यह कर पाना संभव ना हो तो घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर नहा लें। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान नहीं करता है वह यदि केवल इन तीन तिथियों में सूर्योदय से पूर्व स्नान करे तो भी माह के पूर्ण फल का भागी हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत और पूजन करके बछड़ा दान करने से शिवलोक की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि इस दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धूल जाते हैं , वहीं दीपदान करने से सभी देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पूर्णिमा के दिन सुबह किसी पवित्र नदी, सरोवर या कुंड में स्नान और दीपदान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन गंगा स्नान और दान दस यज्ञों के समान माना गया है। यदि आपके घर के पास नदी नहीं है तो आप किसी मंदिर में जाकर दीपदान करें , इससे आपकी परेशानियां दूर होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। कार्तिक पूर्णिमा का व्रत रखने वालों को इस दिन हवन जरूर करना चाहिये और किसी जरुरतमंद को भोजन कराना चाहिये। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा में या तुलसी के पास दीप जलाने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार देवता अपनी दिवाली कार्तिक पूर्णिमा की रात को ही मनाते हैं , इसलिये यंह सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है।कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिवा , सम्भूति , प्रीति , संतति , अनुसुइया समेत क्षमा नामक छह तपस्विनी कृतिकाओं का पूजन करने का विशेष महत्व है , शाम को चंद्रमा निकलने पर इनका पूजन करना चाहिये। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हें कार्तिक की माता माना गया है , इनकी पूजा करने वालों के घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।आज देव दीपावलीइसी दिन महादेव ने त्रिपुरासूर नामक राक्षस का संहार किया था , जिससे देवगण बहुत प्रसन्न हुये। इस दिन भगवान विष्णु ने शिवजी को त्रिपुरारी नाम दिया जो शिव के अनेकों नामों में से एक है। इसलिये इस पूर्णिमा का एक नाम त्रिपुरी पूर्णिमा भी है। त्रिपुरासुर के वध होने की खुशी में सभी देवता स्वर्गलोक से उतरकर काँशी में दीपावली मनाते हैं। तभी से इस दिन श्रद्धालुओं द्वारा कांँशी में गंगा नदी के घाटों पर दीपदान कर दीपावली मनायी जाती है। यही नहीं यह भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने धर्म , वेदों की रक्षा के लिये मत्स्यावतार धारण किया था।धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु इस मास में मत्स्य रूप में जल में विराजमान रहते हैं और आज ही के दिन मत्स्य स्वरूप को छोंड़कर वापस बैकुंठ चले जाते हैं। इसी दिन देवी तुलसी भी बैकुंठधाम गयी थी। ऐसा माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन सोनपुर में गंगा गंडकी के संगम पर गज और ग्राह का युद्ध हुआ था। गज की करुणामयी पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने ग्राह का संहार कर भक्त की रक्षा की थी। इस वजह से देवताओं ने स्वर्ग में दीपक जलाये थे। तभी से देवताओं की दीपावली होने के कारण इस दिन देवताओं को दीपदान किया जाता है। दीपदान करने से सभी प्रकार की मनोकामनायें पूर्ण होती है और जीवन में आने वाली परेशानियाँ भी दूर होती हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत रखने से हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस दिन गौ , अश्व और घी आदि के दान से संपत्ति में बढ़ोतरी होती है। इस दिन सत्यनारायणजी की कथा , विष्णुपुराण , विष्णु सहस्रनाम , कनकधारा का पठन , श्रवण करने वाले जातकों को मोक्ष प्राप्त होता है। इस दिन सरसों का तेल , तिल , काले वस्त्र किसी जरूरतमंद को दान करना चाहिये , ऐसा करने से आपको पुण्य फल प्राप्त होगा। ऐसा करने से आप कई क्षेत्रों में सफलता अर्जित करेंगे , साथ ही सारे कष्टों से मुक्ति मिलती है। कार्तिक पूर्णिमा की शाम को तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाकर तुलसी माता का स्मरण करते हुये पौधे के चारो तरफ परिक्रमा करने से भगवान विष्णु जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और आर्थिक समस्यायें दूर होती हैं।देव दीपावली की पहली कथादेव दीपावली की कथा महर्षि विश्वामित्र से जुड़ी है। मान्यता है कि एक बार विश्वामित्रजी ने देवताओं की सत्ता को चुनौती देते हुये अपने तप के बल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। यह देखकर देवता अचंभित रह गये , क्योंकि विश्वामित्र जी ने ऐसा करके उनको एक प्रकार से चुनौती दे दी थी। इस पर देवता त्रिशंकु को वापस पृथ्वी पर भेजने लगे , जिसे विश्वामित्र ने अपना अपमान समझा। उनको यह हार स्वीकार नहीं थी तब उन्होंने अपने तपोबल से उसे हवा में ही रोक दिया और नई स्वर्ग तथा सृष्टि की रचना प्रारंभ कर दी , इससे देवता और भी भयभीत हो गये। उन्होंने अपनी गलती की क्षमायाचना तथा विश्वामित्र को मनाने के लिये उनकी स्तुति प्रारंभ कर दी। अंतत: देवता सफल हुये और विश्वामित्र उनकी प्रार्थना से प्रसन्न हो गये , और उन्होंने दूसरे स्वर्ग और सृष्टि की रचना बंद कर दी। इससे सभी देवता प्रसन्न हुये और उस दिन उन्होंने दिवाली मनायी जिसे देव दीपावली कहा गया।
: क्या वाकई लोकप्रियतावाद के रास्ते पर बढ़ रही है भाजपा? (आलेख : राजेंद्र शर्मा)
Wed, Nov 22, 2023
विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र में पांच में से तीन राज्यों -- मिजोरम, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश -- मेें 21 नवंबर को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वोट डाले जा चुके हैं और चौथे राज्य --राजस्थान-- में इसी हफ्ते के आखिर में वोट पड़ जाएंगे। उसके बाद, इस चक्र में से तेलंगाना ही बचेगा, जहां मतदान इस महीने के आखिरी दिन 30 नवंबर को होना है। लेकिन, तेलंगाना का मामला वैसे भी इस चक्र में कुछ अलग-सा है। विधानसभाई चुनावों के इस चक्र में शामिल यह इकलौता दक्षिणी राज्य, ऐसा इकलौता राज्य भी है, जहां राष्ट्रीय मुख्यधारा की पार्टी बनने की आकांक्षी एक क्षेत्रीय पार्टी-- बीआरएस (पहले तेलंगाना राष्ट्र समिति) -- सत्ता में है। दूसरी तरफ, मिजोरम की तरह, इस चक्र का यह एक और ऐसा चुनाव मुकाबला है, जहां केंद्र में सत्ताधारी भाजपा, अपनी सारी कोशिशों तथा सारे पैंतरों तथा सारी ताकत झोंकने के बावजूद, चुनावी हाशिए पर ही है। प्राय: सभी चुनावी रिपोर्टें और चुनाव-पूर्व सर्वे इस पर एकमत हैं कि तेलंगाना में वास्तविक चुनावी मुकाबला बीआरएस और कांग्रेस के बीच ही है, जबकि भाजपा काफी पीछे तीसरे स्थान के लिए होड़ कर रही है। इस माने में तेलंगाना के विधानसभाई चुनाव की कहानी के संकेत, मिजोरम की तरह, चुनाव के इस चक्र की मुख्य कहानी से अलग ही रहते लगते हैं। इसीलिए, हैरानी की बात नहीं है कि अब तक बाकायदा इसकी चर्चाएं भी शुरू हो गयी हैं कि चुनाव के इस चक्र के मोटे तौर पर उत्तरी भारत के लिए क्या संकेत हैं और विशेष रूप से आगामी आम चुनाव के लिए, सीधे चुनावी नतीजों के अलावा क्या संकेत नजर आ रहे हैं?