: अभिशाप नहीं बल्कि व्यक्तित्व विकास में सहायक है दिव्यांगता - अरविन्द तिवारी
Fri, Dec 3, 2021
नई दिल्ली - दुनियाँ भर में प्रतिवर्ष आज ही के दिन यानि तीन दिसंबर को दिव्यांगों के प्रति लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरुक कर देश की मुख्य धारा में लाने के उद्देश्य से “अन्तर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस” मनाया जाता है। हर साल इस दिन दिव्यांगों के विकास , उनके कल्याण के लिये योजनाओं , समाज में उन्हें बराबरी के अवसर मुहैया कराने , उनके स्वास्थ्य व सामाजिक - आर्थिक स्थिति में सुधार लाने हेतु कार्यक्रम आयोजित कर गहन विचार विमर्श किया जाता है। लेकिन इस बार कोविड-19 के चलते अधिकांश जगहों पर ऑनलाइन कार्यक्रम होंगे। विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है। वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा के द्वारा “विकलांगजनों के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष” के रूप में वर्ष 1981 को घोषित किया गया था। अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर दिव्यांगजनों के लिये पुनरुद्धार , रोकथाम , प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने हेतु इस योजना को जन्म दिया गया। फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1983 से वर्ष 1992 को दिव्यांगों के लिये संयुक्त राष्ट्र के दशक की घोषणा की थी ताकि वो सरकार और संगठनों को विश्व कार्यक्रम में अनुशंसित गतिविधियों को लागू करने के लिये एक लक्ष्य प्रदान कर सकें। दिव्यांगों के बारे में लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिये , अक्टूबर 1992 में , 47 वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 03 दिसंबर को विश्व विकलांग दिवस के रूप में नामित करने का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद 03 दिसंबर को दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति करुणा और दिव्यांगता के मुद्दों की स्वीकृति को बढ़ावा देने और उन्हें आत्म-सम्मान , अधिकार और विकलांग व्यक्तियों के बेहतर जीवन के लिये समर्थन प्रदान करने हेतु एक उद्देश्य के साथ विश्व दिव्यांग दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन को मुख्य रूप से दिव्याँगोंं के प्रति लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरुक करने के लिये मनाया जाता है। गौरतलब है कि 27 दिसम्बर 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने "मन की बात" में विकलांगों को दिव्यांग कहने की अपील करते हुये कहा था कि शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के पास एक "दिव्य क्षमता" है और उनके लिये "विकलांग" शब्द की जगह "दिव्यांग" शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिये। जिसके पीछे उनका तर्क था कि शरीर के किसी अंग से लाचार व्यक्तियों में ईश्वर प्रदत्त कुछ खास विशेषतायें होती हैं , विकलांग शब्द उन्हे हतोत्साहित करता है। यहां बताना लाजिमी होगा कि आंखों की रोशनी ना होने के बाद भी अपनी खूबसूरती आवाज के लिये प्रख्यात संगीतकार और गायक रविन्द्र जैन , नृत्यांगना सोनल मान सिंह , एक पैर से दिव्यांग नृत्यांगना सुधाचन्द्रन , ऐवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली दिव्यांग महिला अरूणिमा सिन्हा , देखने और सुनने में असमर्थ - अमेरिका की शीर्ष लेखिका और शिक्षिका के साथ-साथ दुनियां की पहली दिव्यांग स्नातक हेलेन केलर , मानसिक रूप से कमजोर दुनियां के सबसे महान बैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे अनेकों जानी मानी हस्तियों का नाम आज भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। ये सभी अपनी कमियों के लिये नहीं बल्कि दिव्यांग होकर भी अपने प्रतिभा के लिये जाने जाते हैं।