: जस्टिस धूलिया एवं जस्टिस पारदीवाला ने ली सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की शपथ
Mon, May 9, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टनई दिल्ली - जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जमशेद बी पारदीवाला ने आज सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ले ली है। भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने न्यायालय के एडिशनल बिल्डिंग कॉम्प्लेक्स के ऑडिटोरियम में नए न्यायाधीशों को पद की शपथ दिलाई। नवंबर 2019 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की कुल संख्या स्वीकृत पदों के बराबर यानि 34 हो गई है। हालांकि 10 मई को जस्टिस विनीत शरण के सेवानिवृत्त होने के बाद यह संख्या घटकर 33 रह जायेगी। इसके अलावा गर्मी की छुट्टी के दौरान सात जून को जस्टिस एल नागेश्वर राव भी सेवानिवृत्त होंगे। वहीं जस्टिस एएम खानविलकर 29 जुलाई , चीफ जस्टिस (सीजेआई) एनवी रमण 26 अगस्त को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। सेवानिवृत्ति से पहले सीजेआई रमण के कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट में तीन और रिक्तियां हो जायेंगी। इसके अलावा जस्टिस इंदिरा बनर्जी इसी वर्ष 23 सितंबर और जस्टिस यूयू ललित आठ नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इस वर्ष के अंत तक सुप्रीम कोर्ट के छह और जज सेवानिवृत्त होंगे।संक्षिप्त परिचय जस्टिस धूलियाजस्टिस धूलिया का जन्म 10 अगस्त 1960 को लैंसडाउन , पौड़ी गढ़वाल में हुआ था और उनकी प्रारंभिक शिक्षा देहरादून और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुई थी। वे सैनिक स्कूल लखनऊ के पूर्व छात्र हैं और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री ली है। ये वर्ष 1986 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में बार में शामिल हुये और वर्ष 2000 में इसके गठन पर अपने गृह राज्य उत्तराखंड में स्थानांतरित हो गये। वे उत्तराखंड हाईकोर्ट में पहले मुख्य सरकारी वकील थे और बाद में उत्तराखंड राज्य के लिये एक अतिरिक्त महाधिवक्ता रहे। उन्हें वर्ष 2004 में एक सीनियर एडवोकेट के रूप में नॉमिनेट किया गया। उन्हें नवंबर 2008 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था और बाद में 10 जनवरी 2021 को आसाम / मिजोरम /नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने।संक्षिप्त परिचय जस्टिस पारदीवाला12 अगस्त 1965 को मुंबई में जन्मे जस्टिस पारदीवाला ने अपनी स्कूली शिक्षा अपने गृह नगर वलसाड (दक्षिण गुजरात) के सेंट जोसेफ कॉन्वेंट स्कूल से की। उन्होंने जेपी आर्ट्स कॉलेज वलसाड से स्नातक किया। उन्होंने वर्ष 1988 में केएम मुलजी लॉ कॉलेज वलसाड से कानून की डिग्री प्राप्त की। ये वकीलों के परिवार में चौथी पीढ़ी के कानूनी पेशेवर हैं। उनके पिता स्वर्गीय बुर्जोर कावासजी पारदीवाला ने वलसाड और नवसारी जिलों में 52 वर्षों तक वकालत की। उन्होंने कुछ समय के लिये गुजरात की सातवीं विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया था। उनके दादा और परदादा भी वकील थे और वलसाड और नवसारी जिलों में वकालत करते थे। जस्टिस पारदीवाला ने वर्ष 1990 में गुजरात हाईकोर्ट में लॉ प्रैक्टिस शुरू की। उन्हें वर्ष 1994 में बार काउंसिल ऑफ गुजरात के सदस्य के रूप में चुना गया था। उन्हें वर्ष 2002 में गुजरात हाईकोर्ट में सरकारी वकील के रूप में नियुक्त किया गया और वे 17 फरवरी 2011 को बेंच में उनकी पदोन्नति की तारीख तक पद पर रहे। विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जस्टिस पारदीवाला 2027 में चीफ जस्टिस भी बनेंगे।
