: रानिल विक्रमसिंघे बने श्रीलंका के आठवें राष्ट्रपति
Thu, Jul 21, 2022
अरविन्द तिवारी रिपोर्टकोलंबो (श्रीलंका) -आर्थिक संकट , राजनीतिक उथल-पुथल और देश में फैले अराजकता के माहौल के बीच श्रीलंका की संसद में 44 साल में पहली बार आज सीधे राष्ट्रपति का चुनाव हुआ। मतदान के चलते कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में कार्यकारी राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के अलावा दुल्लास अलहप्परुमा और अनुरा कुमारा दिसानायके मैदान में थे। एक ओर जहां राष्ट्रपति के चुनाव के लिये संसद में वोटिंग हो रही थी। वहीं दूसरी ओर कोलंबो में राष्ट्रपति सचिवालय में कार्यवाहक राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के खिलाफ जनता का मौन विरोध प्रदर्शन चल रहा था। राष्ट्रपति के लिये हुये त्रिकोणीय मुकाबले में रानिल विक्रमसिंघे श्रीलंका के आठवें राष्ट्रपति चुने गये हैं। कुल 225 सदस्यीय सदन में रानिल विक्रमसिंघे को 134 सांसदों का समर्थन मिला है। उनके प्रतिद्वंदी दुल्लास अल्हाप्पेरुमा को 82 वोट ही मिले। राष्ट्रपति चुनाव में तीसरे उम्मीदवार अनुरा कुमारा दिसानायके को सिर्फ तीन वोट ही मिले। इससे पहले राष्ट्रपति पद की रेस में प्रमुख विपक्षी नेता सजित प्रेमदासा का नाम भी चर्चा में आ रहा था , लेकिन उन्होंने खुद ही उम्मीद्वार के तौर पर चुनाव से दूरी बनाने का ऐलान कर दिया था। बताते चलें बीते दिनों सियासी उथल-पुथल के बीच विक्रमसिंघे ने पीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। गोटबया राजपक्षे के देश छोड़कर भागने के बाद विक्रमसिंघे कार्यवाहक राष्ट्रपति की भूमिका निभा रहे थे। चुनाव जीतने के बाद नवनियुक्त राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने देश की जनता को संबोधित करते हुये कहा कि देश बहुत मुश्किल स्थिति में है , हमारे सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। वास्तव में यहां के हालात भी ऐसे हैं कि अब नये राष्ट्रपति के रूप में विक्रमसिंघे के सामने सबसे बड़ी चुनौती श्रीलंका को आर्थिक संकट से उबारने की होगी। अनाज से लेकर दूध-दवा तक की कमी से श्रीलंका जूझ रहा है। यहाँ हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि लोग सड़कों पर विरोध करते नजर आ रहे हैं। सरकारी दफ्तरों पर कब्जा कर रहे हैं। ऐसे में नये राष्ट्रपति के समक्ष कई बड़ी चुनौतियां हैं। विक्रमसिंघे के कंधों पर अब देश को अपूतपूर्व राजनीतिक एवं आर्थिक संकट से उबारने की जिम्मेदारी होगी। रानिल विक्रमसिंघे का कार्यकाल नवंबर 2024 में खत्म होगा , वे गोटबाया राजपक्षे के बचे हुये कार्यकाल को पूरा करेंगे।कौन हैं विक्रमसिंघेश्रीलंका की एक प्रभावी सिंहली परिवार में जन्में विक्रमसिंघे पेशे से एक वकील हैं। सिर्फ 28 साल की उम्र में उन्हें उप-विदेश मंत्री का पद दिया गया था। उनकी काम करने की क्षमता ने बहुत कम समय में कई नेताओं को प्रभावित किया था। पांच अक्टूबर 1977 को विक्रमसिंघे को कैबिनेट पद मिल गया और वो युवा मामलों के मंत्री बने। वर्ष 1980 की शुरुआत तक उनके पास ये पद रहा। विक्रमसिंघे राजनीति में आगे बढ़ते जा रहे थे। वर्ष 1993 में तत्कालीन राष्ट्रपति रानासिंघे प्रेमदासा को एक आत्मघाती हमले में लिट्टे आतंकियों ने मार दिया था। उनकी मौत के बाद प्रधानमंत्री डीबी विजीतुंगा को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया। इसके बाद 07 मई 1993 को विक्रमसिंघे को पहली बार देश का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था।रानिल विक्रमसिंघे को राजनीति का लंबा अनुभव है। वे श्रीलंका के छह बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। ये राजनीति में आने से पहले एक पत्रकार और वकील भी रह चुके हैं। विक्रमसिंघे इसके पहले दो बार राष्ट्रपति का चुनाव हार चुके हैं और अब वे देश के राष्ट्रपति बने हैं।गौरतलब है कि इडससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के विवादास्पद इस्तीफे के बाद खाली हुये पद पर रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनाया गया था। तब उन्होंने जोर देकर कहा था कि उनके नेतृत्व में श्रीलंका के संबंध भारत के साथ और बेहतर होंगे। हालांकि बिगड़ते हालात के बीच उन्हें इस पद से जल्द ही इस्तीफा देना पड़ा। प्रधानमंत्री के तौर पर वो भारत का चार बार दौरा कर चुके हैं। अक्टूबर 2016 , अप्रैल 2017 , नवंबर 2017 और अक्टूबर 2018 में वे भारत आये थे। उनके शासनकाल के दौरान ही पीएम मोदी ने भी दो बार श्रीलंका का दौरा किया था। उनकी सरकार में ही भारत ने श्रीलंका की 1990 अंबुलेन्स सिस्टम सेट अप करने में मदद की थी।
