: इंकलाब से अमिताभ तक का सफर , आज जन्मदिन विशेष
Mon, Oct 11, 2021
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टमुम्बई - सदी के महानायक कहे जाने वाले और प्रसिद्ध बॉलीवुड कलाकार अमिताभ बच्चन आज अपना 79 वांँ जन्मदिन मना रहे हैं। आज जन्मदिन पर देश भर के बॉलीवुड , खेल जगत और राजनीतिक गलियारे से लेकर प्रशंसक सभी अपने-अपने तरीके से महानायक को बधाई दिया जिनकी महानायक ने आभार व्यक्त किया है। दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन के बंगले के बाहर फैंस बिग बी को विश करने के लिये असंख्य लोग इकट्ठा हुये , सभी एक-साथ मिलकर अमिताभ के जन्मदिन के मौके पर जलसा के बाहर जश्न मनाते दिखायी दिये। वहीं , अपने जन्मदिन के मौके पर अमिताभ बच्चन हर साल की तरह इस बार भी अपने घर ‘जलसा’ के बाहर आये और बाहर मौजूद लोगों का अभिवादन भी किया। बाहर खड़े लोगों ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी और उनकी जय-जयकार भी की। फैंस के चेहरे पर काफी खुशी दी और लोग तालियां बजाते हुये नजर आये। अपने जन्मदिन के मौके पर उन्होंने एक बड़ा फैसला लेते हुये पान मसाला कंपनी 'कमला पसंद' से अपनी डील तोड़ दी है। बता दें हाल ही में अमिताभ बच्चन को पान मसाला के विज्ञापन करने के लिये आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था , इसे लेकर बिग बी ने अपने ऑफिस का बयान भी अपने ब्लॉग में शेयर किया है। ये कई दशकों से पर्दे पर अपने दमदार अभिनय के चलते करोड़ों लोगों के दिलों में बसे हुये हैं। इनका जन्म 11 अक्टूबर 1942 को इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। अमिताभ प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन के सुपुत्र हैं , इनकी माँ तेजी बच्चन कराची से थी। बचपन में इनकी माँ इन्हें मुन्ना कहकर बुलाती थी , शुरू में इनका नाम इंकलाब रखा गया था।चूकि इनके पिता हरिवंश राय बच्चन स्वयं एक बड़े कवि रहे , इसलिये इनके घर इलाहाबाद में कवियों की महफिल जमती थी। एक बार ऐसे ही प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत इनके घर आये। उन्होंने अमिताभ को देखकर पूछा – बेटा तुम्हारा क्या नाम है ? अमिताभ ने जवाब दिया – इंकलाब। कवि पंत इस नाम से खुश नही हुये और उन्होंने इनका नाम अमिताभ रखा। ये अपनी जिंदगी में एक्टर नही बल्कि इंजीनियर बनना चाहते थे , साथ ही एयरफोर्स में भी जाने का उनका सपना था। फिल्मी कैरियर की शुरुआत में इन्हें बारह फ्लाप फिल्में झेलनी पड़ी थी। उनकी भारी भरकम आवाज की वजह से आल इंडिया रेडियो ने भी इनको रिजेक्ट कर दिया था। हालाकि इसके बाद इन्होंने फिल्म जंजीर से बालीवुड में अपनी अलग ही पहचान बना ली। इस फिल्म के बाद इन्होंने कभी पीछे मुड़कर नही देखा और लगातार नये कीर्तिमान स्थापित करते हुये बालीवुड के शहँशाह बन गये। इनकी फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत इनके डायलॉग हुआ करते है। आज भी इनके कई डायलॉग इनके प्रशंसकों के जीवनशैली का हिस्सा बन चुके हैं।
अमिताभ की पहली 07 नवंबर 1969 में रिजी हुई थी जिसका नाम 'सात हिंदुस्तानी' था। यह फिल्म ख्वाजा अहमद अब्बास ने डायरेक्ट की थी। फिल्म में गोवा को पुर्तगाल शासन से मुक्त कराने की सात हिंदुस्तानियों की कहानी है। इस फिल्म के लिए अमिताभ को पांच हजार रुपये मिले थे। हालांकि यह फिल्म उस वक्त बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाल नहीं कर सकी थी।
