: पुरखों को गोद लेने की चतुराई वंश बेल बताने नहीं, विषबेल फैलाने के लिए है (आलेख : बादल सरोज)
Thu, Oct 7, 2021
दुनिया भर में वंश चलाने के लिए वारिस गोद लेने का रिवाज है। जो संतानहीन होते हैं या स्वयं की संतान को जन्मने के झंझट से बचना चाहते हैं, वे वारिस को गोद ले लेते हैं। मगर ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा और उसका मातृ-पितृ संगठन, दुनिया का सबसे बड़ा "स्वयं-सेवा-भावी" आरएसएस सबसे अलग है। वे पुरखे गोद लेते हैं या यूं भी कह सकते हैं कि दूसरों के पुरखों को उठाकर खुद को उनकी गोद में बिठाने की, अमूमन असफल, कोशिश करते है, क्योंकि इनकी खुद की जन्मना त्रासदी यह है कि इनके पास एक भी बंदा ऐसा नहीं है, जिस पर ये गर्व करके कह सकें कि ये इनकी निरंतरता में हैं ।इनकी दरिद्रता आनुवंशिक है। कोई 5 हजार वर्ष की भारत की समृद्ध वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परम्परा में मनु को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं है, जिसके साथ ये अपना नाभि-नाल का संबंध बताते हों या बता सकें। यहां तक कि वे सावरकर भी नहीं, जिन्हें वे उनके निधन के बाद से सर पर बिठाये घूम रहे हैं। सावरकर का लिखा-कहा गवाह है कि जब तक - 1966 तक - वे जीवित रहे, तब तक आरएसएस को गरियाते रहे, उसका मखौल उड़ाते रहे। जिन विवेकानन्द की तस्वीरों से यह कुनबा अपने दफ्तर-वफ्तर सजाता है, वे तो पूरी तरह इनकी धारणाओं के विलोम और विरूद्ध दोनों हैं। कुनबे की अतिरिक्त समस्या यह है कि इनके विचार और संगठन शैली के जो असली अग्रज और जेनुइन कुलगुरु हैं, जिनसे प्रेरणा लेने की बात इनके सह-आदिपुरुष डॉ मुंजे स्वीकार भी चुके हैं, उन हिटलर और मुसोलिनी का उल्लेख करने की हिम्मत - कम-से-कम फिलहाल - इनमें है नहीं। ऐसे में इतिहास में सेंध लगाकर किसी स्थापित व्यक्तित्व को उड़ाकर, रंग-पोत कर उसे हड़पने के सिवा कोई चारा ही नहीं बचता।इस कड़ी में इनके ताजातरीन "पुरखे" हैं राजा महेंद्र प्रताप सिंह ; वही अनूठे स्वतन्त्रता सेनानी, जो महज 28 साल की उम्र में 1 दिसंबर 2015 को काबुल में स्थापित हुयी भारत की पहली निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति बने थे। भोपाल के मौलाना बरकतुल्लाह उनके प्रधानमंत्री थे। इनके अलावा देवबन्द के मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी गृहमंत्री, देवबन्द के ही मौलाना बशीर युद्ध मंत्री तथा तमिलनाडु के चेम्पक रामन पिल्लै विदेश मंत्री थे। वही राजा महेन्द्रप्रताप, जो अपनी इस पूरी कैबिनेट के साथ उस समय ताजा-ताजा हुयी रूस की क्रान्ति को देखने न सिर्फ वहां गए, बल्कि लेनिन से भी मुलाक़ात की। अंग्रेजी राज से भारत की मुक्ति की लड़ाई की गाँठ सोवियत कम्युनिस्ट क्रान्ति और दुनिया के सारे उपनिवेशों के मुक्ति संग्राम के साथ बाँधी। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने खुद को कभी जाट राजा या जाट नहीं कहा, बल्कि खुद को खालिस हिन्दुस्तानी बनाए रखने के लिए अपना नाम ही ‘पीटर पीर प्रताप’ रख लिया था। इसी नाम से उन्होने एक किताब भी लिखी थी। मुड़सान के इस राजा की खासियत यह थी कि वे जहां भी जाते थे, उनका एक मुस्लिम और एक दलित (वाल्मीकि) साथी उनके साथ रहता था। इस तरह जीवन भर जो जाति और सम्प्रदाय की पहचान से दूर रहे, किसान आंदोलन से डरे मोदी और उनकी भाजपा अब उन्हें हिन्दू जाट राजा साबित करना चाहती है। सर सैयद अहमद खान के जिस मोहम्मडन एंग्लो कालेज में उनकी तालीम हुयी, जो बाद में अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी बनी, जिसकी तामीर के लिए राजा महेंद्र प्रताप ने जमीन और नकदी दोनों दी ; उसी के खिलाफ अपना प्रतीक चिन्ह बनाकर खड़ा करना चाहती है।इससे एक बार फिर साफ़ हो जाता है कि इनका मकसद वंश-बेल ढूंढना नहीं, विष-बेल रोपना है। पुरखों को गोद लेने की इस प्रवृत्ति के पीछे भी मंशा वंश बेल बढ़ाने की नहीं, इन इतिहास-व्यक्तित्वों की ऊंची छवियों पर टांगकर विष बेल को आगे बढ़ाने की है। अब 1957 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी की जमानत जब्त कराकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीते राजा महेंद्र प्रताप को सच्ची में याद ही करना था, तो उनकी पूर्व रियासत मुड़सान या जिला मुख्यालय हाथरस में कुछ किया जा सकता था - मगर इसके लिए अलीगढ़ चुना गया, ताकि स्वतन्त्रता संग्राम की इस असाधारण शख्सियत को भी ध्रुवीकरण का मोहरा बनाया जा सके। महेन्द्र प्रताप के प्रति इनका आदरभाव कितना था, यह भी उसी दिन सामने आ गया था जिस दिन मोदी और योगी ने उन्हें जाट बताकर यूनिवर्सिटी का जलसा किया ; उस दिन भी अलीगढ से चंद किलोमीटर के फासले पर मुड़सान के किले में लगी राजा की मूर्ति के इर्द-गिर्द सफाई तक नहीं कराई गई थी।इस सारी धूर्ततापूर्ण कवायद के पीछे इनके या उनके प्रति अचानक उमड़ पड़ी निष्ठा या श्रद्धा नहीं है, निगाह विभाजन के लिए उनका इस्तेमाल कर, जैसे भी हो वैसे, चुनाव जीतने पर है। इसके दूरगामी नतीजों में इंडिया दैट इज भारत के नागरिकों की एकता अगर टूटती है तो टूटे ; अपना काम बनता, भाड़ में जाए देश की एकता और उसकी जनता!पिछले चुनाव में राजभर वोटों के लिए वे राजा सुहेल देव को ढूंढ कर लाये थे। राजा सुहेलदेव को मोदी-योगी सरकार राजा सुहेलदेव राजभर के तौर पर प्रचारित कर रही है, जबकि इससे पहले उन्हें राजा सुहेलदेव पासी के तौर पर भी ख़ूब प्रचारित किया गया। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो राजा सुहेलदेव को राजपूत समाज का मानते हैं। ठीक इसी तर्ज पर अब राजा मिहिर भोज को लेकर आया जा रहा है। इन दिनों इन्हें लेकर दिल्ली की करीबी दादरी से मुरैना होते हुए ग्वालियर तक रार ठनी हुयी है। मिहिर भोज की मूर्तियों के आगे उनका नाम लिखे जाने को लेकर तलवारें खिंची हुयी हैं। गूजर नेता कह रहे हैं कि ठाकुरों ने उनके बैनर फाड़ दिये, ठाकुर नेता कह रहे हैं कि गूजरों ने उनकी बसें फोड़ दी। टकराव के केंद्र में 8वीं सदी से 11वीं सदी तक उस वक़्त के देश के बड़े भूभाग पर राज करने वाले गुर्जर-प्रतिहार वंश के, अपने बाप को मारकर राजा बने मिहिर भोज हैं, जिन्होंने कोई आधी शताब्दी तक राज किया था और नर्मदा किनारे आखिरी साँस ली। हालिया पंगा यह है कि ठाकुर उन्हें ठाकुर मानते हैं और गुर्जर उन्हें गुर्जर ; सो रार मची है!! रार भी ऐसी वैसी नहीं है - इत्ती कर्री है कि एक जिले से लगी धारा 144 बाकी जिलों में फैलती जा रही है। दोनों ही तरफ से खाई चौड़ी करने वाले, हरेक जाति, समुदाय, गोत्र को एक-एक मूर्ति, एक-एक खम्भा थमाकर आपस में लड़ाने की शकुनि विधा में पारंगत वही लोग हैं जो सिंधुघाटी के जमाने से अब तक जम्बूद्वीपे भारतखण्डे में जो भी बना है, उस सब को बेच-बाच कर हिन्दुत्व पर आधारित हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। इसी तरह की एक पुड़िया हाल ही में योगी ने गोरखपुर के एक समुदाय, कुर्मी-सैंथवार, को पकड़ा दी है। उन्हें क्षत्रिय बता दिया है और उनकी लामबन्दियाँ शुरू कर दी हैं।