: असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है दशहरा – अरविन्द तिवारी
Tue, Oct 24, 2023
नई दिल्ली - दशहरा हिंदुओं का एक प्रमुख एवं राष्ट्रीय पर्व है जिसे आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमीं तिथि को देश भर में बड़े ही हर्षोल्लास एवं धूमधाम के साथ मनाया जाता है।मान्यता है कि त्रेतायुग में आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन प्रभु श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर माता सीता को उसके चंगुल से आजाद किया था। तब से हर साल इस दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है , दशहरा का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया भगवान श्रीराम ने आज ही के दिन रावण का वध किया था तथा दस दिन के युद्ध के बाद देवी दुर्गा ने महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था , इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। दशहरा का पर्व हमें अच्छाई की जीति आशा के साथ नेक कार्यों में भरोसा करना सिखाता है। आज के दिन असत्य पर सत्य की जीत होने की वजह से सभी लोगों को यह प्रण लेना चाहिये कि वह अपने मन की बुराइयों को मारेंगे। दशहरा के दिन कई लोग अपने घरों में पूजन करते हैं। आज के दिन जगह-जगह मेला लगता है , रामलीला का आयोजन होता है जिसमें भगवान राम की वीरगाथा दिखायी जाती है और रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। विजयादशमी के दिन लोग अस्त्र शस्त्रों का भी पूजन करते हैं। इस दिन अपराजिता देवी एवं शमी वृक्ष के पूजन का भी विशेष महत्व है। विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमी वृक्ष के समीप दीपक जलाकर उसे प्रणाम करें। पूजन के उपरांत हाथ जोड़कर निम्न प्रार्थना करें-
‘शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।’
रावण दहन के पश्चात घर आने पर सभी की आरती उतारकर स्वागत एवं भेंट किया जाता है। इसके साथ ही गाँव और पड़ोस में शमी पत्ता बांट कर बड़ों से हर कार्य में विजयश्री का आशीर्वाद भी लिया जाता है। आज के दिन नया काम शुरू करने की भी मान्यता है। कहा जाता है कि आज के दिन शुरू किये गये किसी भी काम में विजय यानि सफलता निश्चित रूप से मिलती है। अगर आपके परिवार में अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है तो एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर सभी शस्त्र उस पर रखें। फिर गंगाजल छिड़क कर पुष्प अर्पित करें। साथ ही यह प्रार्थना करें कि संकट पड़ने पर यह आपकी रक्षा करें। इस दिन भगवान श्रीराम की उपासना करने का बहुत अधिक महत्व होता है। एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान श्रीराम की प्रतिमा स्थापित करें। फिर धूप , दीप और अगरबत्ती जलाकर भगवान श्रीराम की उपासना करें और अंत में आरती करें।नीलकंठ का दर्शन होता है शुभदशहरे के पर्व को लेकर कई तरह की मान्यतायें प्रचलित है। नीलकंठ पक्षी को भगवान शिव का प्रतिनिधि माना गया है। एक मान्यता के अनुसार इस दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन करना भी अत्यंत शुभ होता है। कहते हैं कि दशहरा के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन से आपके सभी बिगड़े काम सही हो जाते हैं और जीवन में सुख समृद्धि भी आती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम जब रावण का वध करने जा रहे थे तो उस दौरान उन्हें नीलकंठ पक्षी के दर्शन हुये थे। इसके बाद भगवान श्रीराम को रावण पर विजय प्राप्त हुई थी। इसके अलावा कहा जाता है कि रावण का वध करने के बाद भगवान राम को ब्राह्मण हत्या का पाप लगा था। भगवान श्रीराम ने उस पाप से मुक्ति पाने के लिये शिवजी की आराधना की थी। मान्यता है कि श्रीराम को इस पाप से मुक्ति दिलाने के लिये शिव जी ने नीलकंठ पक्षी के रूप में दर्शन दिया था। तभी से दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन की परंपरा है।
