: मणिपुर खुद जल नहीं रहा, जलाया जा रहा है,(आलेख : राजेन्द्र शर्मा)
Sun, Aug 6, 2023
विपक्षी दलों के गठबंधन के सदस्यों का दौरा मात्र दिखावा है। जब पूर्ववर्ती सरकारों के शासन में मणिपुर जलता था, तब उन लोगों ने संसद में एक भी शब्द नहीं कहा, जो अब पूर्वोत्तर राज्य का दौरा कर रहे हैं।" *— अनुराग ठाकुर
मोदी सरकार में युवा मामलों तथा खेलों के मंत्री, अनुराग ठाकुर का ऊपर-उद्यृत वक्तव्य, चौबीस महत्वपूर्ण विपक्षी पार्टियों के मंच—इंडिया—के इक्कीस सांसदों की टीम के मणिपुर के दो दिन के दौरे को खारिज करने की अपनी बदहवासी में, सबसे बढ़कर इसी का सबूत पेश करता है कि मोदी के डबल इंजन राज से, मणिपुर के हालात को संभालने के लिए, कम से कम किसी भी तरह के बहुपक्षीय प्रयास की उम्मीद नहीं की जा सकती है। बहरहाल, यह विनाशकारी नकारात्मकता सिर्फ राजनीतिक बहुपक्षीयता का रास्ता बंद करने तक ही सीमित नहीं है। मणिपुर में शांति तथा सद्भाव का संदेश लेकर पहुंचे विपक्षी सांसदों के दल के राजधानी इम्फाल पहुंचने के मौके पर प्रायोजित तथाकथित शांति रैली, जिसका आयोजन मणिपुर इंटिग्रिटी समन्वय समिति या कोकोमी द्वारा किया गया था, जाहिर है कि शासन के अनुमोदन से, इसका खुलेआम ऐलान कर रही थी कि इथनिक-सामाजिक बहुपक्षीयता का रास्ता, असामान्य हालात के तीन महीने पूरे होने के बाद भी, कसकर बंद ही रखा जाना है।खबरों के अनुसार, इस प्रधानत: मैतेई रैली का पूरा जोर यह साबित करने पर तो था ही कि सारी समस्या, कुकी-चिन समुदाय की खड़ी की हुई थी, जिसे उत्तर-पूर्व के संदर्भ में संघ की जानी-पहचानी शब्दावली में 'अवैध घुसपैठिए' बताया जा रहा था। इससे भी खतरनाक यह कि रैली में शामिल लोगों को इन कुकी-चिन घुसपैठियों को 'उखाड़कर संंघर्ष खत्म करने' यानी उखाड़ने तक यह संघर्ष जारी रखने का संकल्प दिलाया जा रहा था। इन दोनों को जोड़कर देखें तो, एक ही नतीजे पर पहुंचना होगा कि मणिपुर की त्रासदी यह नहीं है कि वह जल रहा है, उसकी असली त्रासदी यह है कि उसे जान-बूझकर जलाया जा रहा है और जलाने वालों के ही हाथों में आज सत्ता है, देश में भी और प्रदेश में भी।मणिपुर में 3 मई से जो हो रहा है और उत्तर-पूर्व के इस अभागे राज्य में, इससे पहले भी कई मौकों पर जो कुछ होता रहा है, उसमें यही गुणात्मक अंतर है। यह आज राज में जो बैठे हुए हैं, उनकी विफलता का मामला नहीं है, जैसा कि अब तक रहता आया है। इन विफलताओं के कारण बेशक पुराने और ऐतिहासिक हैं। यह राज्य विविधताओं तथा उसने जुड़े इथनिक टकरावों का ही नहीं, असंतुलनों का भी भंडार है। सबसे बड़ा असंतुलन तो यही कि मैतेई, जो आबादी का 52 फीसद से ज्यादा हिस्सा हैं, आर्थिक व शैक्षणिक-सांस्कृतिक दृष्टि से कहीं उन्नत हैं और परंपरागत रूप से हिंदू परंपराओं के निकट रहे हैं। वे मुख्यत: इम्फाल घाटी में संकेंद्रित हैं। मैतेई पिछले एक दशक के करीब में बढ़ते पैमाने पर अपनी पहचान हिंदू के तौर पर कराने लगे हैं। वे करीब 20 फीसद जमीनों पर काबिज हैं और मोटे तौर पर विधानसभा की साठ से चालीस सीटें उनके हिस्से में आती हैं। दूसरी ओर, कुकी-जोमी