अलग-अलग जातियों को एक दुसरे के खिलाफ खड़ा करने की यही चतुराई यह कुनबा पहले हरियाणा में 35 बनाम 1 के नाम पर जाट विरुद्ध अन्य के रूप में और उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में जाटव विरुद्ध बाकी दलित और यादव विरुद्ध बाकी ओबीसी के नाम पर आजमा चुका है। अब उत्तरप्रदेश में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर वह है भी और नहीं भी है - टू बी ऑर नॉट टू बी - की शेक्सपीरियन उक्ति के स्वरुप में लेकर आया है। काफी पहले 2014 में ही आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत भाजपा प्रवक्ता डॉ. विजय सोनकर शास्त्री द्वारा लिखी हिंदू चर्मकार जाति, हिंदू वाल्मीकि जाति व हिंदू खटीक जाति का संघी "इतिहास" बताने वाली तीन पुस्तकों का विमोचन कर एक नयी परियोजना की शुरुआत कर चुके हैं ; जिसका बीज सूत्र जोड़ना नहीं, अपनी-अपनी किताब लेकर, अपने-अपने छोटे-बड़े देवता और भगवान् की तस्वीरें उठाये स्वयं की श्रेष्ठता के उन्माद में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े करना है।सुकून की बात है कि देश के मेहनतकशों ने इस साजिश को समझना शुरू कर दिया है। मुज़फ्फरनगर में 5 सितम्बर को हुयी "किसान मजदूर महापंचायत" के 27 सितम्बर के भारत बंद के आव्हान को जिस तरह की जबरदस्त सफलता मिली है, वह विभाजन की इस चकरघिन्नी को थामने की दिशा तक जाएगी और इसी महापंचायत के आव्हान मिशन उत्तरप्रदेश - मिशन उत्तराखण्ड में कुछ महीनों बाद दोनों प्रदेशों को भाजपा राज से मुक्त करायेगी। जाहिर है कि उसके बाद संघर्ष आगे ही बढ़ेगा और जरूरत नहीं कि अभिशाप से मुक्त कराने के लिए 2024 तक इन्तजार करना पड़े।*(लेखक पाक्षिक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 094250-06716)*
: मोक्षदायिनी है सर्वपितृ अमावस्या - अरविन्द तिवारी
Wed, Oct 6, 2021
नई दिल्ली - सनातन धर्म में पितृपक्ष (श्राद्ध) का विशेष महत्व है ,आज इस वर्ष के पितृपक्ष का अंतिम दिवस है जिसे सर्वपितृ अमावस्या , आश्विन अमावस्या , बड़मावस , दर्श अमावस्या , महालया अमावस्या या मोक्षदायिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष के आखिरी दिन पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या को पितृ पक्ष के विसर्जन का दिन माना जाता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि पितृपक्ष के आखिरी दिन पड़ने वाली इस अमावस्या तिथि पर पिंडदान , श्राद्ध , व पितरों के निमित्त दान करने का खास महत्व होता है। आश्विन मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध करके पितरों को विधिपूर्वक विदाई देने की भी परंपरा है। इस दिन तर्पण , श्राद्ध और पिंडदान आदि का विशेष महत्व होता है। इस दिन पितरों के नाम से तर्पण व दान करने से पितर प्रसन्न होते हैं व अपना आशीर्वाद देते हैं।