इस सिलसिले में एक स्वत:स्पष्ट रुझान की ओर स्वाभाविक रूप से अनेक टिप्पणीकारों का ध्यान गया है। विशेष रूप से उत्तरी भारत के तीनों राज्यों -- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान -- में, इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच जिस तरह कल्याणकारी कदमों के वादों की होड़ लगी हुई है, इससे पहले कम-से-कम हिंदीभाषी इलाके में शायद ही कभी देखने को मिली हो। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में, जहां कांग्रेस सत्ता में है, कांग्रेसी सरकारों में इन कल्याणकारी कदमों के वादों को और बढ़ाने की और भाजपा की ओर से, उनसे बढ़कर वादे करने की होड़ लगी हुई है। इसी प्रकार, मध्य प्रदेश में जहां भाजपा सरकार में है, उसकी ओर से बढ़-चढ़कर वादे करने की कोशिश की गयी है और उसे चुनौती दे रही कांग्रेस ने भी उसके एक-एक वादे का मुकाबला करने की कोशिश की है। इस कोशिश में दोनों ओर के चुनाव घोषणापत्रों में जैसे सभी संभव तबकों के लिए रियायतों के वादों को समेट लिया गया है।विभिन्न तबकों के लिए रियायतों के वादों की इस होड़ में, जिसमें एक प्रकार से दोनों पक्ष एक जैसे ही वादे करते नजर आते हैं, एक दिलचस्प मुकाबला और जुड़ गया है। यह मुकाबला है, अपने इन वादों की विश्वसनीयता का भरोसा दिलाने और प्रतिद्वंद्वी के वादों को हवा-हवाई साबित करने के मुकाबले का। जाहिर है कि इस मुकाबले में छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में कांग्रेस और मध्य प्रदेश में भाजपा, अपनी पिछली सरकार के रिकार्ड के आधार पर, अपने वादों की विश्वसनीयता साबित करने में लगी हुई हैं और दूसरी ओर, जो पार्टियां सत्ता में नहीं हैं, वे संबंधित राज्यों की पिछली सरकारों के रिकार्ड के दावों पर भी सवालिया निशान लगाने में जुटी हुई हैं। इस सब के बीच भाजपा ने, जो कि इन तीनों हिंदीभाषी राज्यों में एक प्रकार से प्रधानमंत्री मोदी के ही चेहरे पर चुनाव लड़ रही है और जिसने इस चक्र में अपने इकलौते मुख्यमंत्री, शिवराज चौहान तक की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर खुद ही संदेह खड़े कर दिए हैं, फिर पूर्व-मुख्यमंत्रियों -- वसुंधरा राजे और रमन सिंह -- की तो बात ही क्या करना, एक नया काम यह किया है कि इन सारे वादों को बाकायदा ‘‘मोदी की गारंटियां’’ का नाम दे दिया गया है। यह दूसरी बात है कि इस संदर्भ में ‘‘गारंटियां’’ शब्द के उपयोग को, कांग्रेस अपनी शब्दावली में से बौद्धिक चोरी का मामला बता रही है।इस सबसे कुछ टिप्पणीकारों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि अब इन चुनावों में मुकाबला, जनता के लिए रियायतों के वादों के बीच हो चला हैै। इसके साथ उसी सांस में यह भी जोड़ दिया जाता है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मुद्दे और प्रयास, पीछे पड़ गए लगते हैं! यहां तक कि आने वाले आम चुनाव के लिए भी ऐसे ही इशारे देखने की भी कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन, ऐसा कोई निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। बेशक, इसमें कोई शक नहीं है कि एक बार फिर चुनाव सामने देखकर, प्रधानमंत्री मोदी ने और जाहिर है कि उनसे संकेत ग्रहण कर संघ-भाजपा के समूचे नेतृत्व ने, तथाकथित ‘‘मुफ्त की रेवडिय़ों’’ के प्रति अपनी हिकारत को अचानक सिर्फ त्याग ही नहीं दिया है, जोर-शोर से खुद भी अपनी ओर से इस तरह की रियायतें देने की कसमें खाने में लगे हुए हैं। यह दूसरी बात है कि ‘‘मोदी की गारंटी’’ की शब्दावली का सहारा लेने के बावजूद, अपने वादों को विश्वसनीय बनाने के लिए उन्हें ‘‘मुफ्त की रेवडिय़ों’’ के प्रति हिकारत के अपने सुप्रीमो के रिकार्ड के चलते, कुछ-न-कुछ अतिरिक्त मेहनत जरूर करनी पड़ रही है।