: मोक्ष प्रदात्री है इंदिरा एकादशी – अरविन्द तिवारी
Wed, Sep 21, 2022
रायपुर — हिंदू धर्म में सभी व्रतों में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इंदिरा एकादशी के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मोक्ष देने वाली इंदिरा एकादशी कहते हैं , जो आज है। इंदिरा एकादशी को श्राद्ध एकादशी के नाम से भी जानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी को पितरों को मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी माना गया है।इंदिरा एकादशी के दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु का पूजन शालिग्राम के रूप में करने से पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। व्रत के समापन पर व्रत का पुण्य अपने पितरों को अर्पित कर देना चाहिये। कहते हैं जिन पितरों को किन्हीं कारणों से यमराज का दंड भोगना पड़ता है, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह यमलोक की यात्रा पूरी कर स्वर्ग को प्रस्थान करते हैं। इंदिरा एकादशी के दिन पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलायें। ऐसा करने से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। इसके साथ आप इस भगवान विष्णु के सहस्त्रनाम का पाठ जरूर करें। इससे सभी नकारात्मक ऊर्जायें खत्म हो जाती हैं और खुशियों का मार्ग खुल जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि आप किसी वजह से पितृ पक्ष में पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान ना कर पाये हों, तो इंदिरा एकादशी का व्रत व पूजन जरूर करें क्योंकि इंदिरा एकादशी का व्रत पूर्वजों को श्राद्ध के समान फल देता है तथा इससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। कहते हैं कि एक बार धर्मराज युधिष्ठिर को भगवान श्री कृष्ण ने इंदिरा एकादशी के बारे में विस्तार से बताया था। उन्होंने कहा कि वैसे तो सभी एकादशी का महत्व है किंतु पितरों की दृष्टि से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी का विशेष महत्व है। यह एकादशी पितरों को अधोगति से मुक्त देने वाली तथा सभी पापों को नष्ट करने वाली है। राजा इंद्रसेन ने भी अपने पिता को मोक्ष दिलाने के लिये पितृपक्ष में पड़ने वाली एकादशी का व्रत रखा था और तभी से राजा के नाम पर ही इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी पड़ गया। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। ऐसे में इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है और पूजा के समय इंदिरा एकादशी व्रत की कथा श्रवण करते हैं। वैसे तो सभी को एकादशी का व्रत रखना चाहिये लेकिन जिनके माता-पिता का निधन हो चुका है , उन्हें पितृपक्ष में पढ़ने वाली इंदिरा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिये। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत सभी घरों में करना चाहिये। जो भी व्यक्ति इंदिरा एकादशी का व्रत रखता है और उस व्रत पुण्य को अपने पितरों को समर्पित कर देता है , तो इससे उसके पितरों को लाभ होता है। सात पीढ़ियों तक के जो पितर यमलोक में यमराज का दंड भोग रहे होते हैं , उनको इंदिरा एकादशी व्रत के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ऐसा करने से आपके पितर नरक लोक के कष्ट से मुक्त होकर जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और उनको श्रीहरि विष्णु के चरणों में स्थान मिलता है। इससे प्रसन्न होकर पितर सुख , समृद्धि , वंश वृद्धि , उन्नति आदि का आशीष देते हैं और मृत्यु के बाद व्रती भी बैकुंठ में निवास करता है।