तथा अन्य आदिवासी के रूप में मान्यता-प्राप्त समुदाय, जो मुख्यत: पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, आर्थिक व सांस्कृतिक लिहाज से कम विकसित हैं, वन्य इलाकों में रहते हैं, बड़ी संख्या में खुद को ईसाई मानते हैं और विधानसभा की साठ में से कुल बीस सीटें ही उनके लिए आरक्षित हैंइस राज्य में जहां परंपरागत रूप से, विशेष रूप से सभी आदिवासी ग्रुपों के अपने सशस्त्र संगठन रहे हैं, जिनमें से अनेक से युद्घविराम जैसे समझौते के जरिए हथियार रखवा कर पिछले दशकों में एक हद तक शांति भी कायम कर ली गयी थी, मैतेई समुदाय पर केंद्रित कर आरएसएस-भाजपा द्वारा पांव फैलाए जाने ने और फिर 2018 के चुनाव के बाद से भाजपा के जोड़-तोड़ से सत्ता पर काबिज होकर राज चलाए जाने ने, रुई पर तेल छिड़कने का ही काम किया है। इसी पृष्ठभूमि में अप्रैल के आखिर में आए, हाई कोर्ट के निर्देश ने, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक भी लगा दी, मैतेई समुदाय को आदिवासी यानी अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने का एक तरह से आदेश ही देकर, माचिस दिखाने का काम किया।मैतेई समुदाय को आदिवासी दर्जा दिए जाने की इस संभावना के खिलाफ, जिसकी आशंकाओं को राज्य और केंद्र, दोनों में भाजपा सरकार की मौजूदगी और हवा ही देती थी, 3 मई को निकली आदिवासी ग्रुपों की विरोध रैली पर हमलों से जो हिंसा भड़की, उसने तेजी से राज्य में घाटी और पहाड़ी क्षेत्र के मुख्य समुदायों को, जैसे परस्पर युद्घरत राष्ट्रों में बदल दिया। चूंकि इस युद्घ की स्थिति के बीच व्यावहारिक मानों में पूरे राजतंत्र को और बहुत ही महत्वपूर्ण रूप से राज्य सरकार के तंत्र को, उसमें इथनिक आधार पर थोड़े-बहुत विभाजन के बावजूद, आम तौर पर बहुसंख्यक मैतेई समुदाय के ही साथ खड़ा माना जा रहा था। इसके ऊपर से मुख्यमंत्री द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय को ही 'विदेशी घुसपैठियों' से लेकर 'नशा कारोबारी', आतंकवादी आदि, आदि करार दिए जाने का सिलसिला जारी था। इसने मणिपुर में शासन नाम की शायद ही कोई चीज छोड़ी है। और सारी विफलताओं के बावजूद, जिनमें राजधर्म का निर्वाह करने में विफलता सबसे बड़ी है, मोदी-शाह द्वारा वर्तमान मुख्यमंत्री बिरेन सिंह को संरक्षण दिए जाने ने, इस गृहयुद्घ को रुकवाने में शासन की भूमिका को एक तरह से त्याग ही दिया है।लेकिन, मणिपुर के संकट के संदर्भ में शासन का इस तरह लापता ही हो जाना, न तो संयोग है और न ही किसी भूल-चूक का मामला है। इस गैर-हाजिरी का तीन महीने लंबा इतिहास खुद इसकी गवाही देता है। बेशक, 3-4 मई से मणिपुर जब सुलगना शुरू हुआ, मोदी राज का पूरा ध्यान कर्नाटक में चुनाव प्रचार पर था। खुद प्रधानमंत्री मोदी, उनके नंबर दो तथा देश के गृहमंत्री, अमित शाह और एक प्रकार से उनकी पूरी की पूरी सरकार ही, कर्नाटक के चुनाव प्रचार में जुटे हुए थे। लेकिन, लोगों को हैरान करते हुए, कर्नाटक का चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भी, मई के आखिर तक मणिपुर की मोदी राज ने, केंद्रीय बलों की संख्या बढ़ाने के अलावा, कोई खोज-खबर नहीं ली। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री को वहां के घटनाक्रम पर चिंता जताना और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करना तक, मंजूर नहीं हुआ। और तो और, जब बाकायदा युद्घ के जैसे हालात से विचलित, खुद सत्ताधारी पार्टी के विधायकों समेत, पक्ष-विपक्ष, सभी ओर के राजनीतिक नेताओं ने केंद्र से सक्रिय हस्तक्षेप की मांग करने के लिए दिल्ली के दौरे किए, पर प्रधानमंत्री को अपनी ही पार्टी के विधायकों तक से बात करने का समय नहीं मिला और वह कई दिन की विदेश यात्रा पर चले गए।मई के आखिर में, गृहमंत्री अमित शाह के तीन दिन के पहले दौरे से, अगर अल्पसंख्यक समूहों को थोड़ी-बहुत कुछ उम्मीद बंधी भी होगी, तो उसे भी राज्यपाल की अध्यक्षता में एक सर्वपक्षीय समिति बनाने जैसी उनकी घोषणाओं के साथ वास्तव में जो अगंभीर सलूक हुआ, उसने जल्द ही खत्म कर दिया। उनकी अपील के बावजूद, न लूटे गए हथियार लौटाए गए और न ही हिंसक हमले रुके। उल्टे प्रदर्शनकारियों द्वारा रास्ते रोके जाने के बल पर, सैन्य बलों को ही उनके शिविरों मेें कैद कर के रख दिया गया।उसके बाद गुजरे दो महीनों में हालात में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है। हां! कुछ कुकी महिलाओं के साथ दरिंदगी का वीडियो वाइरल होने के बाद, संसद के मौजूदा सत्र की पूर्व-संध्या पर देश भर में दौड़ी विक्षोभ तथा वितृष्णा की लहर के बाद, प्रधानमंत्री को जरूर पहली बार मणिपुर की त्रासदी पर कुछ बोलना पड़ा है। लेकिन, वह बोलना भी इतना कम था कि उसमें संबंधित घटना पर दु:ख तथा क्षोभ जताने के साथ ही प्रधानमंत्री, विशेष रूप से विपक्ष-शासित राज्यों पर ऐसी घटनाओं के लिए हमला करने की ओर मुड़ गए। दूसरी ओर, उन्होंने न तो आम तौर पर मणिपुर की त्रासदी पर कोई दु:ख या पछतावा जताया और न ही लोगों से शांति व सौहार्द्र बनाए रखने की अपील तक की।प्रधानमंत्री का उक्त बयान भी चूंकि संसद में नहीं, संसद के दरवाजे पर ही दिया गया था, विपक्ष आज तक मणिपुर के संकट पर प्रधानमंत्री के बयान और उसके बाद संसद में उस पर बहस की मांग ही कर रहा है। इस सरासर न्यायसिद्घ मांग को हठपूर्वक ठुकराने के जरिए, मोदी राज ने संसद के एक और सत्र को पहले ही दिन से ठप्प कर रखा है। दूसरी ओर, विपक्ष समेत जनमत के विशाल हिस्से की सुस्पष्ट मांग के बावजूद, मोदी राज ने बिरेन सिंह को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाने का एक प्रकार से ऐलान ही कर दिया है।लेकिन, यह सिर्फ प्रधानमंत्री के जवाबदेही से इंकार करने या अहंकार का ही मामला भी नहीं है। 2002 के गुजरात के नरसंहार और 2023 के मणिपुर के खून-खराबे में इतनी सारी समानताएं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को सार्वजनिक रूप से यौन हिंसा का निशाना बनाया जाना भी शामिल है, कोई संयोग से ही नहीं प्रकट हो गयी हैं। इनके पीछे, बहुसंख्यक समुदाय के राजनीतिक समर्थन के सांप्रदायिक सुदृढ़ीकरण की बहुत ही सोची-समझी रणनीति है। सब कुछ के बावजूद, इस अभियान के बीच से संघ-भाजपा मैतेई समुदाय के बीच अपनी पकड़, पहले से मजबूत होने की ही उम्मीद रखते हैं। रही बाकी सब लोगों की बात, तो उन्हें शासन के डंडे से ठोक-पीटकर झुकाने में कुछ समय भले ही लग जाए, लेकिन देर-सबेर कुछ न कुछ कामयाबी भी मिल ही जाएगी। और शासन के डंडे से ठोक-पीट के लिए अल्पसंख्यकों को विदेशी या घुसपैठिया या आतंकवादी करार दे देना ही काफी है।