: मां कुष्मांडा ने की थी ब्रह्माण्ड की संरचना – अरविन्द तिवारी
Fri, Oct 20, 2023
नई दिल्ली - इन दिनों चल रही नवरात्रि के दौरान हर दिन का अलग महत्व होता है और प्रतिदिन देवी के हर स्वरूप की पूजा होती है। आज इस नवरात्रि पावन पर्व के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा का विधान है —
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
नवरात्रि के चतुर्थ दिवस के बारे में बताते हुये अरविन्द तिवारी ने कहा कि आज के दिन कूष्मांडा देवी के स्वरूप की पूजा आराधना की जाती है। इस दिन साधक का मन “अनाहत” चक्र में अवस्थित होता है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था , सभी तरफ अंधेरा व्याप्त था तब इन्हीं देवी ने अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड की रचना की थी , यह सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति है। चेहरे पर हल्की मुस्कान लिये माता कुष्मांडा को सभी दुखों को हरने वाली माँ कहा जाता है। कुष्मांडा देवी योग और ध्यान की देवी है। देवी का यह स्वरूप अन्नपूर्णा का भी है। माता कुष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुआ का भोग लगाना चाहिये। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में हैं , वहां निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है , इनके तेज और प्रकाश से दशों दिशायें प्रकाशित हो रही है। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। इनकी आठ भुजायें हैं अतः इन्हें अष्टभुजी देवी के नाम से भी जाना जाता है। इनके सातों हाथों में कमंडल , धनुष , बाण , कमल , अमृतपूर्ण कलश ,चक्र , गदा एवं आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है। मां कुष्माण्डा के शरीर में कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है। इनके प्रकाश से ही दसों दिशायें उज्जवलित हैं। मां कुष्मांडा की उपासना मनुष्य को आधियों , व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख , समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। संस्कृत भाषा में कुष्मांडा को कुम्हड़ कहते हैं , बलियों में कुम्हड़े की बलि इसे सर्वाधिक प्रिय है इस कारण से भी मांँ कुष्मांडा कहलाती है। ज्योतिष में इनका संबंध बुध नामक ग्रह से है। इसकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग शोक दूर कर विद्या , बुद्धि , आयु , यश की प्राप्ति की जा सकती है। मान्यता के अनुसार हरे वस्त्र धारण करके माँ कुष्मांडा का पूजन करें। पूजा के दौरान मां को हरी इलाइची , सौंफ या कुम्हड़ा अर्पित करें। मां कूष्मांडा को गुड़हल का फूल या लाल फूल बहुत प्रिय है , इसलिये उनकी पूजा में गुड़हल का फूल अर्पित करें। वैसे तो मां कूष्मांडा को मालपुये का भोग अतिप्रिय है। लेकिन भक्तों के पास जो होता है मां उस भोग को भी सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं। इसके बाद उनके मुख्य मंत्र “ॐ कूष्मांडा देव्यै नमः” का 108 बार जाप करें , चाहें तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें। इनकी उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं , उन्हें दुर्गा पूजा के चौथे दिन माता कूष्मांडा की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिये। इनकी पूजा करने से आयु , यश , बल और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। मां कुष्मांडा की विधि विधान से पूजा करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिये आज चतुर्थ दिवस निम्न मंत्र का जाप करना चाहिये –
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थात् — हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।
: ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी है मां कात्यायनी – अरविन्द तिवारी
Fri, Oct 20, 2023
नई दिल्ली - चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥
– नवरात्रि के छठवें दिन आज माँ दुर्गा के छठवें स्वरूप कात्यायनी की पूजा आराधना की जाती है। माँ को जो सच्चे मन से याद करता है उसके रोग , शोक , संताप , भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं।जन्म-जन्मांतर के पापों को विनष्ट करने के लिये माँ की शरणागत होकर उनकी पूजा-उपासना के लिये तत्पर होना चाहिये। नवरात्रि के छठवें दिवस के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि माँ की उत्पत्ति या प्राकट्य के बारे में वामन और स्कंदपुराण में अलग-अलग बातें बतायी गयी हैं। माँ पार्वती का जन्म महिषासुर का वध करने के लिये ऋषि कत्य के घर में हुआ था इसलिये यह देवी कात्यायनी कहलायी। इनकी पूजा आराधना करने से अद्भुत शक्ति का संचार होता है और दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती है। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भव्य है , तेजोमयी छवि भक्तों के हृदयों को सुख और शांति प्रदान करती है। इनका अस्त्र कमल व तलवार है। आज के दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में अवस्थित होता है। यह वृहस्पति ग्रह का संचालन करती है। इनकी चार भुजायें हैं दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मांँ के बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है। इनका स्वरूप भव्य एवं दिव्य है और ये स्वर्ण के समान चमकीली है। ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रुप में पाने के लिये कालिंदी यमुना के तट पर इन्हीं की पूजा अर्चना की थी इसलिये ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी प्रतिष्ठित है। मान्यता है कि मां कात्यायनी की पूजा करने से शादी में आ रही बाधा दूर होती है। जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा है उन्हें आज के दिन हल्दी की गाँठ चढ़ाकर माँ कात्यायनी की पूजा अवश्य करनी चाहिये। इससे भगवान वृहस्पति प्रसन्न होकर विवाह का योग बनाते हैं और इससे उन्हें मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।
” कात्यायनी महामाये , महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवी , पति मे कुरु ते नम:।।
इसके अलावा सर्वसाधारण के लिये निम्न श्लोक भी सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बा की भक्ति पाने के लिये आज इसका जाप करना चाहिये –
– या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थात् हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और शक्तिरूपिणी प्रसिद्ध अम्बे , आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है। माँ कात्यायनी का पसंदीदा रंग लाल है और इन्हें शहद का भोग बेहद पसंद है। इन्हें पीला फूल और पीले रंग का नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। इनकी उपासना और आराधना से रोग , शोक , संताप , भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं एवं भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ , धर्म , काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग , शोक , संताप और भय के अलावा जन्म जन्मांतर के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। नवरात्रि के छठवें दिन यानि आज दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिये। माँ कात्यायनी की पूजा करते समय “ॐ ऐं ह्रीं क्लीम चामुण्डायै विच्चै” अथवा “ॐ कात्यायनी देव्यै नमः” मंत्रों का उच्चारण करना चाहिये। नवरात्रि के छठवें दिन प्रसाद में मधु यानि शहद का प्रयोग करना चाहिये। देवी मां को प्रसन्न करने के लिये गुड़ का दान करना चाहिये और नारंगी रंग के कपड़ें पहनने चाहिये। मां कात्यायनी के विधिपूर्वक आराधना करने से कार्यक्षेत्र में सफलता मिलती है व मार्ग में आने वाली कठिनाईयों पर विजय प्राप्त होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता कात्यायनी की उपासना से भक्त को अपने आप आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां मिल जाती हैं. साथ ही वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।कौन है मां कात्यायनी ?कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे , उनके पुत्र ऋषि कात्य हुये। इसी कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुये। इन्होंने कई वर्षों तक भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या के साथ उपासना की। उनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री रूप में जन्म ले। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। उनकी इच्छानुसार मां भगवती ने आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसी कारण से ही इन्हें कात्यायनी कहा जाता है। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार धरती पर बढ़ गया , तब भगवान ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनों ने अपने -अपने अंश का तेज देकर महिषासुर के विनाश के लिये एक देवी को उत्पन्न किया। मां कात्यायनी ने ही अत्याचारी राक्षस महिषाषुर का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया था। महिषासुर का वध करने वाली देवी मां कात्यायनी को महिषासुर मर्दनी के नाम से भी पुकारते हैं।
: दैत्यों के संहार हेतु प्रगटी मां चंद्रघंटा – अरविन्द तिवारी
Tue, Oct 17, 2023
