: मानहानि मामले में 29 अक्टूबर को कोर्ट में पेश होंगे राहुल
Wed, Oct 27, 2021
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टसूरत - गुजरात के एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को 'मोदी सरनेम' पर टिप्पणी को लेकर तलब करते हुये उनके खिलाफ आपराधिक मानहानि मामले के संबंध में बयान दर्ज कराने के लिये 29 अक्टूबर को कोर्ट के सामने पेश होने का निर्देश दिया है। बताते चलें राहुल गांधी ने अप्रैल 2019 में मोदी सरनेम को लेकर टिप्पणी की थी और सूरत हाईकोर्ट में इसी मामले में सुनवाई चल रही है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ए एन दवे ने राहुल गांधी को अपना बयान दर्ज करने के लिये 29 अक्टूबर को पेश होने के लिये कहा है। सूरत कोर्ट में इससे पहले भी कई बार राहुल गांधी पेश हो चुके हैं। पिछली बार हुई पेशी में जज ने राहुल गांधी से सवाल किया था कि क्या उन्हें अपना गुनाह कबूल है ? इस पर राहुल गांधी ने जवाब दिया था कि उन्हें गुनाह कबूल नहीं है। राहुल गांधी के वकील किरीट पंवाला ने कहा कि अदालत ने सोमवार को मौखिक रूप से राहुल गांधी को दो नए गवाहों की गवाही पर अपना आगे का बयान दर्ज करने के लिये 29 अक्टूबर को पेश होने का निर्देश दिया। राहुल गांधी के उस दिन दोपहर तीन बजे से शाम छह बजे के बीच अदालत में मौजूद रहने की संभावना है। बताते चलें सूरत के भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने अप्रैल 2019 में गांधी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि का मामला दर्ज कराया था। अपनी शिकायत में भाजपा विधायक ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने वर्ष 2019 में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुये पूरे मोदी समुदाय को यह कहकर बदनाम कर दिया था कि 'सभी चोरों का सामान्य सरनेम मोदी कैसे है ?' पूर्णेश मोदी अब मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व वाली नई गुजरात सरकार में मंत्री हैं , जिनके पास सड़क और भवन, परिवहन, नागरिक उड्डयन और पर्यटन और तीर्थ विकास विभाग हैं। अदालत के समक्ष गांधी की अंतिम उपस्थिति के बाद से दो और गवाहों की गवाही ली गई- कर्नाटक में कोलार के तत्कालीन चुनाव अधिकारी जहां कांग्रेस नेता ने भाषण दिया था और एक वीडियो रिकॉर्डर जिसे चुनाव आयोग ने अपना भाषण रिकॉर्ड करने के लिये नियोजित किया था। लोकसभा चुनाव से पहले 13 अप्रैल 2019 को कोलार में रैली के दौरान अपने भाषण में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कथित तौर पर पूछा था कि नीरव मोदी , ललित मोदी , नरेंद्र मोदी ... . सभी चोरों का सामान्य सरनेम मोदी कैसे है ?
: मंहगाई और गाँव : दूबरे के दो आषाढ़ (आलेख : बादल सरोज)
Tue, Oct 26, 2021
? मुरैना जिले के बस्तौली गाँव के गयाराम सिंह धाकड़ को समझ ही नहीं आ रहा है कि सरसों के उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छे भाव मिलने के बाद भी उनका सारा बजट कैसे गड़बड़ा गया। खर्चे अभी भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं - कर्जा अभी भी नहीं अदा हो पा रहा है, जबकि उनकी हालत मूंग और चना पैदा करने वाले और समर्थन मूल्य तक नहीं पाने वाले अपने जैसे किसानो से पूरी तरह अलग है। उनकी दुविधा पूरे गाँव भर की दुविधा भर नहीं है, उनके जैसे सारे गाँवों की दुविधा है और इसका नाम है वास्तविक अर्थ में रुपये का अवमूल्यित हो जाना -- नकदी रकम की गड्डी का मोटा होना, लेकिन उसकी असली कीमत का क्षरण हो जाना। उसकी खरीदने की औकात का कम हो जाना।
? जैसे 1967 में भारत सरकार ने गेहूं का एमएसपी 76 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया था। दो क्विंटल से भी कम गेहूं बेचकर 102 रु. 50 पैसे में 10 ग्राम सोना खरीदा जा सकता था। आज एक क्विंटल गेंहू की एमएसपी 2015 रु. प्रति क्विंटल हो गयी है और 10 ग्राम सोना 48651 रूपये का आता है। मतलब 22 क्विंटल गेंहू की कीमत में उतना सोना आएगा जितना 1967 में 2 क्विंटल से भी कम में आ जाता था।