पूर्व-थल सेनाध्यक्ष, जनरल नरवणे ने 'मणिपुर हिंसा में विदेशी एजेंसियों के हाथ' की अटकलों को हवा देेने के जरिए, इसके लिए रास्ता और साफ कर दिया है। यह गुजरात का आजमाया फार्मूला है, जो कश्मीर में एक हद तक कामयाब आजमाइश के साथ, अब मणिपुर में आजमाया जा रहा है। मणिपुर, खुद जल नहीं रहा है, मणिपुर जलाया जा रहा है।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)
: हाँ, ट्रेन हत्यारा मनोरोगी है, मगर उस रोग का वायरस कौन है?,(आलेख : बादल सरोज)
Sun, Aug 6, 2023
जयपुर-मुम्बई ट्रेन में जो हुआ वह भयानक है -- अत्यंत खतरनाक स्तर का भयानक है ; लेकिन अचानक नहीं है।यह एक संक्रमण का परिणाम तो है ही, इसी के साथ उसके भीषण रूप से संक्रामक होने का एलान भी है। आरपीएफ जवान चेतन कुमार सिंह ने हत्याओं की शुरुआत एएसआई टीकाराम मीणा से की, क्योंकि उसके साथ राजनीतिक बहस के बीच जब वह मुसलमानों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर रहा था, तब मीणा ने उससे असहमति जताई थी और उसकी टुकड़ी के इंचार्ज होने के नाते इस एएसआई ने उसे टोका था और ऐसी बातें न करने के लिए कहा था। मीणा की असहमति का जवाब इसने गोली से उनकी जान लेकर दिया। वह यहीं तक नहीं रुका। उसके बाद बी-4, बी-5 और पैंट्री कार - तीन अलग-अलग डिब्बों - में जाकर बिना किसी उकसावे, बिना किसी व्यक्तिगत जान-पहचान के सिर्फ उनकी मुस्लिम पहचान के बिना पर तीन सवारियों को भून दिया। यह सुबह-सुबह की, साढ़े पांच बजे भोर की बात है, जब यह माना जाता है कि मानसिक शान्ति सबसे उत्तम होती है। बात इतने तक ही नहीं रुकी, इस दिल दहला देने वाले हत्याकाण्ड को अंजाम देने के बाद उसने बिना किसी भावावेश में आये, लाश के सिरहाने खड़े होकर बाकायदा "भाषण" दिया, इसमें उसने कहा कि : "ये लोग (मुसलमान) पाकिस्तान से ऑपरेट होते हैं, (ऐसा) हमारी मीडिया कवरेज दिखा रही है। पता चल रहा है उनको, सब पता चल रहा है। इनके आका हैं वहां। अगर वोट देना है, हिंदुस्तान में रहना है, तो मैं कहता हूँ मोदी-योगी को दीजिये। यही दो हैं!!"अत्यंत संयत शब्दों में दिए इस भाषण में कही गयी उसकी बातें इस बीमारी के अब महामारी बनने की ओर अग्रसर होने के लक्षण दिखाने वाली हैं, इसकी व्याप्ति और उसके उदगम दोनों को साफ़-साफ़ सामने लाने वाली हैं। बीमारी का यह नया प्रकार है। इसे धर्मोन्माद नहीं कहा जा सकता, यहाँ कोई कथित आहत भाव का मसला नहीं था। यह भीड़ हत्या का मसला भी नहीं था -- दूर-दूर तक न कोई गाय थी, न कोई पशुओं का व्यापारी ही था। एएसआई मीणा तो मुस्लिम भी नहीं था। भारत के साम्प्रदायिक खूंरेजी के इतिहास की यह पहली घटना है, जहां किसी भगवान् या खुदा या गॉड या