: तेरह से पंद्रह अगस्त के बीच अपने घरों में राष्ट्रध्वज अवश्य फहरायें - पीएम मोदी
Fri, Jul 22, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टनई दिल्ली - भारत की स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ पर इस बार स्वतंत्रता दिवस का खास बनाने के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से हर घर तिरंगा मुहिम को सफल बनाने की अपील की है। हरेक नागरिक के दिल में देशभक्ति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री ने लोगों से अपील की कि वे 13 अगस्त से 15 अगस्त के बीच अपने-अपने घरों में राष्ट्रध्वज जरूर फहरायें। पीएम मोदी ने इसको लेकर ट्वीट पर लिखा है कि यह मुहिम तिरंगे के साथ हमारे जुड़ाव को गहरा करेगी। अनुमान लगाया जा रहा है कि इन तीन दिनों में देशभर के बीस करोड़ से अधिक घरों पर तिरंगा फहराया जायेगा। पीएम ने राष्ट्रध्वज फहराने की अपील करते हुये इतिहास से जुड़ी ऐसी ही कुछ रोचक जानकारियां भी शेयर की हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि 22 जुलाई 1947 को ही तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में अपनाया गया था।प्रधानमंत्री ने कहा कि हम आज उन सभी लोगों के साहस और प्रयासों को याद करते हैं , जिन्होंने उस समय स्वतंत्र भारत के लिये एक ध्वज का स्वप्न देखा था , जब हम औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ रहे थे। हम उनके सपने को पूरा करने और उनके सपनों के भारत का निर्माण करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि इस साल जब हम "आजादी का अमृत" महोत्सव मना रहे हैं , तो आईये ‘हर घर तिरंगा’ आंदोलन को मजबूत करें। अब 13 से 15 अगस्त के बीच अपने घरों में तिरंगा फहरायें या प्रदर्शित करें। यह मुहिम राष्ट्रध्वज के साथ अपने जुड़ाव को गहरा करेगी। मोदी ने तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में अपनाने संबंधी आधिकारिक संवाद की जानकारी भी ट्विटर पर साझा की। उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा फहराए गये पहले तिरंगे की तस्वीर भी ट्वीट करते हुये बताया कि ये पहला राष्ट्रध्वज नई दिल्ली में आर्मी बैटल ऑनर्स मेस के पास है।दरअसल सरकार ने भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर ‘हर घर तिरंगा’ मुहिम शुरू करने की योजना बनाई है। इस अभियान के तहत पुलिस बैंड की धुन बजाई जायेगी। छात्रों , एनसीसी कैडेटों और एनएसएस स्वयंसेवकों की प्रभात फेरियां भी निकलेंगी।
: राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने दिनेश गुणवर्धने को किया श्रीलंका का प्रधानमंत्री नियुक्त
Fri, Jul 22, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
कोलंबो (श्रीलंका) - श्रीलंका के वरिष्ठ राजनेता , संसद सदस्य , पूर्व कैबिनेट मंत्री और सांसद दिनेश गुणवर्धने को नवनिर्वाचित राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने देश का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। गुणवर्धने की नियुक्ति श्रीलंकाई सुरक्षा बलों द्वारा राष्ट्रपति भवन के पास डेरा डाले प्रदर्शनकारियों को हटाये जाने और कई लोगों की गिरफ्तारी के बाद हुई है। राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने कोलंबो के फ्लावर रोड स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में उन्हें पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई। गुणवर्धने अप्रैल में पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के कार्यकाल के दौरान गृहमंत्री बनाये गये थे। वे विदेश मंत्री और शिक्षा मंत्री के तौर पर भी अपनी सेवायें दे चुके हैं। वे विक्रमसिंघे के सहपाठी भी रहे हैं। चूंकि श्रीलंका भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि आवश्यक सामान व ईंधन आयात करने का भी पैसा नहीं है। ऐसे में राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की नई जोड़ी पर देश को इस मुसीबत से निकालकर पटरी पर लाने की अहम जिम्मेदारी है। विक्रमसिंघे ने देश के सामने आ रहे अभूतपूर्व आर्थिक संकट को दूर करने के लिये सभी राजनीतिक दलों से मिलकर काम करने का आह्वान किया है। पिछले सप्ताह देश में जबर्दस्त उपद्रव व विरोध प्रदर्शन के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति गोटबाया अपने परिवार के साथ देश छोड़कर भाग गये। इसके बाद संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को गोटबाया के शेष कार्यकाल के लिये राष्ट्रपति चुना है। विक्रमसिंघे छह बार देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। लेकिन राष्ट्रपति पद पर वे पहली बार आये हैं। वहीं विक्रमसिंघे के राष्ट्रपति बनने के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के वास्ते राहत सौदे के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ चल रही बातचीत को निरंतरता मिलेगी।