: नवरात्रि में शक्तिशाली है दुर्गाष्टमी - अरविन्द तिवारी
Mon, Oct 23, 2023
नई दिल्ली - मांँ दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। इस अष्टमी को महाष्टमी या दुर्गाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। इस अष्टमी तिथि के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि नवरात्रि के आठवें दिन आज महागौरी की आराधना , उपासना का विधान है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह पवित्र एवं अक्षय पुण्य का अधिकारी हो जाता है। दुर्गाष्टमी देवी दुर्गा की उपासना करने के सर्वश्रेष्ठ दिनों में से एक माना जाता है। महागौरी की पूजा देवी के मूल भाव को दर्शाता है। मां के नौ रूप और दस महाविद्यायें सभी आदिशक्ति के अंश और स्वरूप हैं , लेकिन भगवान शिव के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में महागौरी सदैव विराजमान रहती हैं। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है।इसलिये देवी दुर्गा के सभी भक्तों को इस दिन मांँ दुर्गा की उपासना करनी चाहिये। इनकी शक्ति अमोघ और फलदायी है। ज्योतिष में इनका सम्बन्ध शुक्र नामक ग्रह से माना जाता है , विवाह सम्बन्धी तमाम बाधाओं के निवारण में इनकी पूजा अचूक होती है। कहा जाता है कि मां महागौरी माता की पूजा करने से पापों से मुक्ति मिलती है और मन में विचारों की शुद्धता आती है। मां महागौरी हर प्रकार की नकारात्मकता को दूर करती हैं। जो व्यक्ति किन्हीं कारणों से नौ दिन तक उपवास नहीं रख पाते हैं उनके लिये नवरात्र में प्रतिपदा और अष्टमी तिथि को व्रत रखने का विधान है। इससे नौ दिन व्रत रखने के समान फल मिलता है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह पवित्र एवं अक्षय पुण्य का अधिकारी हो जाता है। इनका ध्यान , पूजन , आराधना भक्तों के लिये सर्वविध कल्याणकारी है इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धि की प्राप्ति होती है। अष्ट वर्षा भवेत् गौरी अर्थात इनकी आयु हमेशा आठ वर्ष की ही मानी गयी है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है इनके समस्त वस्त्र और आभूषण आदि भी श्वेत है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है। इनकी अस्त्र त्रिशूल है। इनका वाहन वृषभ है इसलिये इन्हें वृषारूढ़ा और श्वेत वस्त्र धारण की हुई महागौरी को श्वेताम्बरा भी कहा जाता है। महाअष्टमी के दिन इन्हीं की पूजा का विधान है। मांँ महागौरी की उपासना सफेद वस्त्र धारण कर करना चाहिये। मांँ को सफेद फूल , सफेद मिठाई अर्पित करना चाहिये। करूणामयी , स्नेहमयी , शांत तथा मृदुल स्वभाव की मां महागौरी की चार भुजायें हैं। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बायें हाथ में शिव का प्रतीक डमरू है। डमरू धारण करने के कारण इन्हें शिवा भी कहा जाता है। मां के नीचे वाला बायां हाथ अपने भक्तों को अभय देता हुआ वर-मुद्रा में हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है , इनकी आराधना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं, समस्त पापों का नाश होता है, सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है और हर मनोकामना पूर्ण होती है। अष्टमी तिथि को मां को नारियल का भोग लगाने की पंरपरा है। कन्यायें माँ दुर्गा का साक्षात स्वरूप होती हैं , इसलिये आज अष्टमी के दिन आठ कुँवारी कन्याओं के पूजन , भोजन कराने का विशेष महत्व है लेकिन कहीं कहीं कुँवारी भोजन नवमी के दिन भी कराया जाता है। कन्याओं की पूजा करके काले चने , हलुआ और पुड़ी से भोग लगाया जाता है। इस दिन कई लोग नवरात्रि व्रत का समापन भी करते हैं। अष्टमी और नवमी पर कन्याओं को घर बुलाकर उन्हें भोजन कराया जाता है। कन्या पूजन के साथ ही ध्यान रखें कि कन्याओं को भोजन कराते समय उनके साथ एक बालक को जरूर बैठाकर भोजन करायें। बालक को बटुक भैरव का प्रतीक माना जाता है। देवी मांँ के साथ भैरव की पूजा जाने की बेहद अहम मानी जाती है। कन्या की पूजा करने के बाद कुछ दक्षिणा भी दी जाती है। इस दिन महिलायें अपने सुहाग के लिये देवी माँ को चुनरी भेंटकर विधिपूर्वक पूजन करती है। माना जाता है कि माता सीता ने श्रीराम की प्राप्ति के लिये महागौरी की पूजा की थी।