दिव्यांगों के प्रति पत्रकार की व्यथापीएम मोदी के आह्वान पर देश के लोगो ने विकलांगों को दिव्यांग कहना तो शुरू कर दिया लेकिन इससे कोई खास अंतर नहीं पड़ रहा। दिव्यांगों के प्रति लोगों का नजरिया आज भी नही बदल पाया है , हमारे दिमाग के अंदर की मानसिकता बदलनी चाहिये। आज भी समाज के लोगों द्वारा दिव्यांगों को दयनीय दृष्टि से ही देखा जाता है। भले ही देश में अनेकों दिव्यांगों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया हो मगर लोगों का उनके प्रति वही पुराना नजरिया अब भी बरकरार है। अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस दरअसल संयुक्त राष्ट्र संघ की एक मुहिम का हिस्सा है जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों को मानसिक रुप से सबल बनाना तथा अन्य लोगों में उनके प्रति सहयोग की भावना का विकास करना है। मगर आज के समय में भी अधिकतर लोगों को तो इस बात का भी पता नहीं होता है कि हमारे घर के आस-पास कितने दिव्यांग रहतें हैं ? उन्हे समाज में बराबरी का अधिकार मिल रहा है कि नहीं , किसी को इस बात की कोई फिक्र नहीं हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत में दिव्यांग आज भी अपनी मूलभूत जरूरतों के लिये दूसरों पर आश्रित है। दिव्यांगता से ग्रस्त लोगों का मजाक बनाना एक सामाजिक रूप से एक गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है। दिव्यांगता अभिशाप नहीं है क्योंकि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाये तो दिव्यांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है। यदि सोच सही रखी जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं। दिव्यांगता से ग्रस्त लोगों का मजाक बनाना , उन्हें कमजोर समझना और उनको दूसरों पर आश्रित समझना एक भूल और सामाजिक रूप से एक गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है। जो लोग किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाते है अथवा जो जन्म से ही दिव्यांग होते है। आज हम इस बात को समझें कि उनका जीवन भी हमारी तरह है और वे अपनी कमजोरियों के साथ उठ सकते है।हमारे आस पास कई ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने अपनी दिव्यांगता के बाद भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है।दुनियाँ में अनेकों ऐसे उदाहरण मिलेंगे जो बताते है कि सही राह मिल जाये तो अभाव एक विशेषता बनकर सबको चमत्कृत कर देती है। यदि दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं। भारत में दिव्यांगो की मदद के लिये बहुत सी सरकारी योजनायें संचालित हो रही हैं। लेकिन उनको समुचित और भरपूर लाभ नही मिल पाना दिव्यांगो के लिये सरकारी सुविधायें हासिल करना महज मजाक बनकर रह गया हैं। उन्हें सरकारी नौकरियों, अस्पताल , रेल , बस सभी जगह आरक्षण प्राप्त है , लेकिन ये सभी सरकारी योजनायें उन दिव्यांगो के लिये महज एक मजाक बनकर रह गयी हैं। जब इनके पास इन सुविधाओं को हासिल करने के लिये दिव्यांगता का प्रमाण पत्र ही नहीं है।आमतौर पर हमारे देश में दिव्यांगों के प्रति दो तरह की धारणायें देखने को मिलती हैं। पहला यह कि जरूर इसने पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा , इसलिये उन्हें ऐसी सजा मिली है और दूसरा कि उनका जन्म ही कठिनाइयों को सहने के लिये हुआ है , इसलिये उन पर दया दिखानी चाहिये। हालांकि ये दोनों ही धारणायें पूरी तरह बेबुनियाद और तर्कहीन हैं। बावजूद इसके, दिव्यांगों पर लोग जाने-अनजाने छींटाकशी करने से बाज नहीं आते। वे इतना भी नहीं समझ पाते हैं कि क्षणिक मनोरंजन की खातिर दिव्यांगों का उपहास उड़ाने से भुक्तभोगी की मनोदशा किस हाल में होगी ? तरस आता है ऐसे लोगों की मानसिकता पर जो दर्द बांटने की बजाए बढ़ाने पर तुले होते हैं। एक निःशक्त व्यक्ति की जिंदगी काफी दुख भरी होती है। घर-परिवार वाले अगर मानसिक सहयोग ना दें तो व्यक्ति अंदर से टूट जाता है। वास्तव में लोगों के तिरस्कार की वजह से दिव्यांग स्व-केंद्रित जीवनशैली व्यतीत करने को विवश हो जाते हैं। दिव्यांगों का इस तरह बिखराव उनके मन में जीवन के प्रति अरुचिकर भावना को जन्म देता है। अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस का उद्देश्य