पैगम्बर के बहाने नहीं, घोषित रूप से दो नेताओं - मोदी और योगी - का नाम लेकर चार लोग मार दिए गए ; वह भी उसके द्वारा जिसकी ड्यूटी ही उनकी सुरक्षा के लिए लगाई गयी थी। जाहिर है कि ये हत्याएं किसी झक्की, सनकी, चिड़चिड़े व्यक्ति द्वारा किया गया काण्ड नहीं है। ये एक ख़ास राजनीति के पक्ष में की गयी राजनीतिक हत्याएं हैं ; उसके बाद दिया गया भाषण किसी मनोरोगी का प्रलाप नहीं है -- एक राजनीतिक वक्तव्य है। जिन मोदी और योगी का नाम लिया गया है, उनकी राजनीति का निर्दोषों के खून की स्याही और एके-47 की राईफल से लिखा गया आख्यान है।इस हत्याकाण्ड के बाद ज्यादातर मीडिया, हमारी नजर में आये हिंदी अखबारों, ने इस भाषण के बारे में, खासतौर से उसके आख़िरी हिस्से के बारे में, चुप्पी साधने का रास्ता चुना। मोदी-योगी वाली बात छुपाने की कोशिश की। पुलिस द्वारा दर्ज प्रकरण में भी इसका संज्ञान नहीं लिया गया, खबर तो यह भी है कि ट्विटर को हुकुम दिया गया है कि वह इस वीडियो को हटा ले। इसी के साथ, इसी लाइन की निरंतरता में आरपीएफ और पुलिस सहित पूरे का पूरा सरकारी महकमा उसे मानसिक रोगी साबित करने के काम में लग गया है। अनेक लोगों ने सरकारी अधिकारियों के इस बयान को लीपापोती की कोशिश बताया है। यकीनन यह एक तरह से हत्याओं की असली वजह से ध्यान बंटाने की चतुराई है भी, मगर इसी के साथ यह सच को दूसरी तरह स्वीकार लेने की स्थिति भी है। एक तरह की फ्रायडियन चूक है, जिसमे सच छुपाने की लाख कोशिश करने के बाद भी वह निकल ही जाता है।निस्संदेह चेतन कुमार सिंह एक मनोरोगी है ; एक ऐसे खतरनाक मनोरोग का शिकार, जिसने उसके मनुष्यत्व को समाप्त करके उसे एक हिंसक, आदमखोर प्राणी में बदल कर रख दिया है। वह एक ख़ास किस्म के नफरती प्रोपेगंडा का शिकार होकर एक अति विषाक्त मानव गन में तब्दील होकर रह गया है। यह नफरती प्रचार और उसके जरिये उन्माद पैदा करने का काम कौन कर रहे हैं, इसे खुद उसने अपने हत्या उपरान्त दिए गए भाषण में स्वीकार कर लिया है। यही नफरती प्रचार था, जिसने गांधी के हत्यारे को प्रेरित किया था। गांधी हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध को लेकर आयी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिट्ठी के जवाब में तब के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 18 जुलाई, 1948 को लिखा था कि ":... इन दो संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के कारण देश में ऐसा वातावरण बना, जिसकी वजह से ऐसी (गांधी हत्या जैसी) भयानक घटना घटी।" उन्होंने लिखा कि ".... आर एस एस नेताओं के सारे भाषण सांप्रदायिकता के जहर से भरे होते हैं .... इस जहर का ही नतीजा देश को गांधी जी के बलिदान से चुकाना पड़ा।" और यह भी कि "आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए जोखिम भरी थीं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि (प्रतिबंध के बाद भी) ऐसी गतिविधियां बंद होने के बावजूद खत्म नहीं हुईं।समय के साथ-साथ आरएसएस का संगठन और अवज्ञा करता जा रहा है। उनकी विद्रोही गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं।''