फिर भी मुद्दा सिर्फ विभिन्न तबकों के लिए रियायतों की इन घोषणाओं के मामले में मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के रूप में कांग्रेस और भाजपा के बीच होड़ होने का ही नहीं है। अव्वल तो यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा इस होड़ में कोई स्वेच्छा से शामिल नहीं हुई है। उसका स्वाभाविक रुख तो, जिसे उसके शीर्ष सिद्घांतकारों ने फिलहाल ताक पर भले रख दिया हो, पर त्यागा अब भी नहीं है, ‘‘मुफ्त की रेवडिय़ों’’ के तौर पर, इस सब को ज्यादा से ज्यादा एक जरूरी भटकाव मानने का ही है। बेशक, इसके बावजूद विपक्ष के ज्यादा से ज्यादा असरदार होते दबाव में, संघ-भाजपा को इसके आरोपों का खंडन करने के लिए कि उसके पास ‘‘हिंदू-मुस्लिम करने’’ के सिवा, जनता को देने के लिए कुछ है ही नहीं, जनता को देने के लिए अपनी ओर से पेशकशें करनी जरूर पड़ रही हैं, लेकिन उसकी यह मुद्रा एक चुनावी कार्यनीतिक मुद्रा ही है। इन सभी पेशकशों का प्रधानमंत्री के नाम व छवि के साथ जोड़ा जाना भी, इन्हें चुनावी कार्यनीति से ऊपर नहीं उठा पाता है, जहां चुनाव के बाद इन्हें जुमला कहकर खारिज किया जाना मुश्किल हो।इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इस तरह की चुनावी कार्यनीतिक मुद्रा के अपनाए जाने में, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के पैंतरों का पीछे रखे जाना खोजना सही नहीं होगा। यह ज्यादा से ज्यादा इतना दिखाता है कि संघ-भाजपा खांटी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नारे पर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, नहीं लडऩे जा रहे हैं, बल्कि चुनाव प्रचार में जनहितकारी वादों का भी सहारा लेने जा रहे हैं। लेकिन, खांटी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नारे पर चुनाव लडऩे की कल्पना तो वास्तविकता न होकर, बहस में या आलोचना में पेश किया जाने वाला, एक कैरीकेचर भर ही हो सकती है। जनतांत्रिक चुनाव में लोगों को उनके हितों का ख्याल रखने का भरोसा तो, किसी भी राजनीतिक पार्टी को दिलाना ही होता है, वह अपने सार में चाहे जितनी भी जनविरोधी क्यों न हो।तो क्या हम जो देख रहे हैं, उसे सांप्रदायिक और लोकप्रियतावादी या लोकरंजक, इन दो अलग-अलग तत्वों के मिश्रण के रूप में देखा जाना सही होगा? पहली नजर में जरूर यह इस प्रकार के मिश्रण का मामला लग सकता है और इस मिश्रण में कोई लोकप्रियतावादी तत्व की अधिकता या प्रमुखता भी खोज सकता है। लेकिन, संघ-भाजपा के मामले में इन दो प्रकार के तत्वों की उपस्थिति को इस तरह से देखना भ्रामक होगा। असल में इस मामले में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आवेग, एक बुनियादी ढांचे का काम करता है और इस बुनियादी ढांचे में ही लोकप्रिय तत्व समेत दूसरे सभी तत्व संयोजित हो जाते हैं। इसके लिए संघ-भाजपा अपने लिए, चुनाव प्रचार के दौरान ही नहीं, बल्कि उससे आगे-पीछे, एक प्रकार से समग्रता में अपनी गतिविधियों के जरिए, एक धार्मिक-राजनीतिक यानी बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक पहचान बनाती हैं। और यही पहचान, उनके लोकप्रियतावाद को भी परिभाषित करती है। जैसे वे आदिवासियों के हित की दुहाई तो देंगे, लेकिन उसके साथ ही उसमें ईसाई-आदिवासीविरोधी तत्व जोड़ देंगे। वे रोजगार की बात तो करेंगे, लेकिन फौरन उसके साथ अनारक्षण का आग्रह या अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण से पिछड़े गैर-हिंदुओं को बाहर करने का आग्रह ले आएंगे। जनतंत्र की दुहाई देंगे और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का छीनने के जतन कर रहे होंगे, आदि, आदि।