: सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति है मां कुष्मांडा - अरविन्द तिवारी
Fri, Sep 30, 2022
नई दिल्ली - इन दिनों चल रही नवरात्रि के दौरान हर दिन का अलग महत्व होता है और प्रतिदिन देवी के हर स्वरूप की पूजा होती है। आज इस नवरात्रि पावन पर्व के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा का विधान है-
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।। अर्थात अमृत से परिपूरित कलश को धारण करने वाली और कमलपुष्प से युक्त तेजोमय मां कूष्मांडा हमें सब कार्यों में शुभदायी सिद्ध हो। नवरात्रि के चतुर्थ दिवस के बारे में बताते हुये अरविन्द तिवारी ने कहा कि आज के दिन कूष्मांडा देवी के स्वरूप की पूजा आराधना की जाती है। इस दिन साधक का मन “अनाहत” चक्र में अवस्थित होता है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था , सभी तरफ अंधेरा व्याप्त था तब इन्हीं देवी ने अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड की रचना की थी , यह सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति है। चेहरे पर हल्की मुस्कान लिये माता कुष्मांडा को सभी दुखों को हरने वाली माँ कहा जाता है। कुष्मांडा देवी योग और ध्यान की देवी है। देवी का यह स्वरूप अन्नपूर्णा का भी है। माता कुष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुआ का भोग लगाना चाहिये। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में हैं , वहां निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है , इनके तेज और प्रकाश से दशों दिशायें प्रकाशित हो रही है। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। इनकी आठ भुजायें हैं अतः इन्हें अष्टभुजी देवी के नाम से भी जाना जाता है। इनके सातों हाथों में कमंडल , धनुष , बाण , कमल , अमृतपूर्ण कलश ,चक्र , गदा एवं आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है। मां कुष्माण्डा के शरीर में कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है। इनके प्रकाश से ही दसों दिशायें उज्जवलित हैं। मां कुष्मांडा की उपासना मनुष्य को आधियों , व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख , समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। संस्कृत भाषा में कुष्मांडा को कुम्हड़ कहते हैं , बलियों में कुम्हड़े की बलि इसे सर्वाधिक प्रिय है इस कारण से भी मांँ कुष्मांडा कहलाती है। ज्योतिष में इनका संबंध बुध नामक ग्रह से है। इसकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग शोक दूर कर विद्या , बुद्धि , आयु , यश की प्राप्ति की जा सकती है। मान्यता के अनुसार हरे वस्त्र धारण करके माँ कुष्मांडा का पूजन करें। पूजा के दौरान मां को हरी इलाइची , सौंफ या कुम्हड़ा अर्पित करें। मां कूष्मांडा को गुड़हल का फूल या लाल फूल बहुत प्रिय है , इसलिये उनकी पूजा में गुड़हल का फूल अर्पित करें। वैसे तो मां कूष्मांडा को मालपुये का भोग अतिप्रिय है। लेकिन भक्तों के पास जो होता है मां उस भोग को भी सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं। इसके बाद उनके मुख्य मंत्र “ॐ कूष्मांडा देव्यै नमः” का 108 बार जाप करें , चाहें तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें। इनकी उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं , उन्हें दुर्गा पूजा के चौथे दिन माता कूष्मांडा की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिये। इनकी पूजा करने से आयु , यश , बल और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। मां कुष्मांडा की विधि विधान से पूजा करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। नवरात्रि में मांँ को पान के पत्ते पर रखकर गुलाब की पंखुड़ियां अर्पित करने से फंँसा हुआ या रुका हुआ धन प्राप्त होता है।
माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिये आज चतुर्थ दिवस निम्न मंत्र का जाप करना चाहिये –
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थात् — हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।
: रामनगरी को मिली लता मंगेश्कर चौक की सौगात
Wed, Sep 28, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