: मां के बिना जीवन की परिकल्पना ही नही - अरविन्द तिवारी
Mon, May 9, 2022
(अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस विशेष)नई दिल्ली - समाज में माँ का प्रभाव बढ़ाने और उनके प्यार , त्याग सेवा , उनकी अतुलनीय योगदान के लिये मदर्स डे (मातृदिवस) मनाया जाता है। पूरे विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग तारीखों पर हर साल मातृदिवस को मनाया जाता है। कई देशों में मार्च महीने में भी मदर्स डे मनाया जाता है। भारत में इसे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। हालांकि मां के लिये तो हर दिन एक दिन जैसा ही होता है इसलिये मां के लिये कोई विशेष दिन नहीं है । लेकिन अंग्रेज इसे बनाकर चले गये तो भारतीय इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं और आज का दिन माँ को प्यार और सम्मान जताने का दिन है। माँ एक अनमोल इंसान के रूप में होती है जिसके बारे में शब्दों से बयाँ नहीं किया जा सकता है। जिस ममतामयी , करूणामयी , त्यागमयी मां ने मुझे इस संसार में लाया है , मातृदिवस पर मैं उस मां के बारे में क्या लिख सकता हूं ? जिस मां ने स्वयं मुझे लिखा है और मुझे लिखना सिखाया है उस मां पर कुछ भी लिखना यानि सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। फिर भी एक लेखक होने के नाते उन पर दो चार लाईन लिखने की कोशिश करता हूं।ऐसा कहा जाता है कि भगवान हर किसी के साथ नहीं रह सकता इसलिये उसने माँ को बनाया । माँ हमारे जीवन की हर छोटी बड़ी जरूरतों का ध्यान रखने वाली और उन्हें पूरा करने वाली देवदूत होती है। कहने को वह इंसान होती है, लेकिन भगवान से कम नहीं होती।वहीं मन्दिर है, वही पूजा है और वही तीर्थ है। माँ के बारे में जितना लिखा जाये उतना ही कम है। ममत्व एवं त्याग घर ही नहीं, सबके घट को उजालों से भर देता है. मां का त्याग, बलिदान, ममत्व एवं समर्पण अपनी संतान के लिए इतना विराट है कि पूरी जिंदगी भी समर्पित कर दी जाये तो मां के ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता है. संतान के लालन-पालन के लिये हर दुख का सामना बिना किसी शिकायत के करने वाली मां के साथ बिताये दिन सभी के मन में आजीवन सुखद व मधुर स्मृति के रूप में सुरक्षित रहते हैं। इस दुनियां में मां से खूबसूरत शब्द और कुछ नहीं है। मां के बिना इस दुनियां में हमारा कुछ भी अस्तित्व नहीं है क्योंकि हम सभी को जन्म देने वाली मां ही होती है। मां का स्थान हम सभी के जीवन में सबसे ऊपर और खास होता है। मां के प्यार और त्याग का एहसान हम कभी उसे चुका नहीं पायेंगे। मां का दर्जा भगवान से भी ऊपर माना गया है। मां हम सभी के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मां के बिना जीवन की कल्पना भी अधूरी है। मां भगवान की बनायी एक सुंदर रचना है जो अपने बच्चे को जीवन भर नि:शर्त प्यार और सहयोग देती रहती है। मां और बच्चे के रिश्ते को दुनियां का सबसे खूबसूरत और अनमोल रिश्ता माना जाता है। माँ के बिना जीवन की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। यदि हम इस दुनियां में आये हैं तो केवल मां की वजह से। मां के गर्भ के बिना कोई जन्म नहीं ले सकता। नौ माह तक गर्भ में रखने और प्रसव की पीड़ा झेलने के बाद जब शिशु का जन्म होता है तो वो पल हर मां के लिये सबसे खुशनुमा होता है। मां से बढ़कर दुनियां में कोई नही होता , जो सुकुन मां की गोद में मिलता है वो स्वर्ग में भी नहीं मिल सकता। जब