इस सिलसिले में, विधानसभाई चुनाव के इस चक्र में ही तथाकथित ‘‘तुष्टीकरण'’ विरोध को, जिस तरह भाजपा के बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक संदेश का मुख्य वाहक बना दिया गया है, उसे याद रखना जरूरी है। इस बार के अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण से शुरू कर के मोदी ने, बार-बार प्रयोग कर के ‘‘तुष्टीकरण" विरोध के नारे को, अपने अल्पंख्यक और विशेष रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यकविरोधी मंतव्यों का संकेतक बना दिया है। सबसे बढक़र राजस्थान में कन्हैयालाल टेलर की हत्या के प्रसंग के बहाने से, जाहिर है कि बिना किसी ठोस आधार के प्रधानमंत्री मोदी से लेकर नीचे तक, संघ-भाजपा की सेनाएं जिस तरह ‘‘तुष्टीकरण’’ का शोर मचाती मिल जाएंगी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ही पुकार है। इसी के सहारे राजस्थान में कांग्रेस के राज में हिंदुओं के असुरक्षित हो जाने, उनका अपने त्यौहार मनाना मुश्किल हो जाने आदि का सरासर झूठा आख्यान, खुद प्रधानमंत्री द्वारा प्रचारित करने की कोशिश की गयी है। यह संघ-भाजपा के लिए अयोध्या में राम मंदिर की दुहाई से भी ज्यादा असरदार पुकार है।हैरानी की बात नहीं होगी कि विधानसभाई चुनावों के मौजूदा चक्र के नतीजों के बाद, संघ-भाजपा को विभिन्न तबकों के लिए रियायतों के वादों के रूप में और भी ज्यादा लोकप्रियतावाद की मिलावट करनी पड़े। लेकिन, यह मिलावट सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के समग्र ढांचे में अन्य तत्वों के संयोजन के रूप में की जा रही होगी और राम मंदिर की दुहाई से भी बढक़र, ‘‘तुष्टीकरण’’ विरोध का और हिंदुओं के खतरे में होने के शोर को इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का औजार बनाया जाएगा।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक 'लोकलहर' के संपादक हैं।)
: छठ पर्व पर पुरी शंकराचार्यजी ने दिया संदेश
Mon, Nov 20, 2023
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टजगन्नाथपुरी - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर एवं हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु तथा हिन्दू राष्ट्र प्रणेता अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज सनातन संस्कृति में आयोजित होने वाले पर्वों के आध्यात्मिक महत्व एवं आराधना पद्धति के संबंध में संदेश प्रसारित करते रहते हैं। इसी तारतम्य में कार्तिक शुक्ल षष्ठी भगवान् आदित्य और भगवती षष्ठी देवी की आराधना की पवित्र तिथि होती है। पूर्वांचल क्षेत्र में इसे पारंपरिक रूप से छठपूजा के रूप में जाना जाता है तथा देश के प्रत्येक हिस्से में इसे पूर्वांचल के लोग श्रद्धा एवं उत्साह पूर्वक मनाते हैं। पुरी शंकराचार्यजी का कथन है कि भगवान् सूर्य की आराधना करने से व्यक्ति को सहस्त्रों जन्मों तक गरीबी , दरिद्रता , दीनता का मुख देखना नहीं पड़ता। पुरी शंकराचार्यजी उद्घृत करते हैं कि सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा की शक्ति स्वरूपा मूल प्रकृति के छठे अंश से षष्ठी देवी ( छठदेवी) समुत्पन्न होती है। इस आराधना पर्व पर महाराजश्री का संदेश है कि सनातन धर्म में आस्थान्वित महानुभाव , पवित्र दशा में आदित्याय नम: इस मंत्र का आस्थापूर्वक 1008 बार जप करें तथा भगवान् सूर्य और षष्ठी देवी को जलदान आदि से तृप्त कर उनका अनुग्रह पात्र बनें। स्वास्थ्य , सुमति , समृद्धि से सम्पन्न भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में ख्यापित करने की भावना से उनकी आराधना करें। षष्ठी पर्व पर अधिक समय तक व्रत रखना पड़ता है। संयम रखना पड़ता है , स्नान भी करना पड़ता है। अधिक संयम बरतने पर अधिक ऊंचे फल की भी प्राप्ति होती है।