अयोध्या - भारत रत्न से सम्मानित सुर कोकिला लता मंगेश्कर के 93 वें जन्मदिवस के अवसर पर आज सरयू तट के किनारे नया घाट क्षेत्र में स्थित लता मंगेशकर चौक का उद्घाटन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय पर्यटन मंत्री किशन रेड्डी ने संयुक्त रूप से किया। वीणा का डिजाइन तैयार करने वाले रामसुतार , लता के भतीजा आदिनाथ मंगेश्कर और बहु कृष्णा मंगेश्कर सहित कई नेता भी लता मंगेशकर चौक के लोकार्पण समारोह में पहुंचे। सीएम योगी ने संस्कृति विभाग की ओर से प्रकाशित ग्लोबल साइक्लोपीडिया आफ रामायण के दस पुस्तकों व अयोध्या विशेषांक का विमोचन भी किया। इसके पहले सीएम ने लता के चित्रपट पर दीप प्रज्जवलित कर पुष्पांजलि अर्पित की। वहीं अयोध्या के संतों ने कहा कि लता मंगेशकर भारत रत्न हैं। उन्होंने भगवान श्रीराम के बहुत भजन गाये हैं , उसके लिये हम सभी संत आये हुये हैं। लता मंगेशकर चौक के विरोध पर संतों ने कहा कि इस चौक का कोई विरोध नहीं है। बता दें कि कुछ खबरें आई थीं कि इसका साधु-संत विरोध कर रहे हैं।
गौरतलब है कि सरयू नदी के तट पर स्थित नया घाट क्षेत्र को 7.9 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट से लता मंगेशकर चौक विकसित किया गया है। इस चौक का मुख्य आकर्षण ये है कि यहां कांसा एवं स्टेनलेस स्टील से निर्मित भारतीय संगीत वाद्ययंत्र 'वीणा' स्थापित किया गया है। वीणा पर मां लक्ष्मी व सरस्वती और मोर के चित्र के साथ साथ अन्य शास्त्रीय वाद्ययंत्र भी प्रदर्शित हैं। इसकी लंबाई की बात करें तो ये 10.8 मीटर , जिसकी वजन 14 टन है और ऊंचाई 12 मीटर है। इसमें 92 कमल मकराना मार्बल के लगाये गये हैं , कमल की संख्या लता के आयु को प्रदर्शित कर रहे हैं। आठ पंखुडियों वाले कमल के बीच में एलईडी लाइट लगी है , जिससे रात में इनका दृश्य मनोरम दिख रहा है। इसका डिजाइन रामसुतार फाइन आर्ट लिमिटेड कंपनी द्वारा तैयार किया गया है और इसे नोएडा से अयोध्या पहुंचने में तीन दिन लगे थे। इस जगह का पर्यटक और संगीत प्रेमी आकर आनंद ले सकते हैं। ये देश की ऐसी पहली जगह होगी , जहां अमर सुरीली आवाजों को मंदिर शहर से जोड़ने के लिये इतना विशाल संगीत वाद्ययंत्र स्थापित किया गया है। इस चौराहे पर लाईट और साउंड का ऐसा समन्वय होगा कि यहां से लता द्वारा गाये श्रीराम के भजन और वीणा की मधुर ध्वनि लोगों को लगातार सुनाई देते रहेंगे। इस 'वीणा' को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित राम सुतार ने बनाया है , जिसे सम्मानित भी किया गया। लता मंगेश्कर के निधन के बाद सीएम योगी ने खुद उनके नाम पर चौक का ऐलान किया था। राम कथा पार्क में लता के जीवन पर आधारित 36 तस्वीरों की प्रदर्शनी का अवलोकन सीएम सहित कार्यक्रम में आये सभी लोगों ने किया। यये सभी तस्वीरों को फिल्म अभिलेखागार और मंगेशकर परिवार और पीएम कार्यालय ने उपलब्ध कराया है। इस दौरान लता मंगेशकर चौक के निर्माण से लेकर एक लघु फ़िल्म दिखाई गई। लता द्वारा गाये श्रीराम के तीन प्रमुख गीतों को सुनकर लोग भावभिभोर दिखे।प्रेरणास्थली की तरह कार्य करेगा लता चौक - पीएमरामकथा पार्क में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रिकार्डेड विशेष वीडियो प्रसारित किया गया। प्रधानमंत्री ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि मुझे याद है , जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिये भूमिपूजन संपन्न हुआ था , उसके बाद मेरे पास लता दीदी का फोन आया था। वो इससे बहुत खुश और आनंद में थी। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आखिरकार प्रभु श्रीराम के मंदिर का निर्माण शुरू हो रहा है। पीएम ने आगे कहा कि लता दीदी के साथ मेरी कितनी ही यादें जुड़ी हैं। कितनी ही भावुक और स्नेहिल स्मृतियां हैं। जब भी कभी मेरी उनसे बात होती थी, उनकी वाणी की युग-परिचित मिठास हर बार मुझे मंत्र-मुग्ध कर देती थी। वे मां सरस्वती की ऐसी ही साधिका थीं, जिन्होंने अपने दिव्य स्वर से पूरे विश्व को अभिभूत कर दिया। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि लता दीदी के नाम पर बना ये चौक हमारे देश में कला जगत से जुड़े लोगों के लियै एक प्रेरणा स्थली की तरह कार्य करेगा। ये उनको बतायेगा कि भारत की जड़ों से जुड़े रहकर और आधुनिकता की ओर बढ़ते हुये भारत की कला और संस्कृति को दुनियां के कोने-कोने तक पहुंचाना, ये भी हमारा कर्तव्य है।