मां पहली बार अपने बच्चे को अपनी गोद में लेती है और उसे अपने सीने से लगाती है उस फल को कोई भी शब्दों में बयां नहीं कर सकता। मां का प्यार से माथे को चूमना किसी ताकत से कम नहीं होता। वो मां ही होती है जो अपने हाथों से बच्चों काकोमल हाथ पकड़कर उसे चलना सिखाती है , अपने हाथों से उसे खिलाना सिखाती है। अपने बच्चों के पहनावे से लेकर उसकी शिक्षा तक की जिम्मेदारी एक मां से बढ़कर कोई नही निभा सकता। किसी के आगे बढ़ने में उसकी मां का हाथ अवश्य होता है। मां और बच्चे का रिश्ता इस दुनियां में सबसे खूबसूरत और अनमोल है। बच्चा दर्द में होता है तो तकलीफ मां को होती है , वो मुस्कुराता है तो खुश मां होती है। मां अपने बच्चों की आंखों में एक बूंद भी आंसू बर्दाश्त नहीं कर सकती , इसीलिये मां का स्थान सर्वोच्च है। मां खुद से पहले अपने बच्चों के बारे में सोचती है। अपनी पसंद , नापसंद सब भुलाकर अपने बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती है। मां के प्यार , त्याग , समर्पण को शब्दों में बताना आसान नहीं है। मां सिर्फ़ एक शब्द नहीं बल्कि एहसास है। मां का जीवन त्याग , प्रेम और देखभाल जैसी चीजों के बीच होता है। एक मां जिंदगी में कई फर्ज , कई रिश्ते बिना किसी स्वार्थ के निभाती है। मां का दर्जा भी काफी ऊपर माना जाता है। मां वो होती है जो अपना हर दर्द , अपनी हर तकलीफ़ को नजर अंदाज कर केवल अपने परिवार , अपने बच्चों के लिये जीती है। मां निस्वार्थ भाव से अपने बच्चों से प्यार करती है , अपने पति की देखभाल करती है , घर की देखरेख करती है और बिना किसी छुट्टी के पूरी जिंदगी काम भी करती है। मां अपना सम्पूर्ण जीवन बच्चों के लिये समर्पित कर देती है , उनका प्यार हमेशा बिना शर्त के पूर्ण रूप से शुद्ध होता है। मां के लिये कोई भी शब्द , लेख या उपाधि कम होगी। उनके प्यार और समर्पण को जिंदगी लगाकर भी जताया नहीं जा सकता है। माँ इस सृष्टि का सौंदर्य है , स्नेह उसकी प्रवृत्ति है तथा अनुदान उसका स्वभाव है। माँ जन्मदात्री है , रिश्ता का सबसे छोटा संबोधन और हमारे अस्तित्व में आने के बाद सबसे पहला शब्द माँ ही है जो जीवन का सबसे कीमती साथ भी होता है। समाज का प्रत्येक भावी सदस्य उसकी गोद में पलकर संसार में खड़ा होता है उसकी स्तन का अमृत पीकर हृष्ट पुष्ट होता है उसकी हंसी से हंसना और उसकी वाणी से बोलना सीखता है। माँ की ममता का कोई मोल नही है , जिसे माँ का प्यार नही मिलता वो बड़ा ही अभागा होता है। माँ बनना हर स्त्री की सपना होती है , वह बेटा बेटी में भेदभाव नही करती। माँ है तभी हम संपन्न हैं और बिना माँ के हम विपन्न हैं। माँ ममतामयी , करुणायी , वात्सल्यमयी होती है। माँ देवत्व की मूर्तिमान प्रतिमा है। वैसे तो प्रतिदिन हमें उनकी अतुलनीय योगदान को याद कर नतमस्तक होनी चाहिये , मां के प्रति कर्त्तव्यों को हमें कभी भूलना नहीं चाहिये। मां के लिये एक दिन देना कुछ भी नही है , बल्कि हर दिन मातृदिवस होनी चाहिये। ऐसा माना जाता है कि वर्ष 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक कानून पास किया था जिसके मुताबिक मई के महीने की दूसरी रविवार को मातृ दिवस मनाया जायेगा। तब से भारत समेत दुनियां के कई देशों में इसे मनाया जाने लगा। इस दिन दुनियां भर में लोग अपनी माताओं का सम्मान करते हैं , उनके प्रति अपना प्यार प्रकट करते हैं, उन्हें तोहफे देते हैं और उनके लिये इस दिन को खास बनाने की हर एक कोशिश करते हैं।
: संविधान की दो धाराओं का संगम देश में समयबद्ध न्याय का प्रतीक - पीएम मोदी
Mon, May 2, 2022