इसलिये इस दिन को सर्वपितृ विसर्जन अमावस्या श्राद्ध भी कहा जाता है। इसके दूसरे दिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्र का प्रारंभ हो जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार पितृपक्ष में पितर धरती पर विचरण करते हैं , अगर पितरों का श्राद्ध ना किया जाये तो उनकी आत्मा पृथ्वी पर भटकती रहती है। जिसके प्रभाव से घर-परिवार के लोगों को भी आये दिन दु:ख-तकलीफ का सामना करना पड़ता है। इसलिये बहुत जरूरी है कि अगर आप पितरों की पुण्य तिथि भूल चुके हैं तो इस तिथि पर उनका श्राद्ध अवश्य ही कर दें।मान्यताओं के अनुसार इस दिन वे लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं जिनकी मृत्यु किसी महीने की अमावस्या तिथि को हुई हो या जिन्हें अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि आदि के बारे में जानकारी नहीं होती। इस दिन हर कोई अपने पूर्वजों का श्राद्ध व पितृ तर्पण कर सकता है इसलिये इस अमावस्या को बहुत खास माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्राद्ध किये जाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।ग्यारह साल बाद बन रहा है गजछाया योगइस बार की सर्वपितृ अमावस्या पर बेहद शुभ गजछाया योग बन रहा है। इससे पहले ये योग 11 साल पहले वर्ष 2010 में बना था जबकि आज के बाद पुन: यह योग आठ साल बाद यानि वर्ष 2029 में बनेगा। आज सूर्य और चंद्रमा दोनों ही सूर्योदय से लेकर शाम तक हस्त नक्षत्र में होंगे , यही स्थिति गजछाया योग बनाती है। धर्म-शास्त्रों के मुताबिक इस योग में श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और कर्ज से मुक्ति मिलती है , साथ ही घर में सुख-समृद्धि आती है। कहते हैं कि गजछाया योग में किये गये श्राद्ध और दान से पितरों की अगले बारह वर्षों के लिये क्षुधा शांत हो जाती है। धर्मशास्त्रों में इस अमावस्या पर की जाने वाली पूजा सभी कष्टों को दूर करने वाली भी बतायी गई है। इस दिन पितरों का श्राद्ध करने से जीवन में आने वाली परेशनियां दूर होती हैं , इसके साथ ही पितृ दोष जैसे अशुभ योग से भी मुक्ति मिलती है। इस दोष के कारण व्यक्ति के जीवन में हमेशा बाधा और परेशानियां बनी रहती हैं , जिस कारण व्यक्ति को अधिक संघर्ष करना पड़ता है।ये उपाय अवश्य करें —तर्पण करने से पूर्व हाथ में कुश की अंगूठी पहनें। इसके बाद दायें हाथ में जल , जौ और काले तिल लेकर अपना गोत्र बोलें और फिर इन चीजों को पितरों को समर्पित कर दें। पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलायें इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलेगी। आज के दिन चींटी , कौवा , गाय , कुत्ता और ब्राह्मण के नाम से भोजन निकाल दें , इससे पितरों की कृपा आप पर सदैव बनी रहेगी। आज के दिन श्राद्ध के लिये तिल और चांवल मिलाकर पिंड बनायें और पितरों को अर्पित करें। इस दिन पितरों के लिये श्राद्ध करें और घी मिली हुई खीर दान करें। इसके अलावा इस समय ब्राह्मण , गरीबों और जरूरमंदों को भोजन करायें , उन्हें अन्न और कपड़ों का दान देने से आपके सारे संकट दूर हो जायेंगे और घर में धन की कभी कमी नहीं होगी। इस दिन सुबह सूर्य देव को जल अर्पण अवश्य करें। आज पितृ अमावस्या के दिन पीपल एवं बरगद का पेंड़ अवश्य