नई दिल्ली – दैत्यों के संहार एवं धर्म की रक्षा और संसार से अंधकार मिटाने के लिये माँ दुर्गा अपनी तीसरी शक्ति चंद्रघंटा के रूप में प्रकट हुई , दुर्गा मांँ की तीसरी शक्ति का नाम ही चंद्रघंटा है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि आज नवरात्रि के तीसरे दिन इसी देवी की पूजा आराधना की जाती है। इसका शस्त्र कमल है और सवारी सिंह है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है इसका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिये कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र होने के कारण इसे चंद्रघंटा कहा गया है। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है इनके आठ हाथों में खड्ग , कमल , धनुष , बाण , तलवार , त्रिशूल , गदा आदि विभिन्न प्रकार के शस्त्र सुशोभित रहते हैं और दो हाथों से मां अपने भक्तों को चिरायु , आरोग्य और सुख संपदा का आशीर्वाद देती हैं। इनका यह स्वरूप परम शक्तिदायी और तेजपूर्ण है। इनके कंठ में श्वेत पुष्प की माला और शीर्ष पर रत्नजड़ित मुकुट विराजमान है। इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है। तीसरे दिन देवी की उपासना आराधना भयमुक्ति और साहस की ओर ले जाता है। मांँ तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती है और ज्योतिष में इनका संबंध मंगल ग्रह से है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिये उद्यत रहने की होती है। मन कर्म और वचन के साथ समर्पणता से विधि विधान के अनुसार परिशुद्ध पवित्र होकर चंद्रघंटा देवी की उपासना आराधना करने से मनुष्य सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद का अधिकारी बन सकता है। इनकी कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधायें विनष्ट हो जाती हैं।इनकी आराधना फलदायी है। इनके उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिये इस घंटे की ध्वनि निनादित ह़ो उठती है। इनकी आराधना से संसार में यश , कीर्ति एवं सम्मान प्राप्त होता है। मां चंद्रघंटा की पूजा लाल वस्त्र धारण करके करना श्रेष्ठ होता है। मां को लाल पुष्प , रक्त चन्दन और लाल चुनरी समर्पित करना उत्तम होता है। हर देवी के हर स्वरूप की पूजा में एक अलग प्रकार का भोग चढ़ाया जाता है। कहते हैं भोग देवी मां के प्रति आपके समर्पण का भाव दर्शाता है। मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई या लाल सेव का भोग लगाना चाहिये। जब आप मां को भोग चढ़ायें और मंत्रों का जाप करें तो घंटी जरूर बजायें। मान्यता है कि मां चंद्रघंटा के घंटे की ध्वनि से अत्याचारी , दानव , दैत्य डरते हैं। धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि मां चंद्रघंटा की उपासना से भक्तों में वीरता और निर्भीकता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। इनकी उपासना साधक को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति प्रदान करती है। कहा जाता है कि माता चंद्रघंटा की साधना कर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले उपासक को संसार में यश, कीर्ति, सम्मान और मोक्ष मिलता है।चंद्रघंटा देवी के मंत्र –देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।
— प्रचण्ड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि तुम्हारी जय हो! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो , माँ दुर्गा के तृतीय रूप चंद्रघण्टा को बारंबार प्रणाम है।
या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थात् हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ ! मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।मां चंद्रघंटा की कथा –पौराणिक काल में एक बार देव-असुर संग्राम बहुत लम्बे समय तक चला। उस समय असुरों का स्वामी और सेनापति महिषासुर था। महिषासुर ने इंद्र आदि देवताओं को पराजित कर स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा कर स्वर्ग का राजा बन गया। युद्ध में हारने के बाद सभी देवता इस समस्या के निदान के लिये त्रिदेवों के पास गये। देवताओं ने भगवन विष्णु , महादेव और ब्रह्मा जी को बताया कि महिषासुर ने इंद्र , चंद्र , सूर्य , वायु और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिये हैं और उन्हे बंदी बनाकर स्वर्ग लोक पर कब्जा कर लिया है। देवताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्याचार के कारण देवताओं को धरती पर निवास करना पड़ रहा है। देवताओं की बात सुनकर त्रिदेवों को अत्याधिक क्रोध आ गया और उनके मुख से ऊर्जा उत्पन्न होने लगी। इसके बाद यह ऊर्जा दशों दिशाओं में जाकर फैल गई , उसी समय वहां पर एक देवी चंद्रघंटा ने अवतार लिया। भगवान शिव ने देवी को त्रिशुल , विष्णु जी ने चक्र दिया। इसी तरह अन्य देवताओं ने भी मां चंद्रघंटा को अस्त्र शस्त्र प्रदान किये। इंद्र ने मां को अपना वज्र और घंटा प्रदान किया , भगवान सूर्य ने मां को तेज और तलवार दिये। इसके बाद मां चंद्रघंटा को सवारी के लिये शेर भी दिय गया। मां अपने अस्त्र शस्त्र लेकर महिषासुर से युद्ध करने के लिये निकल पड़ीं। मां चंद्रघंटा का रूप इतना विशालकाय था कि उनके इस स्वरूप को देखकर महिषासुर अत्यंत ही डर गया। उन्होंने अपने असुरों को मां चंद्रघंटा पर आक्रमण करने के लिये कहा। सभी राक्षस युद्ध करने के लिये मैदान में उतर गये। मां चंद्रघंटा ने महिषासुर के सभी बड़े राक्षसों को मारकर अंत में महिषासुर का भी अंत कर दिया। इस तरह मां चंद्रघंटा ने देवताओं की रक्षा की और उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति करायी।