यह चिट्ठी सरदार पटेल ने यह चिट्ठी 74 वर्ष पहले लिखी थी। आजादी की 75वी वर्षगांठ के ठीक पहले फिर एक बार वही जहर उबल कर उफन रहा है। चेतन कुमार सिंह उसी जहर से भरा मानव-बम था!! ऐसे अनेक मानव बम घूम रहे हैं।जो मनोदशा इस हत्यारे की बनाई गयी है, वह इसी तक महदूद नहीं रहने वाली। जिस मीडिया का वह सबूत के रूप में जिक्र कर रहा था, जिस व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी ने उसमें यह विस्फोटक विष भरा था, वह 24 घंटा, सातों दिन इसी तरह के जहर का उत्पादन कर रही है। इसलिए नफरत का कारोबार यहीं तक रुकने वाला नहीं है। जो नाजी जर्मनी और मुसोलिनी अपने भारतीय संस्करणों का प्रेरणास्रोत है, उनके जमाने की मनोदशा और सबको उस मनोदशा में पहुंचा देने की प्रक्रिया और तकनीक को लेकर अनेक अध्ययन हुए हैं। ऐसी सैकड़ों किताबें हैं। इनमे से एक विलियम एल. शीरर की किताब ‘राइज एंड फॉल ऑफ द थर्ड राइख’ उस पूरी कवायद का दस्तावेजीकरण करती है, जिसके द्वारा इस उन्मादी मानसिकता को उत्तरोत्तर उच्च से उच्चतर स्तर तक पहुंचाया गया। किस तरह "हम" और "वे" की धारणा को पक्का कर जो "वे" करार दिए गए, उनके साथ हर तरह की बर्बरता को जायज बनाया गया। इन्हें पढ़ते में ऐसा लगता है, जैसे इन दिनों यही सब ठीक उसी तरह दोहराया जा रहा है। 'नाज़ी जर्मनी (शार्ट ऑक्सफ़ोर्ड हिस्ट्री ऑफ़ जर्मनी)' इन सबके अलावा इस प्रक्रिया के तीव्र से तीव्रतर होते जाने के उस दौर की कई राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों की समर्पणकारी और बचकाना उम्मीदों वाली दिवालिया भूमिका को सामने लाती है। नाजियों पर चले न्यूरेमबर्ग मुकदमे के मुजरिमों के साथ मनोवैज्ञानिकों के लम्बे साक्षात्कारों पर आधारित एक पूरा अध्ययन भी है, नाजियों के साथ पूछताछ पर आधारित 'इंटेरोगेशन' सहित अनेक प्रामाणिक अध्ययन और भी हैं। इन्हीं में एक छोटी सी किताब ‘नाजीवादी जर्मनी की मनोदशा’ है, जिसे स्विस मनोविज्ञानी और मशहूर लेखक कार्ल गुस्ताव यंग ने लिखा है। कार्ल ने 1928 से 1941 के दौरान कोई 15 हजार से ज्यादा जर्मनों के मनोविज्ञान का अध्ययन किया था। इनमें हर तबकों के लोग थे। इस शोध के आधार पर उन्होंने पता लगाया कि हिटलर और उसके प्रचारतंत्र ने कैसे उनका विवेक छीनकर उन्हें एक उन्मादी भीड़ में बदल दिया और किस तरह सिर्फ 32-33 प्रतिशत जर्मन वासियों का समर्थन पाने वाला हिटलर और उसका नाज़ी गिरोह पूरी जर्मनी को आत्मविनाश के लिए तैयार करने में कामयाब हो गया। किस तरह उसने पढ़े-लिखे लोगों की एक जमात, पत्रकारों, कलाकारों को भी राजनीतिक हत्याओं का समर्थन करने वालों में बदल दिया। अंध भक्तों की एक बड़ी फ़ौज खडी कर दी, जो हर तरह के दमन, यहाँ तक कि नरसंहार को भी देश के लिए जरूरी मानने लगी। ऐसी भीड़ तैयार कर दी, जो सत्ता के खिलाफ उठने वाले सवालों का खुद ही जवाब देने और उसे सही साबित करने के काम में लग गयी, हिटलर को उन्माद भड़काने वाले भाषण देने (और आखिर में आत्महत्या करने) के सिवाय कुछ नहीं करना पड़ा।