इन्होंने लोकप्रियका 1970 के दशक के दौरान प्राप्त की और धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा के इतिहास में इनका नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। वे पिछले पांच दशकों से हिंदी फिल्मों में सक्रिय हैं। उन्होंने 200 से ज्यादा फिल्में की हैं। अपने अभिनय करियर में अनगिनत पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं। उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से लेकर पद्मश्री और पद्मभूषण तक का सर्वोच्च सम्मान मिल चुका है। तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और सोलह बार फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाले अमिताभ बच्चन सिर्फ एक्टर ही नहीं बल्कि प्लेबैक सिंगर और फिल्म प्रोड्यूसर भी हैं। उन्होंने बड़े पर्दे के साथ ही छोटे पर्दे पर भी अपनी उपस्थिति से दर्शकों के दिलों में राज किया है। फिल्मों में उनके योगदान को देखते हुये वर्ष 2015 में फ्रांस की सरकार ने भी उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान नाइट ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया। इनकी बेहतरीन फिल्मों में शोले , दीवार , कालिया ,अग्निपथ , निशब्द , बंटी और बबली इत्यादि का नाम लिया जाता है। पांँच दशक के अपने लंबे फिल्मी सफर के दौरान अमिताभ बच्चन ने एक्शन , कॉमेडी , थ्रिलर , हॉरर और ना जाने कितनी ही तरह की जॉनर की फिल्मों में काम किया लेकिन बिग बी का एंग्री यंग मैन वाला किरदार उनके फैंस को सबसे ज्यादा अनमोल है। ‘शोले’ से लेकर ‘दीवार’ और ‘कालिया’ तक में अमिताभ ने जिस एंग्री यंग मैन के किरदार को निभाया वो आज भी याद किया जाता है। उन्होंने अपना नाम सार्थक कर दिया है। अमिताभ शब्द का अर्थ होता है ‘अत्यंत तेजस्वी’ और उनका नाम सार्थक भी है क्योंकि अपनी तेजस्विता से उन्होंने पूरे कला जगत को गौरवान्वित किया है। सदी के महानायक एक बहुभाषी अनटाइटल्ड फिल्म में दीपिका व प्रभास के साथ नजर आयेंगे , यह फिल्म 2022 में रिलीज होगी। इसके अलावा अमिताभ बच्चन आगामी फिल्म ‘झुंड’ , ‘चेहरे’ और ‘ब्रह्मास्त्र’ में नजर आने वाले हैं। अमिताभ बच्चन के ऊपर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं , जिनमें अमिताभ बच्चन : द लिजेंड 1999 में, टू बी ऑ नॉट टू बी: अमिताभ बच्चन 2004 में लिखी गई थी। एबी: द लिजेंड ( ए फोटोग्राफर्स ट्रिब्यूट) 2006 में लिखी गई है। साल 2007 में लुकिंग फॉर द बिग बी: बॉलीवुड, बच्चन एंड मी 2007 और बच्चनानिया 2009 में प्रकाशित हुई है।चुनाव में हासिल की रिकार्ड जीतफिल्मों के साथ ही राजनीति में भी केरियर आजमाने वाले अमिताभ भले ही पॉलिटिक्स में ज्यादा वक्त नहीं रह पाये हों, लेकिन आठवीं लोकसभा चुनाव में अपने गृह क्षेत्र इलाहाबाद की सीट से उन्होंने यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री एचएन बहुगुणा को हराया जरूर था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को सियासत में जमने के लिये अपनों की जरूरत महसूस हुई। ऐसे में उन्होंने अपने करीबी दोस्त अभिनेता अमिताभ बच्चन को चुनाव लडऩे के लिये कहा। अमिताभ को इंदिरा अपने बेटे समान मानती थीं। अमिताभ ने राजीव का आग्रह मान लिया और तय हुआ कि अमिताभ इलाहाबाद से उस वक्त के दिग्गज नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा को चुनौती देंगे। ये वही बहुगुणा थे जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे और केंद्र में कद्दावर मंत्री। इंदिरा गांधी से अनबन के बाद इन्होने कांग्रेस छोड़ दी थी। इस चुनाव में बहुगुणा और उनके समर्थकों ने अमिताभ बच्चन पर खूब तंज कसे थे। बहुगुणा ने कहा था कि ये नाचने -गाने वाले हैं (अमित-जया ) चार दिन बाद मुंबई लौट जायेंगे। इस पर जब मीडिया ने अमिताभ और जया से सवाल पूछे तो उनकी प्रतिक्रिया थी -बहुगुणा जी हमसे बड़े हैं , उनकी बात पर हम कुछ नहीं कह सकते। लेकिन इसी चुनाव में अमिताभ बच्चन ने हेमवती नंदन बहुगुणा को हजार दो हजार नहीं बल्कि एक लाख सतासी हजार वोटों के अंतर से हराया। इस हार के बाद बहुगुणा सियासत से ही संन्यास ले लिये थे।इतिहास में दर्ज किस वोटइस चुनाव की एक और खास बात थी , मतगणना के दौरान दिलचस्प कारणों से अमिताभ बच्चन के चार हज़ार वोट रद्द हो गये। इन वोटों पर लिपिस्टिक से से किस मार्क (चुम्बन चिन्ह) बने हुये थे। दरअसल ये अमिताभ की फैन्स महिलाओं /लड़कियों के वोट थे जिन्होंने मतपत्र पर मुहर के बजाये किस मार्क लगाकर वोट डाला था। एक शख्स के प्रति लगाव का ऐसा उदाहरण आज तक कोई दूसरा नहीं आया है। हालांकि ये दीगर बात है कि अमिताभ बच्चन ने वो कार्यकाल पूरा नहीं किया और वर्ष 1988 में सांसदी छोड़ दी थी। लेकिन उनके ये किस वोट इतिहास में दर्ज जरूर हो गये।
: प्रेम और वात्सल्य की प्रतीक है स्कन्दमाता - अरविन्द तिवारी
Sun, Oct 10, 2021
नई दिल्ली -- नवरात्रि के पांँचवे दिन आज माँ दुर्गा के पांँचवे स्वरुप स्कन्दमाता की पूजा-आराधना- उपासना की जाती है। स्कन्दमाता की पूजा करने से साधन , ध्यान और उपासना में सफलता प्राप्त होती है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी है। स्कन्दमाता सूर्य मंडल की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। इसलिये स्कंदमाता की उपासना करने वाले साधक सदा तेजस्वी और निरोगी रहते हैं। इनकी कृपा से बुद्धि का विकास , ज्ञान का आशीर्वाद और समस्त व्याधियों का अंत हो जाता है। आज के दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। माना जाता है कि मांँ स्कन्दमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छायें पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिये मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कन्दमाता की उपासना से बालरूप स्कन्द भगवान की उपासना भी स्वयमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है , अत: साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये। आज माँ को चम्पा के पुष्प के साथ साथ श्रृंगार में हरे रंग की चूड़ियाँ अर्पित करें। बता दें कालिदास द्वारा रचित रघुवंश महाकाव्यम् और मेघदूत रचनायें स्कन्दमाता की कृपा से ही स़ंभव हुई है।स्कन्दमाता नाम क्यों पड़ा ?स्कन्दमाता ममता की मूर्ति प्रेम और वात्सल्य की प्रतीक साक्षात दुर्गा का स्वरूप मानी जाती हैं। पार्वती और शिव के पुत्र है स्कन्द(कार्तिकेय) जो प्रसिद्ध देव असुर संग्राम मे सेनापति बने थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार इन्हें कुमार और शक्ति कहा गया है। माता पार्वती ने जब कार्तिकेय को जन्म दिया तब से वह स्कन्दमाता हो गयी। यह भी मान्यता है कि मां दुर्गा ने बाणासुर के वध के लिये अपने तेज से छह मुख वाले सनतकुमार को जन्म दिया , जिनको स्कन्द भी कहते हैं। इन्ही स्कन्द यानि कार्तिकेय की माता होने के कारण ही इन्हे माँ के पाँचवाँ स्वरूप स्कन्दमाता कहा गया है।