लगायें। आज के दिन पीपल पेंड़ में जल , पुष्प , अक्षत , दूध , गंगाजल , काला तिल चढ़ाकर दीपक जलाने एवं नाग स्तोत्र , महामृत्युंजय मंत्र , रूद्रसूक्त , पितृस्तोत्र , नवग्रह स्तोत्र , विष्णु मंत्र का जाप , गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने से पितरों को शांति मिलती है एवं पितृदोष में कमी आती है। इस दिन पितरों के योगदान को याद करते हुये उनका आभार व्यक्त करना चाहिये। इस दिन पितरों को विदाई देते समय उनसे किसी भी भूल की क्षमा याचना भी करनी चाहिये।इन चीजों से करें परहेजसर्व पितृ अमावस्या में कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिये। इस दिन हर प्रकार की बुराई से बचने का प्रयास करना चाहिये , नशा आदि से भी बचना चाहिये। क्रोध और अहंकार के साथ लोभ से भी दूर रहना चाहिये।किसी दूसरे शहर की यात्रा पर ना जायें। यूं तो पूरे पितृ पक्ष में तेल नहीं लगाना चाहिये , लेकिन इस दिन तो विशेषकर तेल लगाना निषेध ही है। इस दिन जब आप श्राद्ध करें तो उसमें लोहे के बर्तन , बासी फल-फूल और अन्न का उपयोग ना करें। इसके अलावा मांस-मदिरा , उड़द दाल , मसूर , चना , खीरा , जीरा , सत्तू और मूली का भी सेवन ना करें, यह पूर्णतया वर्जित है।सर्व पितृ अमावस्या कथापौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रेष्ठ पितृ अग्निष्वात और बर्हिषपद की मानसी कन्या अक्षोदा घोर तपस्या कर रही थीं। वह तपस्या में इतनी लीन थीं कि देवताओं के एक हजार वर्ष बीत गये , उनकी तपस्या के तेज से पितृ लोक भी प्रकाशित होने लगा। प्रसन्न होकर सभी श्रेष्ठ पितृगण अक्षोदा को वरदान देने के लिये एकत्र हुये। उन्होंने अक्षोदा से कहा कि हे पुत्री ! हम सभी तुम्हारी तपस्या से अति प्रसन्न हैं , इसलिये जो चाहो वर मांग लो। लेकिन अक्षोदा ने पितरों की तरफ ध्यान नहीं दिया , वह उनमें से एक अति तेजस्वी पितृ अमावसु को अपलक निहारती रही। पितरों के बार-बार कहने पर उसने कहा हे भगवन ! क्या आप मुझे सचमुच वरदान देना चाहते हैं ? इस पर तेजस्वी पितृ अमावसु ने कहा, ‘हे अक्षोदा वरदान पर तुम्हारा अधिकार सिद्ध है , इसलिये निस्संकोच कहो। अक्षोदा ने कहा भगवन यदि आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं तो मैं तत्क्षण आपके साथ का आनंद चाहती हूं। अक्षोदा के इस तरह कहे जाने पर सभी पितृ क्रोधित हो गये। उन्होंने अक्षोदा को श्राप दिया कि वह पितृ लोक से पतित होकर पृथ्वी लोक पर जायेगी। पितरों के इस तरह श्राप दिये जाने पर अक्षोदा पितरों के पैरों में गिरकर रोने लगी। इस पर पितरों को दया आ गई , उन्होंने कहा कि अक्षोदा तुम पतित योनि में श्राप मिलने के कारण मत्स्य कन्या के रूप में जन्म लोगी। भगवान ब्रह्मा के वंशज महर्षि पाराशर तुम्हें पति के रूप में प्राप्त होंगे और तुम्हारे गर्भ से भगवान व्यास जन्म लेंगे। उसके उपरांत भी अन्य दिव्य वंशों में जन्म लेते हुये तुम श्राप मुक्त होकर पुन: पितृ लोक में वापस आ जाओगी। पितरों के इस तरह कहे जाने पर अक्षोदा शांत हुई। अक्षोदा के प्रणय निवेदन को अस्वीकार किये जाने पर सभी पितरों ने अमावसु की प्रशंसा की और वरदान दिया- हे अमावसु ! आपने अपने मन को भटकने नहीं दिया, इसलिये आज से यह तिथि आपके नाम अमावसु के नाम से जानी जायेगी। ऐसा कोई भी प्राणी जो वर्ष में कभी भी श्राद्ध-तर्पण नहीं करता है , अगर वह इस तिथि पर श्राद्ध पर करेगा तो उसे सभी तिथियों का पूर्ण फल प्राप्त होगा। तभी से इस तिथि का नाम अमावसु (अमावस्या) हो गया और पितरों से वरदान मिलने के फलस्वरूप अमावस्या को सर्वपितृ श्राद्ध के लिये सर्वश्रेष्ठ पुण्य फलदायी माना गया।