? किसान और उसकी समूची ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इसका वास्तविक मतलब है -- 54 वर्षों में उसकी उपज की कीमत का बजाय बढ़ने के 11 गुना कम हो जाना। भारत के गाँव हमेशा दोधारी तलवार से दो-चार हुए हैं : पूँजीवाद जिसे विकास कहता है, वह नहीं हुआ तो मारे गए ; विकास हुआ, तो बेदखल हुए और मारे गए।? महंगाई ने सबसे ज्यादा इसी किसान की पहली से ज्यादा झुकी कमर को तोड़ा है। बिजली की अस्तव्यस्त अराजक उपलब्धता के साथ उसकी बड़ी-चढ़ी दरों के बीच डीजल उसकी खेती के लिए बड़ा सहारा था। उसकी कीमतों के बारे में कोई भी बात पुरानी पड़ जायेगी, क्योंकि इन पंक्तियों के पढ़ने के बीच ही डीजल की कीमतें और ऊपर चढ़ जाने वाली हैं। इससे जुताई, बुआई, कटाई की लागत ही नहीं बढ़ती, बल्कि परिवहन और फसल की आवाजाही भी महंगी हो जाती है। रही-सही कसर खाद और बीज की आकाश छूती महंगी कीमतों ने पूरी कर दी है। घोषित कीमतों पर भी उनकी उपलब्धता न होने से कालाबाजारियों की पौबारह अलग से हुयी है। इस घटी आमदनी में बाकी महंगाई को यदि भूल भी जाएँ, तो सिर्फ दो ही खर्चों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी ने उसके होश उड़ा दिए हैं।? अर्थशास्त्रियों के मत में हर वर्ष सिर्फ बीमारी के इलाज में होने वाले खर्चे के चलते करीब 2 करोड़ भारतीय फिसल कर गरीबी रेखा के नीचे आ रहे हैं। इनमे बड़ा हिस्सा किसानों का है, जिनके लिए सामाजिक स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर अब सिर्फ आंगनबाड़ी या आशा कार्यकर्ता बचे हैं। यह ऐसा खर्च है, जिसे वह टाल नहीं सकता। दूसरा खर्च है शिक्षा का - इस टिप्पणी को लिखने से पहले दस अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिकं स्थिति वाले ग्रामीण संपर्कों के रैंडम सर्वे से यह पता चला कि बच्चों को शहर में पढ़ाने पर उन्हें जो खर्च करना पड़ता था, वह पिछली तीन वर्षों में ही ढाई गुना बढ़ गया है। इस तरह महँगाई उनका वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी खतरे में डाल रही है।? इस महँगाई के साथ एक विशेषता और है और वह यह कि यह उस समय आई है, जब कोरोना की दोनों लहरों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पहले से ही वेंटीलेटर पर लाया हुआ था।? भारत के ग्रामीण परिवारों की लगभग सार्वत्रिक विशिष्टता यह है कि उनमे से कम-से-कम एक, और कई मामलों में तो एक से ज्यादा परिजन या तो स्थायी रूप से बाहर काम करने जाते हैं या चार महीने अथवा आधा साल के लिए काम पर जाते हैं। उनकी यह नकद कमाई परिवार की जरूरतों की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा होती है। कोरोना लॉकडाउन में 4 करोड़ प्रवासी श्रमिकों की पाँव-पाँव घर वापसी दुनिया ने देखी है। इस दौर में 14 करोड़ रोजगारों के ख़त्म होने की बात खुद सरकार के आंकड़ों में स्वीकारी गयी है। बाजार की मंदी के चलते इनमें से आधे की भी बहाली नहीं हुयी है।? नतीजा यह निकला है कि पहले से ही अलाभकारी कृषि अब और बोझ उठाने के लिए विवश है। इसका घाटा भोजन की थाली को उठाना पड़ा है, जहां रोटी-दाल-भात की मात्रा खतरे के निशान से भी नीचे पहुँच गयी है। इसका एक चक्रीय प्रभाव यह है कि जब घर में नहीं होंगे दाने, तो किसान बाजार में क्या जाएगा भुनाने। लिहाजा बाजार संकुचित होगा - तो उसकी पूर्ति और ज्यादा दाम बढ़ाकर की जाएगी। मतलब ये कि दूबरे के दो आषाढ़ एक कभी नहीं होने वाले, तीन और चार जरूर हो जाएंगे।? हस्तशिल्प, काष्ठ और लौहकार्य की परम्परागत ग्रामीण अर्थव्यवस्था आधुनिक बाजार पहले ही हड़प चुका था। उपभोक्ता सामग्रियों की गाँव-टोले तक पहुँच ने बची-खुची स्वरोजगारिता को भी हड़प लिया।? भारत में आर्थिक कारण सिर्फ गुजर-बसर तक सीमित नहीं रहते। उनके सामाजिक असर भी होते हैं। इस महंगाई-उन्मुखी आर्थिक रास्ते का भी एक सामाजिक प्रोफाइल है। मानव सूचकांकों के हर मानक में आदिवासी बहुल गाँव लगातार पीछे जा रहे हैं। उस पर जंगल की जमीनों का कम्पनीकरण और जल तथा खनिज स्रोतों का कारपोरेटीकरण आदिवासियों को कोलम्बस काल के रेड इंडियंस में बदल रहा है। वहीँ दलितों की जमीन उनसे छिन रही हैं। मुरैना जिले के चमरगवां गाँव में 50 दलित परिवारों में से सिर्फ 5 के पास ही जमीन बची है - बाकी सब की धीरे धीरे छिन गयी। यही कहानी उन छोटी जोतों की है, जो अलाभकारी होने के चलते बेची जा रही हैं और कल तक जो उनके भूमि स्वामी थे, वे शहरी बेरोजगारों या ग्रामीण खेत मजदूरों की भीड़ में शामिल हो रहे हैं।? ठीक इन्ही हालात से उपजी मजबूरी है, जिसने लगातार जारी किसान आंदोलन को मजबूती प्रदान की है। इस जायज बात को भी न सुनने की सरकारी हठधर्मी से उपजी झुंझलाहट है, जो उसे 'मिशन उत्तरप्रदेश-उत्तराखण्ड' जैसे नारों तक ले जा रही है।*(लेखक पाक्षिक 'लोकजतन' के संपादक और अ. भा. किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 094250-06716)*