इंदिरा एकादशी व्रत कथासतयुग में महिष्मति नाम की नगरी में परम विष्णु भक्त और धर्मपरायण राजा इंद्रसेन राज करते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे और उनकी प्रजा सुख चैन से रहती थी। एक दिन नारद जी इंद्रसेन के दरबार में जाते हैं। नारद जी कहते हैं मैं तुम्हारे पिता का संदेश लेकर आया हूं जो इस समय पूर्व जन्म में एकादशी का व्रत भंग होने के कारण यमराज के निकट दंड भोग रहे हैं। नारदजी के मुख से इंद्रसेन अपने पिता की पीड़ा को सुनकर व्यथित हो गये और पिता के मोक्ष का उपाय पूछने लगे। तब नारद ने कहा कि राजन तुम कृष्ण पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो और इस व्रत के पुण्य को अपने पिता के नाम दान कर दो , इससे तुम्हारे पिता को मुक्ति मिल जायेगी। नारद जी की ये बात सुनकर राजा ने उनसे व्रत का विधान पूछा और व्रत करने का संकल्प लिया। राजा ने पितृपक्ष की एकादशी पर विधि-पूर्वक व्रत किया , पितरों के निमित्त मौन रह कर ब्राह्मण भोज और गौ दान किया। इस प्रकार राजा इंद्रसेन के व्रत और पूजन करने से उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिलने के साथ साथ बैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई। उस दिन से इस व्रत का नाम इंदिरी एकादशी पड़ गया।
: श्री सप्तदेव मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव धूमधाम से सम्पन्न प्रतिभागियों को मिले पुरस्कार
Sat, Aug 20, 2022
श्री सप्तदेव मंदिर कोरबा में दिनॉक 19 अगस्त 2022 दिन शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव धूमधाम से मनायी गयी। इस दिन मंदिर प्रांगण में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित झांकियों का प्रदर्शन किया गया जिसमेें श्रीकृष्ण जी का कारावास में जन्म, श्री वासुदेव जी द्वारा कृष्ण जी को नदी पार कराना, श्रीकृष्ण द्वारा वकासुर का वध, श्रीकृष्ण जी द्वारा कालियॉं नाग का वध, श्रीकृष्ण जी द्वारा पर्वत को अपनी ऊगंली पर उठाना, श्रीराम सेतु का पत्थर के साथ साथ अन्य झांकियां लगाई गई है जिसे देखने मंदिर में प्रातः से ही भक्तगणों का तांता लगा हुआ था।इस दिन प्रातः से ही मंदिर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये गये इसमे बच्चोें के लिये श्रीकृष्ण बनो प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें 0 से 2 वर्ष, 2 से 5 वर्ष एवं 5 से 10 वर्ष तक के बच्चों के लिये शिशु कृष्ण, बाल कृष्ण एवं राधा कृष्ण बनो प्रतियोगिता की गई जिसमें प्रथम पुरस्कार काशी अग्रवाल, सिद्वित अग्रवाल, जीविका एवं आद्या अग्रवाल को द्वितीय पुरस्कार.अयन मोदी, आस्था टमकोरिया, दिव्यांश एवं प्रिंस अग्रवाल, तृतीय पुरस्कार मिश्का अग्रवाल. शिवाय अग्रवाल, मन्नत एवं चेरी अग्रवाल को दिया गया एवं अन्य प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार दिया गया एवं सभी को सर्टिफिकेट प्रदान किया गया।इसी प्रकार जन्माष्टमी के पूर्व दिवस अर्थात 18 अगस्त को श्री लडडू गोपाल सजाओ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें प्रथम द्वितीय पुरस्कार एवं तृतीय पुरस्कार दिया गया एवं अन्य प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार दिया गया एवं सभी को सर्टिफिकेट प्रदान किया गया।प्रतियोगिता के पश्चात मंदिर में भागवत कथा प्रारम्भ हुआ एवं भगवान श्रीकृष्ण जी की कथा कही गई। मंदिर में रात्रि 12.00 बजे भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कराया गया जिनके जन्म की खुशियों में भव्य आतिशबाजियॉ की गई, शंखनाद किया गया, बधाईयॉ दी गयी एवं भगवान के जयकारा से चारों दिशाओं गंुजायमान हो गया एवं सभी को प्रसाद वितरित किया गया।श्री सप्तदेव मंदिर परिवार ने समस्त भक्तजनों, सामाजिक संगठनों, पुलिस प्रशासन, यातायात प्रशासन, नगर पालिक निगम के साथ साथ समस्त समितियों को तथा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न किये जाने वाले सभी लोगों का आभार प्रगट किया।
