: राम शब्द में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है - पुरी शंकराचार्य
Sun, Oct 6, 2024
बिलासपुर - अपने राष्ट्रोत्कर्ष अभियान के तहत तीन दिवसीय प्रवास पर बिलासपुर पहुंचे पुरी शंकराचार्य स्वामीश्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ने आज पहले दिन अशोक नगर बिरकोना रोड स्थित अशोका वाटिका में हिन्दू राष्ट्र संगोष्ठी में धर्म , आध्यात्म और राष्ट्र से संबंधित जिज्ञासाओं के समाधान में उद्धृत किया कि जीविका जीवन के लिये है , जीवन जीविका के लिये नही। जीवन है जीवनधन जगदीश्वर की प्राप्ति के लिये। प्रसाद की अशुद्धि के संबंध में उन्होंने कहा न्यायालय का यह आदेश है कि शासनतन्त्र को धार्मिक क्षेत्र में हस्तक्षेप का अधिकार नही होता है। मठ , मंदिर का परिचालन मान्य आचार्यों के निर्देशन में होना चाहिये। गोहत्या की रक्षा के संबंध मे उन्होंने कहा कि महायंत्रों के प्रयोग से दिव्यता का विलोप होता है। ट्रेक्टर , मालगाड़ी आदि के प्रयोग से बैलगाड़ी का प्रचलन समाप्त हुआ और बैलों का उपयोग कृषि कार्य में बंद हो गया। सभी घरों में गो सेवा एवं गोपालन होना चाहिये तथा प्रत्येक क्षेत्र में सामूहिक गोचर भूमि गोवंशों के लिये सुरक्षित होनी चाहिये। सात्विक आहार विहार के पालन से कुसंगति में प्रवृत्ति नही होती है। राम शब्द की महत्ता के संबंध मे पुरी शंकराचार्यजी ने कहा कि राम शब्द मे शामिल र का तात्पर्य अग्नि से , आ की मात्रा का तात्पर्य सूर्य से और म का तात्पर्य चंद्रमा से है। अग्नि - सूर्य और चंद्रमा वाक् , दृष्टि एवं मन के प्रतीक है । इस प्रकार राम शब्द में सम्पूर्ण ब्रहाम्ड समाहित है। गौरतलब है कि राष्ट्रोत्कर्ष अभियान के माध्यम से पूरे विश्व में सनातन धर्म के प्रचार – प्रसार एवं देश भर में सनातन संस्कृति के संरक्षण हेतु भारत भ्रमण पर निकले ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ जगन्नाथपुरी के पीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानंद सरस्वतीजी महाराज आज सुबह बिलासपुर पहुंचे। अम्बिकापुर - दुर्ग एक्सप्रेस से उस्लापुर रेल्वे स्टेशन पहुंचने पर शिष्यवृंदों द्वारा कीर्तन वाद्ययंत्रों के साथ शंकराचार्यजी का भव्य स्वागत किया गया। इसके साथ ही पूरा स्टेशन धार्मिक जयकारों के साथ हम भारत भव्य बनायेंगे – हम हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे के जयघोष से गूंज उठा। स्वागत पश्चात वे सड़क मार्ग से बिरकोना रोड स्थित अशोक वाटिका पहुंचे जहां भी आरती पूजन कर उनका आत्मीय स्वागत किया गया। इसके बाद प्रथम सत्र में उन्होंने धर्म , आध्यात्म और राष्ट्र से संबंधित परिचर्चा की , वहीं असंख्य शिष्यों ने महाराजश्री से दीक्षा भी लिया। इस कार्यक्रम के तहत 01 अक्टूबर को प्रात:कालीन सत्र में दोपहर बारह बजे से महाराजश्री का दर्शन - दीक्षा और हिन्दू राष्ट्र संगोष्ठी आयोजित है , जिसमें उपस्थित सनातनी भक्त वृन्द धर्म - राष्ट्र और आध्यात्म से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं। इसके पश्चात पुरी शंकराचार्यजी पत्रकारों से भी चर्चा करेंगे। वहीं सायंकालीन सत्र में पांच बजे से सात बजे तक पुन: दर्शन एवं श्रीशंकराचार्यजी के श्रीमुख से आध्यात्मिक संदेश श्रवण का सुअवसर सुलभ रहेगा। इसी कड़ी में 02 अक्टूबर को अपरान्ह दो बजे उस्लापुर रेलवे स्टेशन से रेलमार्ग से दुर्ग उधमपुर एक्सप्रेस से आगरा प्रस्थान के पूर्व श्रीशंकराचार्यजी का बारह बजे निवासस्थल अशोक वाटिका में ही दर्शन सुलभ रहेगा तथा महाराजश्री एक बजे अशोकवाटिका से उस्लापुर के लिये प्रस्थान करेंगे। धर्मसंघ पीठपरिषद् , आदित्यवाहिनी - आनन्दवाहिनी संगठन ने पुरी शंकराचार्यजी के बिलासपुर आगमन के शुभ अवसर पर उपरोक्तानुसार प्रात:कालीन एवं सायं के सत्र में उपस्थित रहकर दर्शन तथा आध्यात्मिक संदेश श्रवण का लाभ लेने की सभी नगरवासी / क्षेत्र के लोगों से अपील की है। इसकी जानकारी श्रीसुदर्शन संस्थानम् , पुरी शंकराचार्य आश्रम / मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने दी।
: ज्ञान , वैराग्य और तपस्या की देवी है मां ब्रह्मचारिणी – अरविन्द तिवारी
Sun, Oct 6, 2024
