: विपक्ष की ओर से मार्गरेट अल्वा उपराष्ट्रपति उम्मीद्वार नामित
Mon, Jul 18, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टनई दिल्ली - उपराष्ट्रपति चुनाव के लिये एनडीए के बाद अब विपक्ष ने भी अपना उम्मीद्वार घोषित कर दिया है। एनडीए उम्मीद्वार जगदीप धनखड़ के सामने विपक्ष ने उपराष्ट्रपति के लिये मार्गरेट अल्वा पर अपना दांव लगाया है। उपराष्ट्रपति चुनाव में राजस्थान की पूर्व राज्यपाल अल्वा का मुकाबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के प्रत्याशी एवं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ से होगा। उपराष्ट्रपति उम्मीद्वार के चयन हेतु विपक्ष की इस बैठक का आयोजन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार के आवास पर हुआ। बैठक में कांग्रेस , तृणमूल कांग्रेस , वाम दल , राष्ट्रीय जनता दल , समाजवादी पार्टी सहित सभी प्रमुख विपक्षी दलों के नेता शामिल हुये। विपक्ष की सभी पार्टियों की मींटिग के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने मार्गरेट अल्वा के नाम की घोषणा की। विपक्ष की तरफ से उम्मीद्वार बनाये जाने के बाद मार्गरेट अल्वा ने ट्वीट कर लिखा कि भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिये संयुक्त विपक्ष के उम्मीद्वार के रूप में नामित होना एक विशेषाधिकार और सम्मान की बात है। मैं इस नामांकन को बड़ी विनम्रता से स्वीकार करती हूं और विपक्ष के नेताओं को धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने मुझ पर विश्वास किया है।कौन है मार्गरेट अल्वामार्गरेट अल्वा का जन्म 14 अप्रैल 1942 को मैंगलूर के पास्कल एम्ब्रोस नजारेथ और एलिजाबेथ नजारेथ के यहाँ हुआ था। अल्वा की पढ़ाई बंगलौर के माउंट कार्मेल कॉलेज और राजकीय लाँ कॉलेज में हुई। इनकी शादी 24 मई 1964 में निरंजन अल्वा से हुई। उनकी एक बेटी और तीन बेटे हैं। राजनीति में आने से पहले अल्वा जानी मानी एडवोकेट हुआ करती थी। एक वकील होने के साथ-साथ मार्गरेट अल्वा बहुत अच्छी पेंटर भी हैं। इसके आलावा वर्ष 1974 से 2004 तक वे पांच बार सासंद भी रहीं। उन्होंने केन्द्र सरकार में महत्वपूर्ण महकमों की राज्यमंत्री के रूप में भी काम किया। सासंद रहते हुये उन्होंने महिला-कल्याण के कई कानून पास कराने में अपनी प्रभावी भूमिका अदा की। महिला सशक्तिकरण संबंधी नीतियों का ब्लू प्रिन्ट बनाने और उसे केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा स्वीकार कराये जाने की प्रक्रिया में उनका मूल्यवान योगदान रहा। केवल देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी उन्होंने मानव-स्वतन्त्रता और महिला-हितों के लिये काम किया। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति ने उन्हें राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा भी। उन्होंने 06 अगस्त 2009 से 14 मई 2012 तक उत्तराखण्ड की पहली महिला राज्यपाल के रूप में कार्य किया। इसके बाद 12 मई 2012 से 07 अगस्त 2014 तक वे राजस्थान की राज्यपाल रह चुकी हैं।विवादों में भी रहीं मार्गरेट अल्वानवम्बर 2008 में उन्होंने जब अपनी पार्टी पर ही कांग्रेस सीटों के लिए टिकिटों के खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया, तो उन्हें अपनी स्पष्टवादिता की भारी कीमत चुकानी पड़ी और कांग्रेस पार्टी की महासचिव के पद से और सेन्ट्रल इलेक्शन कमेटी और महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा तथा मिजोरम राज्यों के लिए कांग्रेस पार्टी की प्रभारी पद से भी मुक्त होना पड़ा।छह अगस्त को होगा मतदानउपराष्ट्रपति चुनाव के लिये इच्छुक उम्मीद्वार 19 जुलाई तक अपने नामांकन पत्र दाखिल कर सकते हैं। नामांकन पत्रों की जांच 20 जुलाई को होगी। उपराष्ट्रपति चुनाव के लिये नामांकन दाखिल करने वाले उम्मीद्वार अपना नामांकन पत्र 22 जुलाई तक वापस ले सकेंगे। उपराष्ट्रपति चुनने के लिये 06 अगस्त को सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक वोट डाले जायेंगे।