: श्रद्धा और समर्पण का त्यौहार है गुरु पूर्णिमा - अरविन्द तिवारी
Wed, Jul 13, 2022
जगन्नाथपुरी - गुरु पूर्णिमा का त्यौहार प्रतिवर्ष आषाढ़ माह में पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह हिन्दू धर्म के लिये महत्वपूर्ण पर्व है जो भारत के पौराणिक इतिहास के महान संत ऋषि व्यास की याद में मनाया जाता है। इस दिन हिन्दू धर्मग्रन्थ महाभारत के रचयिता गुरु वेदव्यास जी का जन्म भी हुआ था , उन्होंने मानव जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया था और सभी पुराणों की रचना की थी। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि गुरू की महिमा का वर्णन करना तो सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। गुरू का ज्ञान और शिक्षा ही जीवन का आधार है , गुरू के बिना जीवन की कल्पना भी अधूरी है। गुरू जगत व्यवहार के साथ साथ भव तारक , पथ प्रदर्शक भी होते हैं। गुरू का स्थान ईश्वर से भी श्रेष्ठ है। गुरु शब्द में ‘गु’ का अर्थ है अंधेरा और ‘रु’ का अर्थ है अंधकार को दूर करना। गुरू हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान रुपी प्रकाश से जीवन को सफलता के उजाले की ओर ले जाने का कार्य गुरु के आशीर्वाद से ही संभव होता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिये एक श्लोक के अनुसार — यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरु अर्थात् जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिये है वैसी ही गुरु के लिये भी होती है, बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों ने की है। ईश्वर के अस्तित्व में मतभेद हो सकता है , किन्तु गुरु के लिये कोई मतभेद आज तक उत्पन्न नहीं हो सका , गुरु को सभी ने माना है। गुरुपूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण का त्यौहार है। यह त्यौहार गुरु के सम्मान का त्योहार है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन गुरु की पूजा करने से उनके शिष्यों को गुरु की दीक्षा का पूरा फल मिलता है। मानव मन में व्याप्त बुराई रूपी विष को दूर करने में गुरु का विशेष योगदान है। गुरू शिष्य का संबंध सेतु के समान होता है , उनकी कृपा से शिष्य के लक्ष्य का मार्ग आसान होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कई जगह गुरू महिमा का बहुत ही सटीक , सुंदर और महत्वपूर्ण वर्णन किया है।रामचरित मानस की पहली चौपाई में गुरु महिमा बताते हुये तुलसी दास जी कहते हैं- बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू। अर्थात- मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है। अयोध्याकाण्ड के प्रारम्भ में गुरु वंदना करते हुये तुलसीदास जी कहते है- जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं , ते जनु सकल बिभव बस करहीं। अर्थात- जो लोग गुरु के चरणों की रज को मस्तक पर धारण करते हैं , वे मानो समस्त ऐश्वर्य को अपने वश में कर लेते हैं। मानस में आगे लिखते हैं – गुरू बिनु भव निधि तरई न कोई। जो बिरंचि संकर सम होई।। अर्थात- गुरू के बिना अज्ञान के भवसागर से ब्रह्मा , शंकर सदृश देव भी पार नही हो सकते हैं। हरि रूठे गुरु ठौर है , गुरु रूठे नहिं ठौर॥’ अर्थात् भगवान के रूठने पर तो गुरु की शरण रक्षा कर सकती है किंतु गुरु के रूठने पर कहीं भी शरण मिलना संभव नहीं है। रामचरितमानस के अलावा भी तुलसीदास जी ने यत्र तत्र सर्वत्र गुरू महिमा का वर्णन अपनी विभिन्न रचनाओं में किया है। वास्तिवकता तो यही है कि जीवन के हर क्षेत्र में गुरू का मार्गदर्शन हर किसी को आवश्यक है। परंतु जब मनुष्य आध्यात्म के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो गुरू की अत्यधिक आवश्यकता होती है। ऊँचाइयों तक पहुंचने में गुरू का मार्गदर्शन सूर्य के प्रकाश के