बताते चलें देश के हालात आर्थिक तंगी से गुजर रहे है जहां पर देश की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि जनता सड़कों पर उतर आई और जमकर विरोध-प्रदर्शन किया। जिसे देखते हुये पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया देश छोड़ कर चले गये और उन्होने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। पीएम रानिल विक्रमसिंघे को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किया गया और फिर चुनाव में मिली जीत के बाद विक्रमसिंघे राष्ट्रपति बनें। हालांकि रानिल विक्रमसिंघे के राष्ट्रपति बनने के बाद भी श्रीलंका में शांति में बहाली नहीं हुई और उन्हें गोटबाया का मोहरा बताते हुये प्रदर्शनकारियों ने आंदोलन और तेज कर दिया। राष्ट्रपति सचिवालय के परिसर के बाहर प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिये सशस्त्र सैनिकों को तैनात किया गया था। प्रदर्शन को कंट्रोल करने के लिये सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों के टेंट उखाड़ना शुरू कर दिए तो वे उग्र हो उठे। सशस्त्र बलों की कार्रवाई के बीच प्रदर्शनकारियो ने कहा- हम अपने देश को ऐसी घटिया राजनीति से मुक्त बनाना चाहते हैं।
गौरतलब है कि सत्तारूढ़ श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना (एसएलपीपी) का एक घटक दल वामपंथी महाजन एकथ पेरामुना के नेता दिनेश गुणवर्धने का जन्म 02 मार्च 1949 में फिलिप गुणवर्धने और कुसुमा गुणवर्धने के घर हुआ। दिनेश उनके पिता फिलिप गुणवर्धने 'बोरालुगोडा के शेर' के रूप में जाने जाते थे, और स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक रहे। वे वर्ष 1948 में देश की आजादी से पहले ब्रिटिश काल में वामपंथी समाजवादी आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा थे। दिनेश की शुरुआती शिक्षा रॉयल प्राइमरी स्कूल कोलंबो और रॉयल कॉलेज कोलंबो में हुई। स्कूल के बाद उन्होंने नीदरलैंड स्कूल ऑफ बिजनेस (न्येनरोड बिजनेस यूनिवर्सिटी) में आगे की पढ़ाई की। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में डिप्लोमा के साथ ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वै ओरेगन विश्वविद्यालय में आगे की पढ़ाई के लिये चले गये। अमेरिका में रहते हुये वे छात्र आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुये। वियतनाम युद्ध विरोधी विरोध प्रदर्शनों में भी भाग लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद गुणावर्धने ने न्यूयॉर्क में काफी वक्त तक काम किया , लेकिन वर्ष 1972 में उनके पिता की मौत हो गई , इसलिये उन्हें कोलंबो लौटना पड़ा। उन्हें अगस्त 1973 में महाजन एकथ पेरामुना की केंद्रीय समिति में नियुक्त किया गया था। वे वर्ष 1974 में एमईपी के महासचिव बने। गुणवर्धने वर्ष 1977 के संसदीय चुनाव में एविसावेला में एमईपी के उम्मीद्वार थे , लेकिन निर्वाचित होने में असफल रहे। वे फिर से वर्ष 1983 के उपचुनाव में महारागामा इलेक्टोरल डिस्ट्रिक्ट में एमईपी के उम्मीद्वार थे। इस बार उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की और संसद में प्रवेश किया। गुणावर्धने ने वर्ष 1989 के संसदीय चुनाव में बहु-सदस्यीय कोलंबो चुनावी जिले में एमईपी के उम्मीद्वारों में से एक के रूप में सफलतापूर्वक चुनाव लड़ा। वर्ष 1994 के संसदीय चुनाव में वह फिर से कोलंबो जिले में एमईपी के उम्मीदवारों में से एक थे , लेकिन एमईपी संसद में कोई भी सीट जीतने में विफल रहा। फिर 27 अगस्त 2000 को एमईपी पीपुल्स अलायंस में शामिल हो गये। गुणावर्धने ने कोलंबो जिले में पीए के उम्मीद्वारों में से एक के रूप में 2000 का संसदीय चुनाव लड़ा जिसमें निर्वाचित होकर उन्होंने संसद में फिर से प्रवेश किया। उन्हें परिवहन मंत्री नियुक्त किया गया। सितंबर 2001 में पर्यावरण का अतिरिक्त विभाग दिया गया था। गुणवर्धने ने वर्ष 2004 के संसदीय चुनाव में कोलंबो जिले में यूपीएफए के उम्मीद्वारों में से एक के रूप में चुनाव लड़कर जीत हासिल की। चुनाव के बाद उन्हें शहरी विकास और जल आपूर्ति मंत्री और शिक्षा उप मंत्री नियुक्त किया गया। जून 2008 में उन्हें मुख्य सरकारी सचेतक भी नियुक्त किया गया था। वर्ष 2015 तक वे मंत्रिमंडल में वरिष्ठ पदों पर बने रहे। गुणवर्धने ने रमानी वत्सला कोटलावेला से शादी की। दंपति की दो संतानें हैं -बेटे का नाम यादामिनी जो सांसद है और बेटी का नाम संकपाली है। वर्ष 1980 के दशक के मध्य में रमानी की हेपेटाइटिस से मौत हो गई थी।कई विभाग का मंत्री पद सम्हाला