: मां गंगा की पवित्रता जरूरी - अरविन्द तिवारी
Sat, Jun 11, 2022
नई दिल्ली - हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हस्त नक्षत्र में भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पोषक मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। अत:इस दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है जो इस बार आज है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि गंगा दशहरा पर स्नान दान का जितना महत्व है , उतना ही यह अवसर आपको जल संरक्षण और उसकी पवित्रता को बनाये रखने का भी संदेश देता है। गंगा दशहरा के अवसर पर भगवान शिव की नगरी काशी / हरिद्वार / त्रिवेणी संगम प्रयागराज / गढ़मुक्तेश्वर आदि स्थानों पर मां गंगा की पूजा की जाती है और स्नान दान किया जाता है। इस अवसर पर गंगा महाआरती भी होती है। इस दिन गंगा में स्नान एवं दान करने से प्राणी के सब दुःख दूर हो जाते हैं और दैहिक / मानसिक एवं वाणी से जुड़े सभी पाप मिट जाते हैं।आज बन रहा खास योगइस वर्ष गंगा दशहरा पर गजकेसरी योग , लक्ष्मी योग और रवि योग बन रहा है , आज पुष्य नक्षत्र भी है। गंगा दशहरा पर गंगा स्नान के बाद पूजा पाठ करने और दान करने से दोगुना लाभ होने के साथ ही साथ पुण्य की भी प्राप्ति होती है। गंगा दशहरा के दिन आज गजकेसरी योग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब कुंडली में गुरु और चंद्रमा दोनों ही एक ही जगह बैठे हों तो गजकेसरी योग बनता है। इस योग को काफी शुभ माना जाता है। इस योग होने पर हाथी के समान शक्ति के साथ धन-दौलत प्राप्त होती है।गजकेसरी के अलावा महालक्ष्मी योग बन रहा है। ये योग शुक्र और बुध की युति से बनता है। इसके अलावा कुंडली में वृषभ राशि में सूर्य और बुध की युति हो रही हैं जिसके कारण बुधादित्य योग बन रहा है। गंगा दशहरा तन के साथ-साथ मन की शुद्धि का पर्व भी हैं। इसलिये आज के दिन गंगाजी में खड़े होकर अपनी पूर्व में की हुई गलतियों के लिये क्षमा मांगने के साथ- साथ भविष्य में कोई भी बुरा कार्य नहीं करने का संकल्प लेना चाहिये। पौराणिक कथा में गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने के बारे में विस्तार से बताया गया है। राजा भगीरथ ने कठोर तप करके मां गंगा को पृथ्वी पर अवतरित होने की प्रार्थना की थी। गंगा भगवान शिव और श्रीहरि विष्णु दोनों को ही प्रिय हैं। गंगा दशहरा के अवसर पर आप मां गंगा के साथ भगवान विष्णु और भगवान भोलेनाथ की पूजा करके दोनों देवों की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।गंगा दशहरा का महत्वज्योतिष शास्त्र के अनुसार हम सब दैनिक जीवन जाने-अनजाने में कभी-कभी ऐसा कर्म कर देते हैं , जिससे पाप लगता है। ऐसे में इन पापों से मुक्ति के लिये गंगा दशहरा के दिन पवित्र नदी गंगा में स्नान करने के पश्चात् मां गंगा की अराधना करनी चाहिये। मान्यता है कि इस दिन किये गये दान से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और हमारे भौतिक सुख साधनों में वृद्धि होती है।गंगा दशहरा पूजा विधि उपायगंगा दशहरा के दिन सुबह पवित्र नदी में स्नान करें , यदि संभव ना हो तो घर पर बाल्टी में गंगाजल की कुछ बूंद डालकर स्नान करें। आज के दिन स्नान करने के बाद मंदिर में शिवलिंग पर गंगा जल से अभिषेक करें। ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि बरकरार रहती है। यदि आप पर कर्ज का बोझ बढ़ गया है तो गंगा दशहरा के दिन शाम को अपने लंबाई के काले धागे लें। इस धागे को पानी वाले नारियल में लपेट लें और इसे नदी के बहते जल में प्रवाहित कर दें। इसे प्रवाहित करते वक्त मन में मां गंगा का स्मरण करें और पीछे मुड़कर ना देखें। ऐसा करने से आपको जल्द ही कर्ज से छुटकारा मिलेगा। यदि आपकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है तो गंगा दशहरा के दिन पीपल का पेड़ लगायें ऐसा करने से मां गंगा प्रसन्न होती हैं और घर हमेशा धन धान्य से भरा रहता है।