: राष्ट्रपति चुनाव के ठीक पहले श्रीलंका में आपातकाल लागू
Mon, Jul 18, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टकोलंबो (श्रीलंका) - राष्ट्रपति पद के लिये बीस जुलाई को होने वाले चुनाव से पहले आर्थिक संकट के बीच
श्रीलंका के कार्यवाहक राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने तत्काल प्रभाव से देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है। आदेश में कहा गया है कि आर्थिक संकट को देखते हुये कानून व्यवस्था व आवश्यक वस्तुओं की सुचारू आपूर्ति के लिये 18 जुलाई से आपातकाल लगाया जा रहा है।श्रीलंका में आपातकाल लागू करने वाला 17 जुलाई का सरकारी गजट 18 जुलाई सोमवार सुबह जारी किया गया। राष्ट्रपति को सार्वजनिक सुरक्षा अध्यादेश के भाग 2 (A) में आपातकालीन नियम लागू करने का अधिकार दिया गया है। इसमें कहा गया है कि अगर राष्ट्रपति को लगता है कि पुलिस स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है तो वह सशस्त्र बलों को पब्लिक ऑर्डर बनाये रखने के लिये आपातकाल को लेकर गैजेट जारी कर सकता है। इसका तात्पर्य है कि सुरक्षा बलों को छापे मारने , गिरफ्तार करने , जब्त करने , हथियार और विस्फोटकों को हटाने तथा किसी भी व्यक्ति के आवास में घुसने और तलाशी लेने का अधिकार है।श्रीलंका में आपातकाल का इतिहासवर्ष 1948 में ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद सबसे खराब आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। श्रीलंका में आपातकाल या इमर्जेंसी का लंबा इतिहास है। वर्ष 1948 में अंग्रेजों से आजादी के बाद और उससे पहले भी कई बार देश आपातकाल भोग चुका है। आजादी के बाद सबसे पहले वर्ष 1958 में देश में आपातकाल लगाया गया था तब सिंहली भाषा को एकमात्र भाषा के रूप में अपनाने के विरोध में हालात बिगड़ने पर आपातकाल लगा था। वहीं श्रीलंका में सबसे लंबा आपातकाल वर्ष 1983 से 2011 तक रहा। श्रीलंकाई तमिलों व सिंहलियों के बीच उग्र व हिंसक आंदोलन के कारण करीब 28 साल तक आपातकाल लगा रहा। तमिल समूह लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानि लिट्टे श्रीलंका में अलग तमिल राज्य की मांग कर रहा था। गृहयुद्ध के हालात के बीच यहां आपातकाल लागू रहा। इसके बाद वर्ष 2018 में भी तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने मार्च में देश के कुछ हिस्सों में मुस्लिम विरोधी हिंसा को रोकने के लिये आपातकाल की घोषणा की थी। इस हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई थी , जबकि आगजनी के कारण संपत्ति का भी नुकसान हुआ था। इस तरह से देखा जाये तो श्रीलंका ने करीब चार दशक की अवधि तक आपातकाल झेला है। बताते चलें देश में राजनीतिक संकट और जन विद्रोह के बीच गोटबाया राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था और उसके बाद से यह पद रिक्त है। बीस जुलाई को राष्ट्रपति पद का चुनाव होने वाला है जिसमें 225 सदस्यीय संसद के नये राष्ट्रपति का चुनाव करने की उम्मीद है।
: शिंदे सरकार ने उद्धव सरकार के नाम बदलाव के फैसले में किया परिवर्तन
Mon, Jul 18, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टमुम्बई - राज्य की नई शिंदे सरकार ने महाराष्ट्र में दो शहरों के नामों को बदलने अपनी मंजूरी दे दी है। इस बदलाव के बाद औरंगाबाद का नाम अब "छत्रपति संभलजीनगर" होगा और उस्मानाबाद का नाम "धाराशिव" कर दिया जायेगा। एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार ने औरंगाबाद और उस्मानाबाद शहरों के नाम बदलने को लेकर सहमति दे दी है। इन शहरों के नाम को बदलने का फैसला पूर्व महाविकास अघाड़ी सरकार ने ही लिया था जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने 29 जून को किया था।पिछले माह ठाकरे की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट मीटिंग के दौरान औरंगाबाद का नाम संभलजीनगर रखने का फैसला लिया गया था लेकिन शिंदे सरकार ने शनिवार को इस नाम के आगे छत्रपति जोड़ने का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि (ठाकरे की अध्यक्षता में हुई) 29 जून की मंत्रिमंडल की बैठक के कार्य विवरण को नई सरकार (शिंदे के नेतृत्व वाली) ने शनिवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी दे दी। बयान में कहा गया है कि मंत्रिमंडल द्वारा आज स्वीकृत ताजा प्रस्ताव केंद्र को भेजा जायेगा। जिसके बाद दोनों शहरों का नाम संभाग / जिला / तालुका / नगर निगम और परिषद स्तर पर बदला जायेगा।