: अब अन्याय का समय खत्म हो चुका - अमित शाह
Sun, Oct 24, 2021
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टश्रीनगर - जम्मू-कश्मीर में विकास युग शुरू हो गया है। मैं जम्मू कश्मीर को आज ये कहने आया हूं कि जम्मू कश्मीर वालों के साथ अन्याय का समय खत्म हो चुका है। अब कोई आपके साथ अन्याय नहीं कर सकता , अब जम्मू कश्मीर का विकास होगा और ये प्रदेश , देश को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देगा।
उक्त बातें केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने जम्मू-कश्मीर दौरे के दूसरे दिन भगवती नगर जनसभा को संबोधित करते हुये कही। गृहमंत्री शाह के जनसभा स्थल पर पहुंचते ही भारत माता की जय के नारे लगने लगे। गृहमंत्री ने कहा कि शिक्षा किसी भी समाज और क्षेत्र की समृद्धि और विकास का मूल आधार है। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से आज जम्मू-कश्मीर शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जम्मू-कश्मीर के युवाओं की शिक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता रही है , आईंआईटी का ये नया कैंपस हमारे इसी संकल्प को दर्शाता है। दो सौ दस करोड़ की लागत से बने आईआईटी जम्मू के इस नये कैंपस में छात्रों की उच्च शिक्षा के साथ-साथ अच्छे छात्रावास , जिम , इंडोर गेम्स जैसी सभी सुविधायें उपलब्ध हैं। मैंने आज तक इतना आधुनिक कैंपस नहीं देखा। यह सेंटर छात्रों के लिये काफी मददगार सबित होगा , पूरे सेंटर में वाईफाई की सुविधा दी जायैगी। यह बहुआयामी अनुसंधान केंद्र को सप्तऋषि के नाम से जाना जायेगा। सप्तऋषि में अत्याधुनिक उपकरणों से युक्त सात प्रयोगशालायें चलायी जायेंगी।सेटेलाइट कैंपस खोलकर ज्यादा से ज्यादा जम्मू-कश्मीर के बच्चों को आईआईटी में एडमिशन दिलाने की कोशिश होगी। गृहमंत्री ने कहा कि पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही 55 हजार करोड़ का पैकेज जम्मू-कश्मीर को दिया। यह मोदी जी का शासन है , किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। शाह ने मोदी सरकार की योजनाओं का जिक्र करते हुये जम्मू-कश्मीर के सात हजार लोगों को नौकरी का अपॉइंटमेंट लेटर देने का ऐलान किया। वहीं प्रदेश में 12 हजार करोड़ रुपये का निवेश आने की जानकारी भी दी। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में सात नये मेडिकल कॉलेज शुरू करने की बात कही। वहीं उन्होंने उज्जवला योजना समेत मोदी सरकार के डेवलपमेंट प्लान का भी जिक्र किया। गृहमंत्री शाह ने कहा पीएम मोदी ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुये अनुच्छेद 370 और 35 ए को खत्म किया। पहले जम्मू में सिखों , खत्रियों , महाजनों को भूमि खरीदने का अधिकार नहीं था। जो शरणार्थी वहां से यहां आये थे , उनके अधिकार नहीं थे , वाल्मीकि , गुर्जर भाइयों के अधिकार नहीं थे। भारत के संविधान के सभी अधिकार अब मेरे इन भाइयों को मिलने वाले हैं।
गौरतलब है कि 05 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के बाद अमित शाह की यह पहली कश्मीर यात्रा है। गृहमंत्री शाह अपनी तीन दिवसीय यात्रा के दूसरे दिन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जम्मू में एक मल्टीडिसीप्लिनरी रिसर्च सेंटर के दो चरणों का उद्घाटन किये और केंद्र के तीसरे चरण की आधारशिला भी रखे। उन्होंने जम्मू के जीडीए ग्राउंड भगवती नगर में विकास परियोजना का उद्घाटन किया। इस दौरान उनके साथ केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और उपराज्पाल मनोज सिन्हा भी मौजूद रहे। गृहमंत्री के घाटी दौरे से पहले पूरे कश्मीर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। अधिकारियों ने बताया कि घाटी में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई है।