यह सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं इसलिये इनके चारों ओर सूर्य सदृश अलौकिक तेजोमय मंडल सा दिखाई देता है।नि:संतानों को देती हैं संतानऐसी मान्यता है कि जिन लोगों को संतान की चाहत होती है उन्हें सच्चे मन से स्कन्दमाता की आराधना करनी चाहिये। कहते हैं कि उनकी उपासना करने से नि:संतानों को भी शीघ्र ही संतान की प्राप्ति होती है। जिन व्यक्तियों को संतानाभाव हो वे माता की पूजन-अर्चन तथा अत्यंत सरल मंत्र ‘।।ॐ स्कन्दमात्रै नम:।।’ का जाप कर लाभ उठा सकते हैं। शेर पर सवार स्कन्द माता का वाहन मयूर भी है। इनकी पूजा केसर युक्त चंदन व सफेद वस्त्र से करते हैं। विभिन्न आभूषणों के अलंकार चढ़ाने से मां प्रसन्न होती हैं और लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। पंचमी तिथि के दिन पूजा करके भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिये।एकाग्रता की देती है सीखस्कन्दमाता हमें सिखाती है कि जीवन स्वयं ही अच्छे-बुरे के बीच एक देवासुर संग्राम है व हम स्वयं अपने सेनापति हैं। हमें सैन्य संचालन की शक्ति मिलती रहे इसलिये मां स्कन्दमाता की पूजा-आराधना करनी चाहिये। इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिये जिससे कि ध्यान , चित्त् और वृत्ति एकाग्र हो सके। यह शक्ति परम शांति व सुख का अनुभव कराती है। कहते हैं कि स्कन्दमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस वजह से इनका उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाता है। मन को एकाग्र रखकर और शुद्ध रखकर स्कंदमाता की आराधना करने वाले भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती हैं। विधि विधान से पूजा कर स्कन्दमाता को प्रसन्न करने से शत्रु आपको पराजित नहीं कर पाते हैं। इनकी कृपा से व्यक्ति जीवन – मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।स्कंदमाता की कथाप्राचीन कथा के अनुसार तारकासुर नामक राक्षस ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिये कठोर तपस्या कर रहा था। उस कठोर तप से ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर उनके सामने आये। ब्रह्मा जी से वरदान मांगते हुये तारकासुर ने अमर करने के लिये कहा। तब ब्रह्मा जी ने उसे समझाया कि इस धरती पर जिसने भी जन्म लिया है उसे मरना ही है। निराश होकर उसने ब्रह्मा जी कहा कि प्रभु ऐसा कर दें कि भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही उसकी मृत्यु हो। तारकासुर की ऐसी धारणा थी कि भगवान शिव कभी विवाह नहीं करेंगे , इसलिये उसकी कभी मृत्यु नहीं होगी। फिर उसने लोगों पर हिंसा करनी शुरू कर दी। तारकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और तारकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। तब शिव ने पार्वती से विवाह किया और कार्तिकेय के पिता बनें। तब मांँ पार्वती ने अपने पुत्र भगवान स्कन्द (कार्तिकेय का दूसरा नाम) को युद्ध के लिये प्रशिक्षित करने हेतु स्कन्द माता का रूप लिया और उन्होंने भगवान स्कन्द को युद्ध के लिये प्रशिक्षित किया था। स्कंदमाता से युद्ध प्रशिक्षिण लेने के पश्चात् भगवान स्कन्द ने तारकासुर का वध किया।स्कंदमाता का स्वरुपस्कन्दमाता (चतुर्भूज) चार भुजाओं वाली हैं। ये अपने दो हाथों मे कमल पुष्प धारण की हुई हैं।और अपने तीसरे हाथ मे कुमार स्कन्द (कार्तिकेय) को सहारा देकर बैठायी हैं। इनका चौथा हाँथ भक्तों के कल्याण के लिये है अर्थात वरमुद्रा में है। माँ अपने इस स्वरुप मे पूर्णत: ममतामयी हैं। देवी स्कंदमाता ही पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती हैं।