गंगा दशहरा कथाकपिल मुनि ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को श्राप दे दिया था जिससे वे भस्म हो गये थे। उन लोगों ने कपिल मुनि पर घोड़ा चोरी का झूठा आरोप लगाया था। अपने साठ हजार पुत्रों के भस्म होने की खबर ने राजा सगर को स्तब्ध और शोकाकुल कर दिया। राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष प्रदान कराने के लिये उनके ही कुल के राजा भगीरथ ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिये तपस्या की। ब्रह्म देव ने राजा भगीरथ को वर मांगने को कहा तो उहोंने मां गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराने का वर मांगा। ब्रह्म देव ने कहा कि इसके लिये तुम भगवान शिव को प्रसन्न करो , वे ही गंगा के वेग और भार को वहन कर सकते हैं। फिर भगीरथ ने अपने कठोर तप से भगवान महादेव को प्रसन्न किया। उन्होंने राजा भगीरथ को वर मांगने को कहा, तो राजा ने ब्रह्मा जी की बात बतायी और शिवजी तैयार हो गये। स्वर्ग लोक में बहने वाली गंगा को ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से छोड़ा तो वे बड़ी तीव्र गति से आगे बढ़ीं। इस बीच भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समेट कर बांध लिया। अब समस्या यह हो गई कि वह शिव की जटाओं से बाहर ही नहीं निकल सकी। फिर राजा भगीरथ ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और मां गंगा को अपनी जटाओं से होते हुये पृथ्वी पर अवतरित होने का आशीर्वाद प्रदान करने का निवेदन किया। इसके बाद मां गंगा शिव की जटाओं से निकलकर पृथ्वी पर अवतरित हुईं।आगे आगे राजा भगीरथ और उनके पीछे पीछे मां गंगा पृथ्वी पर प्रवाहित होने लगीं। मां गंगा के स्पर्श से राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार हुआ और उनको मोक्ष प्राप्त हुआ। तब से ही मां गंगा पृथ्वी पर बहने लगीं और उनके स्पर्श से मनुष्य अपने पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता आ रहा है।
: वृक्षारोपण मानव समाज का सांस्कृतिक दायित्व है - अरविन्द तिवारी
Sun, Jun 5, 2022
(विश्व पर्यावरण दिवस विशेष)नई दिल्ली — विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकृति को समर्पित दुनियां भर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण और जीवन का अटूट संबंध है। विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य दुनियां भर में लोगों के बीच पर्यावरण प्रदूषण / जलवायु परिवर्तन / ग्रीन हाउस के प्रभाव / ग्लोबल वार्मिंग / ब्लैक होल इफेक्ट आदि ज्वलंत मुद्दों और इनसे होने वाली विभिन्न समस्याओं के प्रति सामान्य लोगों को जागरूक करना और पर्यावरण की रक्षा के लिये उन्हें हर संभव प्रेरित करना है। इस दिन लोगों को जागरूक करने के लिये कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। इन कार्यक्रमों के ज़रिये लोगों को पेड़-पौधे लगाने / पेड़ों को संरक्षित करने / हरे पेड़ ना काटने / नदियों को साफ़ रखने और प्रकृति से खिलवाड़ ना करने जैसी चीजों के लिये जागरुक किया जाता है।पर्यावरण शब्द का निर्माण दो शब्दों परि और आवरण से मिलकर बना है जिसमें परि का मतलब है हमारे आसपास अर्थात जो हमारे चारों ओर और ‘आवरण’ जो हमें चारों ओर से घेरे हुये है। पर्यावरण उन सभी भौतिक / रासायनिक एवं जैविक कारकों की कुल इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं।वैज्ञानिक रूप से कहें तो हमारे आस-पास की हर चीज हमारे पर्यावरण का निर्माण करती है। सजीव और निर्जीव दोनों चीजें हमारे पर्यावरण का निर्माण करती हैं। जीवित या जैविक घटकों में पौधे / जानवर और रोगाणु शामिल हैं जबकि निर्जीव या अजैविक घटकों में हवा / पानी / मिट्टी आदि शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनैतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिये मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1972 में 05 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्टाकहोम (स्वीडन) में आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी के सिद्धांत को सर्वमान्य तरीके से मान्यता प्रदान की गई। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय पर्यावरण के संरक्षण तथा सुधार की विश्वव्यापी समस्या का निदान करना था। इस सम्मेलन में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव विषय पर व्याख्यान दिया था। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण सुरक्षा की तरफ ये भारत का पहला कदम माना जाता है। इसलिये ये दिन भारत के लिये भी विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके बाद 05 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया । पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े / सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियायें और प्रक्रियायें भी शामिल हैं। जबकि पर्यावरण के अजैविक संघटकों में निर्जीव तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियायें आती हैं जैसे: पर्वत / चट्टानें / नदी / हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि। सामान्य अर्थों में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों / तथ्यों / प्रक्रियाओं और घटनाओं से मिलकर बनी इकाई है। यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी पर निर्भर करती और संपादित होती हैं। मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियायें पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। इस प्रकार किसी जीव और पर्यावरण के बीच का संबंध भी होता है, जो कि अन्योन्याश्रित है। मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो भागों में बांटा जा सकता है जिसमें पहला है प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता के अनुसार है। पर्यावरणीय समस्यायें जैसे प्रदूषण / जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता महत्वपूर्ण है। आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत है पर्यावरण संकट के मुद्दे पर आम जनता और सुधी पाठकों को जागरूक करने की। वायु प्रदूषण रोकने में वृक्षों का सबसे बड़ा योगदान है। पौधे वायुमण्डलीय कार्बन डाई ऑक्साइड अवशोषित कर हमें प्राणवायु ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। अत: सड़कों / नहर पटरियों तथा रेल लाईन के किनारे तथा उपलब्ध रिक्त भू-भाग पर व्यापक रूप से वृक्ष लगाये जाने चाहिये ताकि हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ वायुमण्डल भी शुद्ध हो सके। औद्योगिक क्षेत्रों के निकट हरि पट्टियाँ विकसित की जानी चाहिये जिसमें ऐसे वृक्ष लगाये जायें जो चिमनियों के धुयें से आसानी से नष्ट ना हों तथा घातक गैसों को अवशोषित करने की क्षमता रखते हों। पीपल एवं बरगद आदि का रोपण इस दृष्टि से उपयोगी है। वृक्षारोपण हमारे देश भारत की संस्कृति एवं सभ्यता वनों में ही पल्लवित तथा विकसित हुई है यह एक तरह से मानव का जीवन सहचर है वृक्षारोपण से प्रकृति का संतुलन बना रहता है वृक्ष अगर ना हो तो सरोवर (नदियां ) में ना ही जल से भरी रहेंगी और ना ही सरिता ही कल कल ध्वनि से प्रभावित होंगी वृक्षों की जड़ों से वर्षा ऋतु का जल धरती के अंक में पोहचता है यही जल स्त्रोतों में गमन करके हमें अपर जल राशि प्रदान करता है । वृक्षारोपण मानव समाज का सांस्कृतिक दायित्व भी है क्योंकि वृक्षारोपण हमारे जीवन को सुखी संतुलित बनाये रखता है वृक्षारोपण हमारे जीवन में राहत और सुखचैन प्रदान करता है। संस्कृति और वृक्षारोपण भारत की सभ्यता वनों की गोद मे ही विकासमान हुई है। हमारे यहां के ऋषि मुनियों ने इन वृक्ष की छांव में बैठकर ही चिंतन मनन के साथ ही ज्ञान के भंडार को मानव को सौपा है वैदिक ज्ञान के वैराग्य में, आरण्यक ग्रंथों का विशेष