आधुनिक समाज में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करना है। आज का दिन ऐसे लोगों को सलाम करने का एक अवसर है , जिन्होंने खुद अपनी विकलांगता को नकार कर दुनियां के सामने कुछ अलग मिशाल कायम की है। अंत में हमारा कहना यही है कि किसी भी अशक्त दिव्यांग लोगों के साथ भेदभाव ना करें और यथासंभव उनकी मदद करें , उन्हें काबिल बनायें ताकि वे अपने आपको समर्थ महसूस कर सकें। अगर दिव्यांगों में कुछ विशेष क्षमता है तो हर स्तर फर उसे विकसित करने का प्रयास किया जाये , उनका मजाक उड़ाकर उन्हें हतोत्साहित तो कदापि ना करें।
: राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ विवादास्पद कृषि कानून निरस्त
Wed, Dec 1, 2021
नई दिल्ली - केंद्र सरकार के तीन विवादित कृषि कानूनों की वापसी आखिरकार महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी के बाद पूरी तरह हो चुकी है , अब पहले जैसा ही कृषि कानून लागू रहेगा। राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ही औपचारिक तौर पर तीनों कृषि कानून अब निरस्त कर दिया गया है। हाल ही में कृषि कानून वापसी बिल को लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया था। तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द करने वाले विधेयक पर आज राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हस्ताक्षर कर दिये हैं। अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही कानूनों की वापसी की औपचारिकता पूरी हो चुकी है। विपक्षी दलों के विरोध के बीच हाल के वर्षों में सबसे तेजी से लोकसभा और राज्यसभा दोनों द्वारा तीन कृषि कानूनों की वापसी के बिल पर निरस्त की मुहर लगायी। इस विवादित कानून को लेकर बीते एक साल से किसान दिल्ली के बॉर्डरों पर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। बताते चलें कि एक साल से अधिक समय से देश भर में बड़े पैमाने पर किसानों के विरोध के बाद तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर को उत्तरप्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में चुनावों से कुछ महीने पहले ही निरस्त करने की अचानक घोषणा कर दी। इस फैसला का जहां कुछ किसान संगठनों ने खुलकर स्वागत किया था तो वहीं किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा था कि अभी आंदोलन जारी रहेगा। लेकिन कानून वापसी के बाद अभी भी एमएसपी को लेकर कुछ किसान संगठन आंदोलन कर रहे हैं।
: प्रकृति के साथ मिलकर जीवनशैली प्रेरणादायी - पीएम मोदी
Sun, Nov 28, 2021
नई दिल्ली - कोरोना अभी गया नहीं है , हमें अभी भी सावधान रहने की जरूरत है। हमारे देश में अनेक राज्य हैं , अनेक क्षेत्र है जहां के लोगों ने अपनी प्राकृतिक विरासत के रंगों को संजोकर रखा है। इन लोगों ने प्रकृति के साथ मिलकर रहने की जीवनशैली आज भी जीवित रखी है , ये हम सबके लिये भी प्रेरणा है।
उक्त बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 83 वां एपिसोड के जरिये देशवासियों को संबोधित करते हुये कही। इस दौरान पीएम मोदी ने आयुष्मान योजना से लेकर स्टार्टअप और पर्यावरण से लेकश्र आजादी के अमृत महोत्सव पर चर्चा करते हुये शहीदों को नमन किया। प्रधानमंत्री द्वारा हर माह के अंतिम रविवार को संबोधित किये जाने वाले इस कार्यक्रम का प्रसारण आल इंडिया रेडियो , दूरदर्शन , आल इंडिया रेडियो न्यूज और मोबाइल एप पर भी किया गया। पीएम ने आगे कहा कि जब हम प्रकृति का संरक्षण करते हैं तो बदले में प्रकृति हमें भी संरक्षण और सुरक्षा देती है। प्रकृति से हमारे लिये खतरा तभी पैदा होता है जब हम उसके संतुलन को बिगाड़ते हैं या उसकी पवित्रता नष्ट करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति मां की तरह हमारा पालन भी करती है और हमारी दुनियां में नये-नये रंग भी भरती है। पीएम मोदी ने कहा कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम में झांसी और बुंदेलखंड का कितना बड़ा योगदान है , ये हम सब जानते हैं। यहां रानी लक्ष्मीबाई और झलकारी बाई जैसी