: दैत्यों के संहार हेतु प्रगटी मां चंद्रघंटा – अरविन्द तिवारी
Wed, Sep 28, 2022
नई दिल्ली - दैत्यों के संहार एवं धर्म की रक्षा और संसार से अंधकार मिटाने के लिये माँ दुर्गा अपनी तीसरी शक्ति चंद्रघंटा के रूप में प्रकट हुई। दुर्गा मांँ की तीसरी शक्ति का नाम ही चंद्रघंटा है। आज नवरात्रि के तीसरे दिन इसी देवी की पूजा आराधना की जाती है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि इसका शस्त्र कमल है और सवारी सिंह है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिये कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र होने के कारण इसे चंद्रघंटा कहा गया है । इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है इनके दसों हाथों में खड्ग , बाण आदि विभिन्न प्रकार के शस्त्र सुशोभित रहते हैं। इनका यह स्वरूप परम शक्तिदायी और तेजपूर्ण है। तीसरे दिन देवी की उपासना आराधना भयमुक्ति और साहस की ओर ले जाता है। मांँ तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती है और ज्योतिष में इनका संबंध मंगल ग्रह से है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिये उद्यत रहने की होती है। मन कर्म और वचन के साथ समर्पणता से विधि विधान के अनुसार परिशुद्ध पवित्र होकर चंद्रघंटा देवी की उपासना आराधना करने से मनुष्य सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद का अधिकारी बन सकता है। इनकी कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधायें विनष्ट हो जाती हैं।इनकी आराधना फलदायी है। इनके उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है।इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिये इस घंटे की ध्वनि निनादित ह़ उठती है। इनकी आराधना से संसार में यश , कीर्ति एवं सम्मान प्राप्त होता है। इनको लाल रंग का फूल और लाल सेव चढ़ायें।चंद्रघंटा देवी के मंत्र —देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।
— प्रचण्ड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि तुम्हारी जय हो! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो, अर्थात् माँ दुर्गा के तृतीय रूप चंद्रघण्टा को बारंबार प्रणाम है।
या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थात् हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।मां चंद्रघंटा की कथा –पौराणिक काल में एक बार देव-असुर संग्राम बहुत लम्बे समय तक चला। उस समय असुरों का स्वामी और सेनापति महिषासुर था। महिषासुर ने इंद्र आदि देवताओं को पराजित कर स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा कर स्वर्ग का राजा बन गया। युद्ध में हारने के बाद सभी देवता इस समस्या के निदान के लिये त्रिदेवों के पास गये। देवताओं ने भगवन विष्णु , महादेव और ब्रह्मा जी को बताया कि महिषासुर ने इंद्र , चंद्र , सूर्य , वायु और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिये हैं और उन्हे बंदी बनाकर स्वर्ग लोक पर कब्जा कर लिया है। देवताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्याचार के कारण देवताओं को धरती पर निवास करना पड़ रहा है। देवताओं की बात सुनकर त्रिदेवों को अत्याधिक क्रोध आ गया और उनके मुख से ऊर्जा उत्पन्न होने लगी। इसके बाद यह ऊर्जा दशों दिशाओं में जाकर फैल गई , उसी समय वहां पर एक देवी चंद्रघंटा ने अवतार लिया। भगवान शिव ने देवी को त्रिशुल , विष्णु जी ने चक्र दिया। इसी तरह अन्य देवताओं ने भी मां चंद्रघंटा को अस्त्र शस्त्र प्रदान किये। इंद्र ने मां को अपना वज्र और घंटा प्रदान किया , भगवान सूर्य ने मां को तेज और तलवार दिये। इसके बाद मां चंद्रघंटा को सवारी के लिये शेर भी दिय गया। मां अपने अस्त्र शस्त्र लेकर महिषासुर से युद्ध करने के लिये निकल पड़ीं। मां चंद्रघंटा का रूप इतना विशालकाय था कि उनके इस स्वरूप को देखकर महिषासुर अत्यंत ही डर गया। उन्होंने अपने असुरों को मां चंद्रघंटा पर आक्रमण करने के लिये कहा। सभी राक्षस युद्ध करने के लिये मैदान में उतर गये। मां चंद्रघंटा ने महिषासुर के सभी बड़े राक्षसों को मारकर अंत में महिषासुर का भी अंत कर दिया। इस तरह मां चंद्रघंटा ने देवताओं की रक्षा की और उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति करायी।