स्थान है वनों की ही गोद में गुरुकुल की स्थापना की गई थी इन गुरुकुलो में अर्थशास्त्री / दार्शनिक तथा राष्ट्र निर्माण शिक्षा ग्रहण करते थे इन्ही वनों से आचार्य तथा ऋषि मानव के हितों के अनेक तरह की खोजें करते थे ओर यह क्रम चला ही आ रहा है पक्षियों का चहकना / फूलो का खिलना किसके मन को नहीं भाता है इसलिये वृक्षारोपण हमारी संस्कृति में समाहित है। वृक्षारोपण उपासना हमारे भारत देश में जहां वृक्षारोपण का कार्य होता है वही इन्हें पूजा भी जाता है कई ऐसे वृक्ष है जिन्हें हमारे हिंदू धर्म में ईश्वर का निवास स्थान माना जाता है। जैसे नीम / पीपल / आंवला / बरगद आदि को शास्त्रों के अनुसार पूजनीय कहलाते है और साथ ही धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष प्रकृति के सभी तत्वों की विवेचना करते हैं जिन वृक्ष की हम पूजा करते है वो औषधीय गुणों का भंडार भी होते हैं जो हमारी सेहत को बरकरार रखने में मददगार सिद्ध होते है। आदिकाल में वृक्ष से ही मनुष्य की भोजन की पूर्ति होती थी। वृक्ष के आसपास रहने से जीवन में मानसिक संतुलन ओर संतुष्टि मिलती है।इस साल की थीम एवं मेजबान देशविश्व पर्यावरण दिवस एक अभियान है जो विश्व भर में पर्यावरण के नकारात्मक प्रभावों को रोकने के लिये मनाया जाता है। ऐसे अभियान की शुरुआत करने का उद्देश्य वातावरण की स्थितियों पर ध्यान केंद्रित करने और हमारे ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने के लिये है। पर्यावरण दिवस को सुधारने हेतु यह दिवस महत्वपूर्ण है , जिसमें पूरा विश्व रास्ते में खड़ी चुनौतियों को हल करने का रास्ता निकालता है। हर साल विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने के लिये एक थीम रखी जाती है , जिसके आधार पर ही इस दिन को मनाया जाता है। इस साल विश्व पर्यावरण दिवस 2022 की थीम ‘केवल एक पृथ्वी‘ (ओनली वन अर्थ) है। यह विषय हमारे ग्रह को संरक्षित करने और पुनर्स्थापित करने के लिये वैश्विक स्तर पर सामूहिक / परिवर्तनकारी कार्रवाई का आह्वान करता है। ताकि प्रकृति के साथ स्वच्छ, हरित जीवन बनाया जा सके। इस थीम का मतलब प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रखने की आवश्यकता और व्यक्तिगत विकल्पों दोनों के माध्यम से एक हरित जीवन शैली में हमारी संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित करेगा।हमें यह याद रखने की आवश्यकता है कि हमारे पास सिर्फ एक पृथ्वी है और हमारे ग्रह को बचाने के लिये समय तेज़ी से ख़त्म हो रहा है। यही वजह है कि इस साल के विश्व पर्यावरण दिवस की थीम- 'सिर्फ एक पृथ्वी' - मौजूदा परिदृश्य पर पूरी तरह से फिट बैठती है। विश्व पर्यावरण दिवस हर साल एक अलग देश द्वारा आयोजित किया जाता है जहां समारोह और बैठकें होती हैं। इस वर्ष मेजबान देश स्वीडन है। इस वर्ष यूएनईपी और भागीदारों के समर्थन से एक उच्च स्तरीय अंतर्राष्ट्रीय बैठक आयोजित की जायेगी। पारिस्थितिक तंत्र को अनुकूलित और पुनर्स्थापित करने के लिये शहरी और ग्रामीण परिदृश्य में अलग-अलग तरीके हैं। पारिस्थितिक तंत्र की बहाली कई रूप में हो सकती है , जैसे- पेड़ उगाना , शहर को हरा-भरा करना , बगीचों को फिर से बनाना , नदियों और तटों की सफाई करना आदि। हर किसी को इस दिन पर्यावरण की बहाली का संकल्प लेना चाहिये। इस बात से बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता कि संपूर्ण मानवता का अस्तित्व प्रकृति पर ही निर्भर है। इसलिये हमें समय रहते एक स्वस्थ एवं सुरक्षित पर्यावरण की कल्पना करनी चाहिये। प्रकृति को बचाने के लिये सिर्फ एक अकेला व्यक्ति काफी नहीं है , ऐसे में हम सब को मिलकर कुछ संकल्प लेने होंगे जिनसे हम अपने पर्यावरण को फिर से हरा-भरा कर सके। हमारा पौधा लगाना ही काफी नहीं है , इसलिये जो भी पौधा आप लगायें उसकी देखरेख की जिम्मेदारी भी उठायें। पर्यावरण का संतुलन बनाये रखने के लिये पेड़-पौधों का संरक्षण बहुत ही जरूरी है।