अरविन्द तिवारी की रिपोर्टनई दिल्ली - किसी भी देश में स्वराज का आधार न्याय होता है , देश में न्याय सबके लिये सुलभ हो। न्याय जनता से जुड़ा होना चाहिये , जनता की भाषा में होनी चाहिये। हमें कोर्ट में स्थानीयता भाषाओं को महत्व देने की जरूरत है , इससे सामान्य नागरिकों में न्याय प्रणाली में भरोसा बढ़ेगा और वे इससे जुड़ा हुआ महसूस करेंगे। राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का ये संयुक्त सम्मेलन हमारी संवैधानिक खूबसूरती का सजीव चित्रण है। हमारे देश में जहां एक ओर ज्यूडिशरी की भूमिका का संविधान संरक्षक की है , वहीं विधानमंडल नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। मुझे विश्वास है कि संविधान की इन दो धाराओं का ये संगम , ये संतुलन देश में प्रभावी और समयबद्ध न्याय व्यवस्था का रोडमैप तैयार करेगा।
उक्त बातें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन में कही। उन्होंने कहा राज्य के मूख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की ये संयुक्त सम्मेलन हमारी संवैधानिक खूबसूरती का सजीव चित्रण है। मुझे खुशी है कि इस अवसर पर मुझे भी आप सभी के बीच कुछ पल बिताने का अवसर मिला है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि आज का सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है , जब देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। आजादी के इन 75 सालों ने ज्यूडिशरी और एग्जीक्यूटिव दोनों के ही भूमिका और जिम्मेदारियों को निरंतर स्पष्ट किया है। जहां जब भी जरूरी हुआ , देश को दिशा देने के लिये ये संबंध लगातार विकसित हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार न्याय व्यवस्था में तकनीकी की संभावनाओं को डिजिटल इंडिया मिशन का एक जरूरी हिस्सा मानती है। उदाहरण के तौर पर ई-कोर्ट परियोजना को आज मिशन मोड में लागू किया जा रहा है। आज छोटे कस्बों और यहां तक कि गांवों में भी डिजिटल ट्रांसजेक्शन आम बात होने लगी है। आज सरकारी सेवाएं और सुविधाएं ऑनलाइन हो गईं हैं. ऐसे में नागरिक भी वैसे ही न्याय मिलने की उम्मीद करेगा। पीएम ने कहा कि वर्ष 2015 में हमने करीब 1800 ऐसे क़ानूनों को चिन्हित किया था जो अप्रासंगिक हो चुके थे। इनमें से जो केंद्र के कानून थे , ऐसे 1450 क़ानूनों को हमने खत्म किया , लेकिन राज्यों की तरफ से केवल 75 कानून ही खत्म किये गये हैं। आज सभी मुख्यमंत्रियों से अपील करना चाहता हूं कि नागरिकों के लिये , उनके अधिकारों के लिये ये कानून का जाल बना हुआ है , उन कानूनों को निरस्त करने के लिये कदम उठाईये। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 में जब देश अपनी आजादी के 100 साल पूरे करेगा तब हम देश में कैसी न्याय व्यवस्था देखना चाहेंगे ? हम किस तरह अपने न्याय व्यवस्था को इतना समर्थ बनायें कि वह 2047 के भारत की आकांक्षाओं को पूरा कर सके , उन पर खरा उतर सके , ये प्रश्न आज हमारी प्राथमिकता होना चाहिये। पीएम ने आगे कहा कि हमारे समाज में तो मध्यस्थता के जरिये विवादों के समाधान निकालने की हजारों साल पुरानी परंपरा रही है। आपसी सहमति और परस्पर भागीदारी न्याय की अपनी अलग मानवीय अवधारणा है। अगर हम देखें तो हमारे समाज का वो स्वभाव कहीं ना कहीं अभी भी बना हुआ है। हमने हमारी उन परंपराओं को खोया नहीं है , हमें इस लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने की जरूरत है। मामलों का कम समय में समाधान भी होता है , न्यायालयों का बोझ भी कम होता है और सामाजिक ताना बाना भी सुरक्षित रहता है। हमें मानवीय संवदेनाओं को केंद्र में रखना होगा।