रायपुर – नवरात्री में नौ दिनों तक माँ दुर्गा के अलग अलग स्वरूपों की पूजा होती है। हर दिन माँ के अलग अलग मंत्रों का उच्चारण करने और अलग अलग भोग लगाने से माँ प्रसन्न होकर मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद देती हैं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि नवरात्रि के दूसरे दिन आज मांँ दुर्गा की नौ शक्तियों के दूसरे स्वरूप मांँ ब्रह्मचारिणी के दर्शन पूजन का विधान है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ‘चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। माँ ब्रह्मचारिणी के नाम का अर्थ – ब्रह्म मतलब तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली देवी होता है। मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान , तपस्या और वैराग्य की देवी माना जाता है। कठोर साधना और ब्रह्म में लीन रहने के कारण भी इनको ब्रह्मचारिणी कहा गया है। ब्रह्मचारिणी रूप की आराधना से उम्र लम्बी होती है। मान्यता है कि इन देवी की आराधना से विवाह में आने वाली हर बाधा दूर हो जाती है। माँ दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनका स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य , दिव्य रूप में होता है , इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमंडल लिये श्वेत वस्त्र में देवी विराजमान होती हैं। माँ ब्रह्मचारिणी पूजा , तप , शक्ति , त्याग , सदाचार , संयम और वैराग्य में वृद्धि करती है और शत्रुओं का नाश करती है। ये अक्षय माला और कमंडलधारिणी , शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को वे अपनी सर्वज्ञ सम्पन्न विद्या देकर विजयी बनाती हैं। इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनकी शादी तय हो गई है लेकिन अभी भी शादी नहीं हुई है। उन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र , पात्र आदि भेंट किये जाते हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मांँ को शक्कर और पंचामृत का भोग लगाने से लंबी आयु का वरदान मिलता है। नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा में हरे रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन लम्बी उम्र की कामना के लिये शक्कर का भोग लगाया जाता है। मां ब्रह्मचारिणी को दूध और दही का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा चीनी , सफेद मिठाई और मिश्री का भी भोग लगाया जा सकता है। माता ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती हैं कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योग-शास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है। आज के दिन माँ के “या देवी सर्वभूतेषु मांँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ इसके अलावा ब्रह्मचारिणी: ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:।” मंत्र का जप किया जाता है।ब्रह्मचारिणी कथा -पौराणिक कथा के अनुसार पूर्वजन्म में मांँ ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था। भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिये बहुत कठिन तपस्या की , इसीलिये इन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया। मांँ ब्रह्मचारिणी ने एक हजार वर्ष तक फल-फूल खाकर बिताये और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर जीवन निर्वाह किया। इसके बाद मांँ ने कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप को सहन करती रहीं , टूटे हुये बिल्व पत्र खाकर भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इससे भी जब भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हुये तो उन्होने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिया और कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं , पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। मांँ ब्रह्मचारणी कठिन तपस्या के कारण बहुत कमजोर हो हो गई। इस तपस्या को देख सभी देवता , ऋषि , सिद्धगण , मुनि सभी ने सराहना की और मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया। मांँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिये।
: विश्व निर्माता है भगवान विश्वकर्मा - अरविन्द तिवारी
Tue, Sep 17, 2024
रायपुर - दुनियाँ का सबसे पहला इंजीनियर , देवशिल्पी , वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा के जन्मदिवस के मौके पर आज देश भर में विश्वकर्मा पूजा धूमधाम से मनाया जायेगा। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि इन्होंने ही ब्रह्माजी के साथ मिलकर इस सृष्टि का निर्माण किया था। श्रमिक समुदाय से जुड़े लोगों के लिये यह दिन बेहद खास होता है। आज के दिन उद्योगों , कंपनियों , दुकानों एवं घरो में मशीनों, औजारों , अस्त्र-शस्त्र सहित विश्वकर्मा की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। सनातन धर्म में विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने देवी-देवताओं के लिये ना सिर्फ भवनों का निर्माण किया बल्कि समय-समय पर अस्त्र-शस्त्रों का भी सृजन किया था। यही वजह है कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सभी औजारों या उपकरण पर विश्वकर्मा का प्रभाव माना जाता है। इस दिन कारोबारी और व्यवसायी लोग भगवान विश्वकर्मा की पूजा करें तो व्यापार में तरक्की मिलती है। घर में रखे हुये लोहे के सामान और मशीनों की पूजा करने से वे जल्दी खराब नहीं होते और मशीनें अच्छी चलती हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान मशीनों पर अपनी कृपा बनाये रखते हैं। भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से व्यक्ति की शिल्पकला का विकास होता है , जिससे व्यक्ति को अपने काम में सफलता हासिल होती है। शास्त्रों की मान्यता के अनुसार विश्वकर्मा भगवान की पूजा करने से दुर्घटनाओं व आर्थिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। इनकी पूजा से जीवन में कभी भी सुख समृद्धि की कमी नहीं रहती है। कलयुग में भगवान विश्वकर्मा की पूजा हर व्यक्ति के लिये जरूरी और लाभप्रद बतायी गयी है। कलयुग का संबंध कलपुर्जों से माना जाता है और आज के युग में कलपुर्जे का प्रयोग हर शख्स कर रहा है। लैपटॉप , मोबाइल फोन और टैबलेट भी एक प्रकार की मशीन हैं और इनके बिना आज के युग में रह पाना बहुत मुश्किल है। इसलिये भगवान विश्वकर्मा की पूजा करना हम सबके लिये बेहद शुभफलदायी मानी जा रही है। विश्वकर्माजी का जन्म कब हुआ , कैसे हुआ ? इस बात को लेकर अलग-अलग कथायें और तथ्य हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार वास्तुकला के आचार्य भगवान विश्वकर्मा वास्तुदेव तथा माता अंगिरसी के पुत्र हैं। वहीं स्कन्द पुराण में बताया जाता है कि धर्म ऋषि के आठवें पुत्र प्रभास का विवाह गुरु बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मवादिनी के साथ हुआ था। ब्रह्मवादिनी ही विश्वकर्माजी की माँ थी। इसके अलावा वराह पुराण में इस बात का उल्लेख है कि सब लोगों के उपकारार्थ ब्रह्मा परमेश्वर ने बुद्धि से विचारक विश्वकर्मा को पृथ्वी पर उत्पन्न किया था। सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी कर्म सृजनात्मक है जिन कर्मों से जीव का जीवन संचालित होता है , उन सभी के मूल में विश्वकर्मा हैं। अत: उनका पूजन जहां प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक ऊर्जा देता है वहीं कार्य में आने वाली सभी अड़चनों को खत्म करता है। विश्वकर्मा को देवशिल्पी कहा जाता है उन्होंने सतयुग में स्वर्गलोक , त्रेतायुग में सोने की लंका , द्वापर में द्वारिका और कलियुग में भगवान जगन्नाथ , बलभद्र एवं सुभद्रा की विशाल मूर्तियों का निर्माण करने के साथ ही यमपुरी , वरुणपुरी , पांडवपुरी , कुबेरपुरी , शिवमंडलपुरी तथा सुदामापुरी , हस्तिनापुर , पुष्पक विमान के साथ-साथ भगवान विष्णु के लिये सुदर्शन चक्र , भगवान शिव के लिये त्रिशूल और यमराज का कालदंड और सोने की लंका का निर्माण किया। पुराणों में जिक्र है कि भगवान शिव ने माता पार्वती के लिये एक महल का निर्माण करने के बार में सोचा और इसकी जिम्मेदारी भगवान विश्वकर्मा को सौंपी , तब उन्होंने सोने का महल बना दिया। इस महल की पूजा के लिये रावण को बुलाया गया , लेकिन रावण महल को देखकर इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि उसने दक्षिणा के रूप में महल को ही मांग लिया। भगवान शिव उस महल को रावण को सौंपकर खुद कैलाश पर्वत चले गये। महर्षि दधीचि द्वारा दी गई उनकी हड्डियों से ही विश्वकर्माजी ने “बज्र” का निर्माण किया , जो कि देवताओं के राजा इंद्र का प्रमुख हथियार है। ऋग्वेद में 11 ऋचाओं में इनके महत्व का वर्णन किया गया है। एक कथा के अनुसार संसार की रचना के शुरुआत में भगवान विष्णु क्षीरसागर में प्रकट हुये। विष्णुजी के नाभि-कमल से ब्रहाजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र का नाम धर्म रखा गया। धर्म का विवाह संस्कार वस्तु नामक स्त्री से हुआ। धर्म और वस्तु के सात पुत्र हुये , उनके सातवें पुत्र का नाम वास्तु रखा गया। वास्तु शिल्पशास्त्र में निपुण था , वास्तु के पुत्र का नाम विश्वकर्मा था। वास्तुशास्त्र में महारथ होने के कारण विश्वकर्मा को वास्तुशास्त्र का जनक कहा गया। इस तरह भगवान विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ , जो अपने माता पिता की भांति महान शिल्पकार हुये। विश्वकर्माजी ने ही धरती , आकाश , जल सहित पूरे ब्रह्मांड की रचना की। विश्वकर्मा के पांच महान पुत्र: विश्वकर्मा के उनके मनु , मय , त्वष्टा , शिल्पी एवं दैवज्ञ नामक पांच पुत्र थे। ये पांचों वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे। मनु को लोहे में , मय को लकड़ी में , त्वष्टा को़ कांसे एवं तांबे में , शिल्पी को ईंट और दैवज्ञ को सोने-चांदी में महारात हासिल थी।