ऐसे लोगों के प्रोफाइल तैयार करते में कार्ल गुस्ताव इनमे जो समानता पाते हैं, वे इनके पढ़े-लिखे होने के बाद भी सूचनाओं और ज्ञान से वंचित होने इस तरह कुपढ़ होने, खुद और परिवार से दुखी और असंतुष्ट होने और ज्यादातर मामलों में कमतर क्षमता के बावजूद योग्यतम होने का भरम पालने वाला होने तथा अपनी अक्षमता की हीनग्रंथि से उबरने के लिए शुद्ध आर्य रक्त और आर्य राष्ट्रवाद का सहारा लेने वाला होने की थीं।लाश पर खड़े होकर दिया गया चेतन कुमार सिंह का भाषण इस बात का प्रमाण है कि वह इसी तरह की उन्मादी मशीन से ढला हुआ मनोरोगी है। नफरती प्रचार ने उससे मनुष्य होने का विवेक छीन लिया है। उसे इस दशा में किसने पहुंचाया है यह बात भी, "हमारी मीडिया कवरेज दिखा रही है, जिससे पता चल रहा है, सब पता चल रहा है।" कहकर वह स्वयं ही क़ुबूल कर रहा है। "अगर वोट देना है, हिंदुस्तान में रहना है तो मैं कहता हूँ मोदी-योगी को दीजिये" की धमकी देकर अपना मकसद भी स्पष्ट रूप से व्यक्त कर रहा है।इतने भयानक काण्ड के बावजूद किसी केन्द्रीय अथवा महाराष्ट्र सरकार के मंत्री, भाजपा के किसी प्रवक्ता, संघ के किसी भी मुखौटे द्वारा इसकी निंदा या भर्त्सना तक नहीं की गयी है। पिल्ले के मर जाने पर भी दुःख होने का दावा करने वाले जब मणिपुर पर नहीं बोले, तो इस पर क्या बोलेंगे? मौतों पर अफ़सोस तक व्यक्त नहीं किया गया है। अपने नाम का इस्तेमाल करने पर क्षोभ या रोष भी नहीं जताया गया। यह साधारण बात नहीं है - यह एक प्रकार से इस जघन्यता का अनुमोदन है ; यह मौनम स्वीकृति लक्षणम् है। इसे ठीक इसके अगले दिन से योजनाबद्ध तरीके से हरियाणा में शुरू किये गए साम्प्रदायिक हमलों और फटाफट उनके पूरे प्रदेश में फैल जाने के साथ जोड़कर देखने से साफ़ हो जाता है कि यह 2024 के चुनाव अभियान का शंख फूँका जाना है ; उसके लिए एजेंडा तैयार किया जाना है।यह साम्प्रदायिकता से आगे की चीज है -- यह वहशी फासिस्टी उन्माद है और उसे जिस तरह तेज से तेजतर किया जा रहा है, उसे देखकर नहीं लगता कि यह यहीं तक रुकने वाला है या सिर्फ एक समुदाय विशेष तक ठहरने वाला है। असहमति जताने वाले, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र और क़ानून की राज की हिमायत करने वाले, अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ या अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन करने वाले आदि-इत्यादि जिन-जिन के खिलाफ यह उन्माद भड़काया जा रहा है, वे सब भी इन मानव गन के निशाने पर हैं, जॉन एलिया का शेर थोड़ा बदल कर कहें तो : "अब हुयी हरेक बात खतरे की / अब सभी को सभी से खतरा है।"ऐसे खतरों के समय, इन खतरों के खिलाफ जितना अधिक संभव हो, उतनों को जोड़ना और जितनी शिद्दत से संभव है उससे कहीं ज्यादा जिद के साथ मैदान में उतरना ही एकमात्र विकल्प है।(लेखक पाक्षिक 'लोकजतन' के संपादक और अ. भा. किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।
: नशीली दवाईयों की बिक्री हेतु ग्राहक तलाशते दो आरोपी जेल दाखिल
Mon, Jul 18, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