इस दौरान पीएम ने जेल में बंद कैदियों के लिये राज्य सरकारों से खास अपील की। उन्होंने कहा कि आज 3.50 लाख ऐसे कैदी हैं जो अंडर ट्रायल हैं और जेल में हैं. इनमें से अधिकांश लोग गरीबी या सामान्य परिवारों से हैं। हर जिले में डिस्ट्रिक्ट जज की अध्यक्षता में एक कमेटी होती है , ताकि इन केसों की समीक्षा हो सके। उन्होंने कहा कि जहां संभव हो , बेल पर उन्हें रिहा किया जा सके। मैं सभी मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के जजों से अपील करना चाहूंगा कि मानवीय संवेदनाओं और कानून के आधार पर इन मामलों को भी संभव हो तो प्राथमिकता दी जाये।वहीं कार्यक्रम को संबोधित करते हुये केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि जनता को सरल और शीघ्र न्याय दिलाने के लिये हम सभी प्रयासरत हैं , सबका साथ , विकास , विश्वास और प्रयास हमारा मंत्र है। हमारी सरकार सबका साथ सबका विकास के साथ सबको न्याय दिलाने के लिये भी प्रतिबद्ध है। रिजिजू ने कहा कि पिछले छह सालों में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच बेहतर समन्वय रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कोरोनाकाल में भी वर्चुअल सुनवाई में अग्रणी भूमिका निभायी है। ई कोर्ट न्यायपालिका में एक और पंख है। उन्होंने इसी के साथ सभी राज्यों से आये मुख्यमंत्रियों और सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से कार्यक्रम में आने के लिये धन्यवाद देते हुये कहा कि आप सबके साथ मिलकर काम करने से ही आम लोगों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
गौरतलब है कि आज दिल्ली के विज्ञान भवन में मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों का एक संयुक्त सम्मेलन आयोजित किया गया। इस संयुक्त सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इसमें पीएम ने टेक्नोलॉजी पर खास जोर दिया। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना सहित सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और सभी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मौजूद रहे। इसके बाद प्रधानमंत्री ने सभी मुख्यमंत्रियों को रात्रिभोज पर भी आमंत्रित किया। इस सम्मेलन में मुख्य न्यायाधीशों के पिछले सम्मेलन (2016) के प्रस्तावों की प्रगति के मूल्यांकन के अलावा , प्राथमिकता के आधार पर सभी अदालत परिसरों में नेटवर्क और कनेक्टिविटी को मजबूत करने , मानव संसाधन / कार्मिक नीति , जिला अदालतों की जरूरतों सहित तमाम जरूरी मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया। उल्लेखनीय है सुप्रीम कोर्ट वर्ष 1953 से उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन का आयोजन करता आ रहा है और अब तक 38 ऐसे सम्मेलन आयोजित कर चुका है। आखिरी बार वर्ष 2016 में सम्मेलन आयोजित किया गया था। इससे पहले शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने देश के कई हाकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के साथ 39वें सम्मेलन को संबोधित करते हुये कहा था कि हमारे सामूहिक प्रयासों की बदौलत एक साल से कम के समय में हमने हाई कोर्ट में 126 रिक्तियां भरी हैं , अभी हम 50 और रिक्तियां भरने की उम्मीद कर रहे हैं। ये कारनामा हमने आपके पूरे दिल से सहयोग और संस्था के प्रति प्रतिबद्धता के कारण ही कर पाया है। इसके साथ ही चीफ जस्टिस ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से जल्द से जल्द बाकी बची हुईं रिक्तियां भरने की बात कही।