इन्हे शिव की पत्नी होने के कारण मातेश्वरी कहा गया तथा इनके गौर वर्ण के कारण इन्हे देवी गौरी कहा गया है। माँ का वर्ण पूर्णत: शुभ्र है और कमल पर विराजमान रहती हैं इसलिये इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। स्कन्दमाता का वाहन सिंह है।स्कंदमाता सदैव ही अपने भक्तो के लिये कल्याणकारी हैं। इनकी उपासना से भक्त की समस्त इच्छायें पूर्ण हो जाती है।स्कंदमाता का मन्त्र -प्रत्येक सर्वसाधारण के लिये आराधना योग्य निम्न श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिये आज नवरात्रि के पाँचवें दिन इसका जाप करना चाहिये।
- सिंहासन गता नित्यं पद्माश्रितकर्द्वया
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता याशश्विनी ॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
— हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे आपको मेरा बार – बार प्रणाम है।
माँ दुर्गा के सामने दीप प्रज्वलित कर षोडशोपचार पूजन करने के बाद इस मन्त्र के साथ “ऊँ स्कंदमात्रै नम:” का जप अवश्य करना चाहिये तब भगवान स्कंद ( कार्तिकेय) सहित माता की कृपा प्राप्त होगी। मांँ को केले का भोग अति प्रिय है ,इन्हें केसर डालकर खीर का प्रसाद भी चढ़ाना चाहिये।स्कन्दमाता का ध्यानवन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
: दैत्यों के संहार हेतु प्रगटी मां चंद्रघंटा – अरविन्द तिवारी
Sat, Oct 9, 2021
नई दिल्ली - दैत्यों के संहार एवं धर्म की रक्षा और संसार से अंधकार मिटाने के लिये माँ दुर्गा अपनी तीसरी शक्ति चंद्रघंटा के रूप में प्रकट हुई , दुर्गा मांँ की तीसरी शक्ति का नाम ही चंद्रघंटा है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि आज नवरात्रि के तीसरे दिन इसी देवी की पूजा आराधना की जाती है। इसका शस्त्र कमल है और सवारी सिंह है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है इसका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिये कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र होने के कारण इसे चंद्रघंटा कहा गया है। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है इनके आठ हाथों में खड्ग , कमल , धनुष , बाण , तलवार , त्रिशूल , गदा आदि विभिन्न प्रकार के शस्त्र सुशोभित रहते हैं और दो हाथों से मां अपने भक्तों को चिरायु , आरोग्य और सुख संपदा का आशीर्वाद देती हैं। इनका यह स्वरूप परम शक्तिदायी और तेजपूर्ण है। इनके कंठ में श्वेत पुष्प की माला और शीर्ष पर रत्नजड़ित मुकुट विराजमान है। इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है। तीसरे दिन देवी की उपासना आराधना भयमुक्ति और साहस की ओर ले जाता है। मांँ तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती है और ज्योतिष में इनका संबंध मंगल ग्रह से है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिये उद्यत रहने की होती है। मन कर्म और वचन के साथ समर्पणता से विधि विधान के अनुसार परिशुद्ध पवित्र होकर चंद्रघंटा देवी की उपासना आराधना करने से मनुष्य सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद का अधिकारी बन सकता है। इनकी कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधायें विनष्ट हो जाती हैं।