दिनेश गुणवर्धने पहले अक्टूबर 2018 से दिसंबर 2018 तक , दूसरी बार जनवरी 2020 से अगस्त 2020 तक और तीसरी बार अगस्त 2020 में सदन के नेता बने। इसके अलावा उन्होंने कई विभागों का मंत्री पद भी सम्हाला। जिनमें - परिवहन मंत्री (अक्टूबर 2000 - सितंबर 2021) , परिवहन और पर्यावरण मंत्री (सितंबर 2001 - दिसंबर 2001) , शहरी विकास और जल आपूर्ति मंत्री (अप्रैल 2004 - जनवरी 2007) , उप उच्च शिक्षा मंत्री (अप्रैल 2004 - नवंबर 2005) , शहरी विकास और पवित्र भूमि विकास मंत्री (जनवरी 2007 - अप्रैल 2010) , शहरी विकास और पवित्र भूमि विकास मंत्री, जल आपूर्ति मंत्री (अप्रैल 2010 - जनवरी 2015) , मेगापोलिस और पश्चिमी विकास मंत्री (नवंबर 2018 - दिसंबर 2018) , विदेश मामलों के मंत्री , कौशल विकास , रोजगार और श्रम (नवंबर 2019 - मार्च 2020) , विदेश मंत्री (अगस्त 2020 - अगस्त 2021) , शिक्षा मंत्री (अगस्त 2021 - अप्रैल 2022) , लोक प्रशासन , गृह मामलों , प्रांतीय परिषदों और स्थानीय सरकार के मंत्री (अप्रैल 2022- वर्तमान तक)।
: ब्रिटेन के बाद अब इटली के प्रधानमंत्री का भी इस्तीफा
Thu, Jul 21, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टरोम (इटली) - इटली में राजनीतिक अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री मारियो द्रागी ने राष्ट्रीय एकता गठबंधन सरकार टूटने के बाद आज अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने क्विरिनाले पैलेस में सुबह हुई एक बैठक के दौरान राष्ट्रपति सर्गियो मैत्तरेला को अपना इस्तीफा सौंपा। उन्होंने विश्वास मत में प्रमुख गठबंधन सहयोगियों के हिस्सा ना लेने के बाद पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफा देने से देश में जल्द चुनाव कराये जाने की संभावना पैदा हो गई है। इसके साथ ही इटली और यूरोप की राजनीति में एक अस्थिरता और अनिश्चितता का दौर शुरू हो चुका है।राष्ट्रपति मैत्तरेला के कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति ने इस्तीफे पर संज्ञान लेते हुये द्रागी सरकार को कार्यवाहक सरकार के तौर पर काम करने के लिये कहा है। द्रागी सरकार गुरुवार को उस समय बिखर गई जब दक्षिणपंथी , वामपंथी और पॉपुलिस्ट दलों के उनके गठबंधन सहयोगियों ने विधायिका को उसका कार्यकाल पूरा करने देने और कोरोना महामारी से उबरने हेतु यूरोपीय संघ द्वारा वित्त पोषित कार्यक्रम के लिये एक साथ आने की प्रधानमंत्री की अपील ठुकरा दी। दरअसल फाइव स्टार मूवमेंट में कहा गया था कि प्रधानमंत्री मारियो द्रागी महंगाई के मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रहे हैं और वे महंगाई कम करने में असफल रहे हैं। इसके बाद उनकी पार्टी ने विश्वास प्रस्ताव में शामिल होने का फैसला किया था। वहीं अन्य सहयोगी दलों ने भी कहा था कि अगर फाइव स्टार मूवमेंट वोटिंग में हिस्सा नहीं लेगी तो वे भी गठबंधन से बाहर हो जायेंगे। तीन पार्टियां- सिल्वियो बरलूस्कोनी फोरज़ा इटेलिया , मैतेओ साल्विनी एंटी इमिग्रेंट लीग और पॉपुलिस्ट फाइव स्टार मूवमेंट ने आज विश्वास मत में ये कहते हुये हिस्सा नहीं लिया कि अब सरकार में भरोसा नहीं लौटाया जा सकता। बता दें कि मारियो द्राघी यूरोप के सेंट्रल बैंक के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं और उन्हें वर्ष 2021 में राष्ट्राध्यक्ष का पद दिया गया था। कोरोना से जूझने के बाद पिछले 15 महीने में द्रागी ने इटली में स्थिरता लाने का बहुत प्रयास किया। कई मायनों में वे सफल भी रहे। वहीं रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के दौरान भी द्रागी की भूमिका अहम है। यूरोपीय यूनियन की तरफ से प्रतिबंध लगाने में उनकी बड़ी भूमिका थी।इटली में मौजूदा सरकार का कार्यकाल 2023 में समाप्त होना था , लेकिन अब राष्ट्रपति कभी भी समय से पहले चुनाव की घोषणा कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह भी चर्चा थी की मारियो द्रागी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन राष्ट्रपति ने इसे खारिज कर दिया था। मारियो पूर्व में यूरोपियन सेंट्रल बैंक के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार उनके इस्तीफे के कयास शुरू होने के बाद से ही उद्योगपतियों , मेयर और आम लोगों ने द्रागी को पत्र लिखकर पद पर बने रहने की मांग की थी।