— या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।
” श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।” दुर्गा महाष्टमी पर “महागौरीदेव्यै नम: या “महागौरी: श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।” मंत्र के साथ साथ “सर्व मंगल मांगल्ये , शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।। मन्त्र का जाप करना लाभदायक होता है।महागौरी की कथाश्रुतिस्मृति कथा पुराणों के अनुसार मां महागौरी , देवी पार्वती का एक रूप है। देवी पार्वती का जन्म राजा हिमालय के घर हुआ था। इनको अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का आभास हो गया था। तब मां ने पार्वती रूप में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिये कठोर तपस्या की थी तथा शिव जी को पति स्वरूप प्राप्त किया था। अपनी तपस्या के दौरान माता केवल कंदमूल , फल और पत्तों का आहार लेती थीं। बाद में माता ने केवल वायु पीकर तप करना आरंभ कर दिया। शिव जी की प्राप्ति के लिये कठोर तपस्या करते हुये मां गौरी का शरीर धूल मिट्टी से ढंककर मलिन यानि काला हो गया था। जब शिवजी ने गंगाजल से इनके शरीर को धोया तब गौरी जी का शरीर गौर व दैदीप्यमान हो गया तभी से ये देवी महागौरी के नाम से विख्यात हुईं। आज के दिन दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र का पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
: हिन्दू राष्ट्र निर्माण हेतु मंगला गौरी धाम में संगोष्ठी संपन्न
Fri, Oct 20, 2023
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टबिलासपुर - श्री मंगलागौरी मंदिर धाम शंकराचार्य आश्रम पोड़ी रतनपुर में आज आदित्यवाहिनी , आनन्दवाहिनी , पीठ परिषद् के पदाधिकारियो एवं सदस्यों की हिन्दू राष्ट्र निर्माण के संबंध में विशेष बैठक संपन्न हुई। इस बैठक में आनन्दवाहिनी के राष्ट्रीय संयोजिका एवं छत्तीसगढ़ प्रदेशाध्यक्ष श्रीमती सीमा तिवारी ने संगठन के विषय में गुरुदेव भगवान के तीन मुख्य बिन्दुओं पर कार्य करने का आग्रह किया। जिसमें चयन - प्रशिक्षण - नियोजन , प्रत्येक हिन्दू परिवार से प्रतिदिन एक रूपये अंशदान व एक घंटा श्रमदान जिसका उपयोग उस क्षेत्र को स्वावलंबी बनाने में करना है। और तीसरी साप्ताहिक हनुमान चालीसा सेवा प्रकल्प। इसी तरह आदित्यवाहिनी के प्रदेशध्यक्ष टीकाराम साहू ने हिन्दू राष्ट्र अभियान को गांव-गांव से जोड़ने एवं वहाँ सनातन धर्म के संरक्षणार्थ धार्मिक कार्य करने पर बल दिया। आदित्यवाहिनी के बिलासपुर अध्यक्ष रोशन अवस्थी ने बिलासपुर नगर के गुरू भाई - बहनों को मंगला गौरी शंकराचार्य आश्रम से जुड़ने का आग्रह किया। बैठक में प्रस्ताव जो पारित हुआ उसमें धर्मसंघ - पीठ परिषद् बिलासपुर के संयोजक रविन्द्र केशरवानी नेहरू नगर , संयोजक प्रशांत पाण्डेय भारतीय नगर बिलासपुर को नियुक्त किया गया। आनन्दवाहिनी बिलासपुर के नेहरू नगर परिक्षेत्र अध्यक्ष श्रीमती अनिता केशरवानी को नियुक्त किया गया।बैठक में आनन्दवाहिनी के संयोजक एवं श्रीसुदर्शन संस्थानम् शंकराचार्य आश्रम के प्रमुख श्रीमति सीमा तिवारी , आदित्यवाहिनी के प्रदेशाध्यक्ष टीकाराम साहू , प्रशांत पाण्डेय , जवाहर लाल पाण्डेय , रोशन अवस्थी , श्रीमति गीता तिवारी , पूर्णिमा दुबे , माधुरी शर्मा , अंजू शर्मा , गीता शर्मा , मीनाक्षी शर्मा , विनय दुबे , रंजीता शर्मा , बलराम मिश्रा , सनत पाण्डेय , कुलदेव बघेल सहित संगठन के कई सदस्य उपस्थित थे। उक्ताशय की जानकारी पीठ परिषद् के प्रांतीय प्रचार प्रसार सचिव रमेश शर्मा श्रीमंगला गौरी मंदिर धाम शंकराचार्य आश्रम ने दी।