इनकी आराधना फलदायी है। इनके उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिये इस घंटे की ध्वनि निनादित ह़ो उठती है। इनकी आराधना से संसार में यश , कीर्ति एवं सम्मान प्राप्त होता है। मां चंद्रघंटा की पूजा लाल वस्त्र धारण करके करना श्रेष्ठ होता है। मां को लाल पुष्प , रक्त चन्दन और लाल चुनरी समर्पित करना उत्तम होता है। हर देवी के हर स्वरूप की पूजा में एक अलग प्रकार का भोग चढ़ाया जाता है। कहते हैं भोग देवी मां के प्रति आपके समर्पण का भाव दर्शाता है। मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई या लाल सेव का भोग लगाना चाहिये। जब आप मां को भोग चढ़ायें और मंत्रों का जाप करें तो घंटी जरूर बजायें। मान्यता है कि मां चंद्रघंटा के घंटे की ध्वनि से अत्याचारी , दानव , दैत्य डरते हैं। धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि मां चंद्रघंटा की उपासना से भक्तों में वीरता और निर्भीकता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। इनकी उपासना साधक को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति प्रदान करती है। कहा जाता है कि माता चंद्रघंटा की साधना कर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले उपासक को संसार में यश, कीर्ति, सम्मान और मोक्ष मिलता है।चंद्रघंटा देवी के मंत्र –देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।
— प्रचण्ड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि तुम्हारी जय हो! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो , माँ दुर्गा के तृतीय रूप चंद्रघण्टा को बारंबार प्रणाम है।
या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थात् हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ ! मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।मां चंद्रघंटा की कथा -पौराणिक काल में एक बार देव-असुर संग्राम बहुत लम्बे समय तक चला। उस समय असुरों का स्वामी और सेनापति महिषासुर था। महिषासुर ने इंद्र आदि देवताओं को पराजित कर स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा कर स्वर्ग का राजा बन गया। युद्ध में हारने के बाद सभी देवता इस समस्या के निदान के लिये त्रिदेवों के पास गये। देवताओं ने भगवन विष्णु , महादेव और ब्रह्मा जी को बताया कि महिषासुर ने इंद्र , चंद्र , सूर्य , वायु और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिये हैं और उन्हे बंदी बनाकर स्वर्ग लोक पर कब्जा कर लिया है। देवताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्याचार के कारण देवताओं को धरती पर निवास करना पड़ रहा है। देवताओं की बात सुनकर त्रिदेवों को अत्याधिक क्रोध आ गया और उनके मुख से ऊर्जा उत्पन्न होने लगी। इसके बाद यह ऊर्जा दशों दिशाओं में जाकर फैल गई , उसी समय वहां पर एक देवी चंद्रघंटा ने अवतार लिया। भगवान शिव ने देवी को त्रिशुल , विष्णु जी ने चक्र दिया। इसी तरह अन्य देवताओं ने भी मां चंद्रघंटा को अस्त्र शस्त्र प्रदान किये। इंद्र ने मां को अपना वज्र और घंटा प्रदान किया , भगवान सूर्य ने मां को तेज और तलवार दिये। इसके बाद मां चंद्रघंटा को सवारी के लिये शेर भी दिय गया। मां अपने अस्त्र शस्त्र लेकर महिषासुर से युद्ध करने के लिये निकल पड़ीं। मां चंद्रघंटा का रूप इतना विशालकाय था कि उनके इस स्वरूप को देखकर महिषासुर अत्यंत ही डर गया। उन्होंने अपने असुरों को मां चंद्रघंटा पर आक्रमण करने के लिये कहा। सभी राक्षस युद्ध करने के लिये मैदान में उतर गये। मां चंद्रघंटा ने महिषासुर के सभी बड़े राक्षसों को मारकर अंत में महिषासुर का भी अंत कर दिया। इस तरह मां चंद्रघंटा ने देवताओं की रक्षा की और उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति करायी।