वीरांगनायें भी हुईं और मेजर ध्यानचंद जैसे खेल रत्न भी इस क्षेत्र ने देश को दिये हैं। पीएम ने कहा वीरता केवल युद्ध के मैदान में ही दिखायी जाये ऐसा ज़रूरी नहीं होता। जब वीरता का विस्तार होता है तो हर क्षेत्र में अनेकों कार्य सिद्ध होने लगते हैं। दिसम्बर महीने में ही एक और बड़ा दिन हमारे सामने आता है जिससे हम प्रेरणा लेते हैं। ये दिन है छह दिसम्बर को बाबा साहब अम्बेडकर की पुण्यतिथि। बाबा साहब ने अपना पूरा जीवन देश और समाज के लिये अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिये समर्पित किया था। उन्होंने कहा सरकार के प्रयासों से , सरकार की योजनाओं से कैसे कोई जीवन बदला ? उस बदले हुये जीवन का अनुभव क्या है? जब ये सुनते हैं तो हम भी संवेदनाओं से भर जाते हैं। यह मन को संतोष भी देता है और उस योजना को लोगों तक पहुंचाने की प्रेरणा भी देता है। पीएम ने युवाओं को संबोधित करते हुये कहा
कि युवाओं से समृद्ध हर देश में तीन चीजें बहुत मायने रखती हैं। पहली चीज है- आइडिया और इनोवेशन। दूसरी है- जोखिम लेने का जज्बा। तीसरी है- Can Do Spirit , यानि किसी भी काम को पूरा करने की जिद्द। जब ये तीन चीजें आपस में मिलती हैं तो अभूतपूर्व परिणाम मिलते हैं। उन्होंने कहा कि मैं आज भी सत्ता में नहीं हूं और भविष्य में भी सत्ता में जाना नहीं चाहता हूं। मैं सिर्फ सेवा में रहना चाहता हूं। मेरे लिये ये पद , सत्ता के लिये है ही नहीं , सेवा के लिये है।दिसंबर महीने नेवी डे और आर्म्ड फोर्स फ्लैग डे भी देश मनाता है। हम सबको मालूम है 16 दिसम्बर को 1971 के युद्ध का स्वर्णिम जयन्ती वर्ष भी देश मना रहा है। मैं इन सभी अवसरों पर देश के सुरक्षा बलों का स्मरण करता हूं , हमारे वीरों का स्मरण करता हूं। अमृत महोत्सव , सीखने के साथ ही हमें देश के लिये कुछ करने की भी प्रेरणा देता है , अब तो देश-भर में आम लोग हों या सरकारें , पंचायत से लेकर संसद तक, अमृत महोत्सव की गूंज है और लगातार इस महोत्सव से जुड़े कार्यक्रमों का सिलसिला चल रहा है।पीएम मोदी ने कहा कि वृंदावन के बारे में कहा जाता है कि ये भगवान के प्रेम का प्रत्यक्ष स्वरूप है। हमारे संतों ने भी कहा है – यह आसा धरि चित्त में , कहत जथा मति मोर। वृंदावन सुख रंग कौ , काहु न पायौ और। पीएम मोदी ने कहा कि आजादी में अपने जनजातीय समुदाय के योगदान को देखते हुये देश ने जनजातीय गौरव सप्ताह भी मनाया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इससे जुड़े कार्यक्रम भी हुये।अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में जारवा और ओंगे , ऐसे जनजातीय समुदायों के लोगों ने अपनी संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन किया। पीएम मोदी ने कहा कि स्टार्टअप्स के जरिये भारतीय युवा ग्लोबल प्रॉब्लम्स के समाधान में भी अपना योगदान दे रहे हैं। स्टार्टअप की सफलता के कारण हर किसी का उस पर ध्यान गया है और जिस प्रकार से देश से , विदेश से , निवेशकों से उसे समर्थन मिल रहा है। शायद कुछ साल पहले उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। उन्होंने कहा आयुष्मान भारत योजना , ये गरीबों के लिये है , मध्यम वर्ग के लिये है , सामान्य परिवारों के लिये है...हमारे जीवन में सबसे बड़ा सुख हमारा स्वास्थ्य ही होता है , ये सुखी जीवन सबको मिले यही आयुष्मान भारत की भावना है। उन्होंने कहा ये हमारे देश के युवाओं का ये सामर्थ्य ही है कि कोई भी बड़ी चुनौती उठा लेते हैं और रास्ते खोज रहें हैं! जहाँ अब लोग सिर्फ JOB SEEKERS (नौकरी खोजने वाले)बनने का सपना नहीं देख रहे बल्कि JOB CREATORS (नौकरी देने वाले) भी बन रहे हैं। इससे विश्व मंच पर भारत की स्थिति और मज़बूत बनेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा अब हम दिसम्बर महीने में प्रवेश कर रहे हैं , स्वाभाविक है अगली ‘मन की बात’ 2021 की इस वर्ष की आखिरी ‘मन की बात’ होगी। वर्ष 2022 में फिर से यात्रा शुरू करेंगे और मैं हाँ आपसे ढ़ेर सारे सुझावों की अपेक्षा करता ही रहता हूं , करता रहूंगा।