: नही रहे रामायण के लंकेश अरविंद त्रिवेदी
Wed, Oct 6, 2021
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टमुम्बई -- रामानंद सागर के पौराणिक टीवी शो 'रामायण' में रावण का किरदार निभाने वाले अभिनेता अरविंद त्रिवेदी (83 वर्षीय) ने बीती रात दिल का दौरा पड़ने की वजह से कांदिवली स्थित अपने घर में ही इस दुनियां को अलविदा कह दिया है। वे लम्बे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे , इस वजह से वे काफी दिनों से बेड पर थे। उनके निधन से फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर है , कई सेलेब्स और फैन्स उनको सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दे रहे हैं। उनका अंतिम संस्कार आज मुंबई के दहानुकरवाड़ी श्मशान घाट में किया जायेगा। अरविंद त्रिवेदी ने वर्ष 1987 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुये 'रामायण' में अपने 'रावण' की किरदार निभाकर घर घर में अपनी खुद की खास पहचान बनायी , आज भी लोग उनको उसी किरदार में याद करते हैं।लेकिन इसके अलावा उन्होंने कई फेमस गुजराती फिल्मों में काम किया है , उनका कैरियर गुजराती सिनेमा में 40 साल तक चला। उन्होंने ‘रामायण’ के अलावा टीवी के एक और पॉपुलर शो ‘विक्रम और बेताल’ में भी अपनी अदाकारी दिखाई थी। अरविंद ने हिंदी और गुजराती सहित अपने करियर में करीब 300 फिल्मों में भी काम किया है। उन्होंने कई गुजराती फिल्मों में भी चालीस वर्षों तक योगदान देते हुये बेहतरीन अदाकारी से अपने लिये बड़ा मुकाम बनाया था। इसके अलावा उन्हें टीवी शो विक्रम और बैताल के लिये भी जाना जाता है।दिवंगत अभिनेता ने कई सामाजिक और पौराणिक फिल्मों में भी अभिनय किया था। आपको बता दें कि अरविंद त्रिवेदी ने राजनीति में भी अपना परचम लहराया। उन्हें बीजेपी ने लोकसभा चुनाव का टिकट भी दिया था। अरविंद ने न सिर्फ गुजरात के साबरकांठा से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा, बल्कि रावण के पौराणिक किरदार की सफलता के बूते उन्होंने चुनाव भी जीता। वे 1991 से 1996 तक लोकसभा के सांसद रहे। बता दें कि अरविंद त्रिवेदी का जन्म आठ नवंबर 1938 में मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनका शुरुआती केरियर गुजराती रंगमंच से शुरू हुआ। उनके भाई उपेंद्र त्रिवेदी गुजराती सिनेमा के चर्चित नाम रहे हैं और गुजराती फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। गुजराती फिल्मों के जरिये दर्शको को मिली प्रसिद्धि के चलते त्रिवेदी ने गुजरात सरकार द्वारा प्रदान की गई गुजराती फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिये सात पुरस्कार जीते थे। वर्ष 2002 में उन्हें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नामित किया गया था। अरविंद त्रिवेदी ने 20 जुलाई 2002 से 16 अक्टूबर 2003 तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) प्रमुख के रूप में काम किया था।