बिलासपुर - श्रीकांत वर्मा मार्ग के साईं मंदिर के सामने ईको मारूति कार में मादक द्रव्य सिरफ एवं टेबलेट रखकर बिक्री हेतु ग्राहकों की तलाश करने वाले दो आरोपियों को तारबहार पुलिस ने गिरफ्तार कर एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्यवाही करते हुये न्यायालय में पेश किया। जहां से दोनों आरोपियों को न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया।
इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये तारबहार थाना प्रभारी निरीक्षक देवेश सिंह राठौर ने अरविन्द तिवारी को बताया कि जिले में मादक द्रव्यों की खरीदी बिक्री की शिकायत एवं इससे बढ़ते अपराध पर रोकथाम लगाने हेतु श्रीमान उप पुलिस महानिरीक्षक एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्रीमती पारूल माथुर द्वारा थाना प्रभारियों को निर्देशित किया गया था। जिस पर थाना प्रभारी तारबाहर द्वारा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ( शहर ) उमेश कश्यप एवं नगर पुलिस अधीक्षक सिविल लाईन श्रीमती मंजूलता बाज से आवश्यक दिशा निर्देश प्राप्त कर मुखबिर तैनात किया गया। मुखबिर से सूचना मिली कि श्रीकांत वर्मा मार्ग के सांई मंदिर के सामने एक ईको मारुती कार में 02 व्यक्ति अवैध रूप से मादक द्रव्य ( सिरफ ) एवं टेबलेट रखकर बिक्री करने हेतु ग्राहक की तलाश कर रहे हैं कि सूचना पर वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी से अवगत कराकर मौके पर पुलिस टीम एवं गवाह के मुखबिर के बताये स्थान पर पहुंचकर घेराबंदी कर रेड कार्यवाही किया जो एक व्यक्ति ईको मारुती कार जिसका नं . - सीजी 10 / एटी 3778 में बैठा मिला तथा एक अन्य व्यक्ति हाथ में मटमैला झोला लेकर भागने लगा जिन्हें पकडकर पुछताछ करने पर कार में बैठा व्यक्ति अपना नाम भानू प्रताप साहू पिता चंद्रकांत साहू ( उम्र 42 वर्ष) निवासी अशोक नगर थाना सरकण्डा बिलासपुर तथा दुसरे व्यक्ति ने अपना नाम लक्ष्मी नारायण दास मानिकपुरी उर्फ राजू मानिकपुरी पिता ईतवारी लाल मानिकपुरी (उम्र 37 वर्ष) निवासी टिकरापारा थाना सिटीकोतवाली बिलासपुर का बताया। संदेही भानू प्रताप साहू के कब्जे के वाहन ईको मारूती की तलाशी लिया गया जिससे
अल्प्राजोलम टेबलेट की 4800 नग टेबलेट कीमती 11520 रूपये व कोफुरेक्स सिरप की 35 नग शीशी कीमती 6020 रूपये व नगदी 1500 रूपये और घटना में प्रयुक्त ईको मारुती कार कीमती तीन लाख रूपये एवं संदेही लक्ष्मी नारायण दास मानिकपुरी के कब्जे से अल्प्राजोलम टेबलेट की 3600 नग टेबलेट कीमती 8640 रूपये व कोफुरेक्स सिरप की 25 नग शीशी कीमती 4300 रूपये कुल जुमला 331980 रूपये को एनडीपीएस एक्ट के प्रावधानों के अंतर्गत विधिवत कार्यवाही में जप्त करते हुये दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया। जहां से दोनों आरोपियों को न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया। उक्त कार्यवाही में थाना प्रभारी तारबाहर निरीक्षक देवेश सिंह राठौर , सउनि शैलेन्द्र सिंह , आरक्षक पवन बंजारे , राजेन्द्र कुमार , प्रहलाद जोशी , सज्जू अली , अजय ठाकुर की विशेष भूमिका रही है।