समान है। गुरू कभी भी हमारा अहित नही करते बल्कि मुश्किल की घड़ी में सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। रास्ता कोई भी हो, कैसा भी हो उसे सरल और सुगम बनाने में गुरू की शिक्षायें रेगिस्तान में पानी के समान होती हैं। मोक्ष का द्वार हो या आध्यात्म का मार्ग हर मार्ग की सफलता गुरू के आशीर्वाद से अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है। ईश्वर भी गुरू के बिना नही मिलता तभी तो गुरू का दर्जा ईश्वर से भी श्रेष्ठ है। गुरौ न प्राप्यते यत्तन्नान्यत्रापि हि लभ्यते। गुरुप्रसादात सर्वं तु प्राप्नोत्येव न संशयः।। अर्थात गुरु के द्वारा जो प्राप्त नहीं होता , वह अन्यत्र भी नहीं मिलता। गुरु कृपा से मनुष्य नि:संदेह सभी कुछ प्राप्त कर ही लेता है। दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम्। गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन।। अर्थात जैसे दूध के बिना गाय , फूल के बिना लता , चरित्र के बिना पत्नी , कमल के बिना जल , शांति के बिना विद्या, और लोगों के बिना नगर शोभा नहीं देते, वैसे हि गुरु बिना शिष्य शोभा नहीं देता। गुरोर्यत्र परीवादो निंदा वापिप्रवर्तते।कर्णौ तत्र विधातव्यो गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः।। अर्थात – जहाँ गुरु की निंदा होती है, वहाँ उसका विरोध करना चाहिये। यदि यह शक्य (संभव) ना हो तो कान बंद करके बैठना चाहिये और यदि यह भी शक्य (संभव) ना हो तो वहाँ से उठकर दूसरे स्थान पर चले जाना चाहिये।
पूर्णे तटाके तृषितः सदैव भूतेऽपि गेहे क्षुधितः स मूढः। कल्पद्रुमे सत्यपि वै दरिद्रः गुर्वादियोगेऽपि हि यः प्रमादी।। अर्थात इंसान गुरु मिलने के बावजुद प्रमादी (अज्ञानी) रहे , वह मूर्ख पानी से भरे हुये सरोवर के पास होते हुये भी प्यासा , घर में अनाज होते हुये भी भूखा , और कल्पवृक्ष के पास रहते हुये भी दरिद्र है। इतिहास गवाह है कि अवतारी महापुरूषों को भी गुरु के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। भगवान श्रीराम भी महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र जैसे गुरुओं के सानिध्य में ही अपना सर्वांगीण विकास करने में सफल हुये। श्रीकृष्ण को कृष्णं वंदे जगतगुरुम् कहा जाता है फिर भी कृष्ण का जीवन गर्ग ऋषि एवं संदीपन ऋषि के मार्गदर्शन ने ही आलोकित किया है। कहने का आशय ये है कि प्रत्येक मनुष्य को सम्पूर्ण विकास हेतु एवं आध्यात्मिक प्रकाश के लिये गुरु का सानिध्य अति महत्वपूर्ण है। गुरु का कार्य नैतिक , आध्यात्मिक , सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को हल करना भी है। राजा दशरथ के दरबार में गुरु वशिष्ठ से भला कौन परिचित नहीं है ? जिनकी सलाह के बगैर दरबार का कोई भी कार्य नहीं होता था। गुरु की भूमिका भारत में केवल आध्यात्म या धार्मिकता तक ही सीमित नहीं रही है , देश पर राजनीतिक विपदा आने पर गुरु ने देश को उचित सलाह देकर विपदा से उबारा भी है। अर्थात् अनादिकाल से गुरु ने शिष्य का हर क्षेत्र में व्यापक एवं समग्रता से मार्गदर्शन किया है। जीवन का विकास सुचारू रूप से सतत् चलता रहे उसके लिये हमें गुरु की आवश्यकता होती है। भावी जीवन का निर्माण गुरू द्वारा ही होता है। गुरु के बिना कोई भी महान होने की कल्पना नहीं कर सकता। स्पष्ट है यदि हमें अपने समाज देश व सभ्यता को अधिक श्रेष्ठ बनाना चाहते है तो हमें अपनी पुरातन गुरु शिष्य परम्परा तथा शिक्षा प्रणाली को अपनाना होगा। जीवन में सफलता की सीढियाँ तभी चढ़ा जा सकता हैं जब हमें गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त हो। उनके पथप्रदर्शन के बिना मानव भ्रमित हो जायेगा , अपने इच्छित लक्ष्य से भटक जायेगा। बदले में गुरु हमसे धन दौलत कुछ नहीं चाहता बस उन्हें सम्मान देने की आवश्यकता हैं।